नदियों ने समुद्र से पूछा *----- मुरलीधर मिश्र*
नदियों ने समुद्र से पूछा *----- मुरलीधर मिश्र* मृदुल मृदुल जल लेकर आती प्रियतम खारे क्यों रहते हो । इतना धैर्य कहां से पाये गम का ज्वार उछल जाते हो । मैं तुम से प्रियतम मिलकर के शिवा शक्ति बन जाती हूं । शिव बनकर तुम युग्म बनाते मैं तुममय हो जाती हूं । नित कौतूहल मन में बसता समाधान कुछ कर देना । मेरे अनुनय द्रवीभूत हो जिज्ञासा हल कर देना। प्रिया तिया तेरी जिज्ञासा मन विचार मैं शांत करुंगा । सतत सत्य हूं सत्य तत्व से सकल शोध कर ज्ञान धरूंगा । अति आचरण मनुज की मारी धरा विकल जब रोती है । आंसू अपने गिरे लवणमय तुम में सब वह धोती है । वही लवण ले तुम प्रवाह में मुझ में आकुल आती हो । अपनामय मुझको कर जाती मुझे लवणमय करती हो। मुझमें नीर नहीं है देवी जो कुछ है सब तेरा है । शक्ति पुंज आनंद लहर हो तुम बिन धर्म न मेरा है। पावन जल को मान के मेरा मनुज मान कर जाते हैं । ऐसे अपर गुणों से पोषित अन्य मान पा जाते हैं । ...