*धर्म-कर्म को टोकरी में रखकर बेचने की व्यवस्था हो तो उत्तम-मूर्धन्य*
*धर्म-कर्म को टोकरी में रखकर बेचने की व्यवस्था हो तो उत्तम-मूर्धन्य* जब धर्म और जाति का पता न चले तो समझ लेना चाहिए की आदरणीय पृथ्वी भार जी जनेऊ धारी हैं। वह ब्राह्मण जाति का हो अथवा ना हो क्या फर्क पड़ता है वैसे भी हमारे समझ में यह नहीं आ रहा है सभी लोग ब्राह्मण ही क्यों बनना चाहते हैं ।आज कल तो ब्राह्मण बनना भी बहुत आसान है । मंदिर में जाओ और जनेऊ पहन लो तीन रुपया में एक जोड़ा पनचुरन की दुकान पर आराम से मिल जाता है । और सुविधा भी कितनी मजेदार है जब मर्जी हो उतार कर मुल्ला तुल्ला बन जाओ अथवा मन की स्वतंत्रता अनुसार गीरजा घर में ही चले जाओ कौन रोकता है ।यह बात बंगाल की कट्टर रोहिंग्या विरोधी आदरणीया पंडिताइन जी पर भी लागू हो सकती है ।जो कि आज कल वह कानुन व्यवस्था की बहुत बड़ी पुजारन बन बैठी है यह और बात है की उनके अनोखे कृत्यों से त दोथाकथित शहर के आदर्श पत्थर बाज शर्म से पानी पानी हो जायें।माननीया आजकल हर काम इसी व्यवस्था से करती है जिससे भारतीय संस्कृति और सौहार्द हरदम कायम रह सके। धर्म-कर्म को टोकरी में रख कर बेंचने की व्यवस्था हो जाय तो बहुत ही अच...