*आसपास बनारस कर लूँ...!.*
*आसपास बनारस कर लूँ...!.* बंदिशें तमाम आई..... नौजवानी की दहलीज पर ही प्यारे जानते हो तुम भी ....बेहद करीब से फिर चाहते क्यों हो.....? कि सुर-लय-ताल अपना.... मैं सबसे सरस कर लूँ.... **** **** **** **** जब आनन्द आता है उन्हें....! पथरीली पगडण्डियों पर ही प्यारे... फिर मुझे क्या पड़ी है बताओ....? कि उनके लिए....मेहनत करके.... राह सारी मैं चौरस कर लूँ.... **** **** **** **** किसी कोने में....चेहरा छुपा के.... बैठे हैं जब लोग यहाँ के सारे..... फिर आप ही बताओ प्यारे कि मैं...! उनसे कैसे कोई बतरस कर लूँ.... **** **** **** **** गुरबत में ही जीना है....! यहाँ जब मुझको प्यारे....फिर... किस बात के लिए मैं..... खुद को उनके परवश कर लूँ.... **** **** **** **** गहराईयाँ जो बक्शी हैं....! विधाता ने समुद्र सी मुझको.... फिर अनायास ही क्यों......? मैं खुद को पर्वत कर लूँ... **** ****...