*जीवन पर आधारित संकलित रचनाएँ 2020-2021-हौसिला प्रसाद सिंह "अन्वेशी"

*जीवन पर आधारित संकलित रचनाएँ 2020-2021-हौसिला प्रसाद सिंह "अन्वेशी"
मुंबई महानगर के वरिष्ठ साहित्यकार हौसिला प्रसाद सिंह अन्वेशी जी आज सभी के चहेते बन चुके हैंं । आपकी जितनी भी रचनाएँ हैंं सभी जीवन पर आधारित हैं, जिसे कवि,लेखक गीतकार पत्रकार विनय शर्मा दीप ने संकलित करके आप सभी के सम्मुम रखने का
प्रयास किया है।


उलझन को सुलझाना होगा ।
क्रान्तिगीत अब गाना होगा ।।
जनता का जनवादी दर्शन।
भारत में फैलाना होगा ।।

पूँजीपति सब हड़प रहे हैं।
नेता को समझाना होगा ।।
इधर जागरण मंत्र फूँककर।
सबको साथ जगाना होगा ।।

जाति धर्म मजहब भाषा को।
मन से आज हटाना होगा ।।
एक लक्ष्य हो एक राह हो।
सबको यही सिखाना होगा ।।

गति को समय समय को गति से।
हरदम यहाँ मिलाना होगा ।।
मानवता के हित रक्षण में ।
ताकत हमें लगाना होगा ।।

संघर्षों को प्रबल बनाकर ।
सिंहासन हथियाना होगा ।।
क्रान्ति बीज का नाश न होगा।
बीजमंत्र यह गाना होगा ।।

और किसानों मजदूरों को।
कच्ची नींद जगाना होगा ।।
लेकर आज तिरंगा अपना।
आगे को बढ़ जाना होगा ।।
@
                 

देश
इसी तरह जाएगा,
धीरे धीरे जाएगा
कभी रेल
कभी जहाज
कभी एल आइ सी
तो कभी
नवरत्न।
जमीन जायदाद
तो
जाएगा ही
जाएगा ।
और हम 
इसी तरह
पढ़ते रहेंगे
जातिवाचक संज्ञा
भाववाचक संज्ञा
व्यक्तिवाचक संज्ञा
बेहोश होकर ।।
     @              


जीवन स्वर्ग बनाना सीखो।
खुद से ही बतियाना सीखो।।
सुख सेहत की बात सोचकर।
अच्छा स्वास्थ्य  बनाना सीखो ।।

दुनिया भर के घनचक्कर से।
थोड़ा बहुत बचाना सीखो ।।
और जरूरी मित्र बनाकर।
अपनी शक्ति बढ़ाना सीखो ।।

अर्थतंत्र पर कब्जा करके ।
अपना काम बनाना सीखो ।।
मानवता की रक्षा में ही ।
सारा समय बिताना सीखो ।।

दुख दर्दों को हरने में ही।
सारी अकल लगाना सीखो ।।
खुशी बाँटकर इस जीवन में ।
गंगा रोज नहाना सीखो ।।

शैतानी चालों से बचकर ।
मन ही मन मुस्काना सीखो ।।
नए नए चेहरों से मिलकर ।
थोड़ा नाम कमाना सीखो ।।

अपने भीतर बसे सत्य से।
मिलकर जश्न मनाना सीखो ।।
और नकारों की हत्या में ।
महावीर बन जाना सीखो ।।
      @         
                   

मोहमुक्त हो जाओ भक्तों।
अपना देश बचाओ भक्तों ।।
अच्छा दिन अब बुरा हुआ है।
थोड़ी अकल लगाओ भक्तों ।।

आज स्वदेशी बिका हुआ है।
कब्जे में तुम लाओ भक्तों । ।
दरवाजा  फिर खोल रहा  है। 
उस पर रोक लगाओ भक्तों ।।

कंपनियों का गाना छोड़ो।
वंदे मातरम्  गाओ भक्तों ।।
भारत माँ पर कर्ज चढ़ा है ।
यह मसला निपटाओ  भक्तों ।।

 औरों पर जो निर्भरता है ।
उससे जान बचाओ भक्तों ।।
नया जागरण मंच बनाकर।
सोया देश जगाओ  भक्तों ।।

वह जो अर्थ तंत्र को खाया ।
उसका नाम मिटाओ  भक्तों ।।
आज कोरोना के भीतर का ।
गोलमाल  समझाओ भक्तों ।।

हम किन पर निर्भर थे पहले   ।
गिन कर  नाम बताओ भक्तों ।।
आजादी का पहला पन्ना ।
पढ़कर हमें सुनाओ भक्तों ।।
        @                    


आगे पीछे जाना होगा ।
अपना फर्ज निभाना होगा ।।
वह जो हमसे बात कर रहा ।
उसको भी समझाना होगा ।।

जो कुछ यहाँ किया है हमने ।
उसका मूल्य चुकाना होगा ।।
कहते हैं कुछ लोग सफर में ।
थोड़ा नाम कमाना होगा ।।

अपने लगे हुये घावों पर।
मरहम स्वयं लगाना होगा ।।
रिश्तों से ऊपर जीवन है ।
यही सत्य अपनाना होगा ।।

कड़वाहट जब भी आ जाए ।
थोड़ा सा रुक जाना होगा । ।
लोगों से मिलने जुलने में।
सारा समय  बिताना होगा ।।

खुद से मिलना सही काम है ।
मन में यह गठियाना होगा ।।
लेने से पहले तप करके ।
मन ही मन मुसकाना होगा ।।

जीवन क्यों पाया है हमने ।
मन में प्रश्न उठाना होगा ।।
मानवता के आगे बढ़कर ।
अपना शीश झुकाना होगा ।।
      @
                     

सच्चाई को आने दो ।
जलवा उसे दिखाने दो ।।
जहाँ कहीं है घोर अंधेरा ।
दीपक वहाँ जलाने दो ।।

राह रोकना बुरी बात है ।
लोगों को समझाने दो ।।
भारत की पूरी धरती पर ।
सदा सत्य फैलाने दो ।।

झूठ जहाँ भी पनप रहा हो।
वहाँ मुसीबत आने दो ।।
आगे बढ़कर सदा सत्य की ।
दुनिया हमें बसाने दो ।।

सच्चाई के बुलडोजर से ।
मिथ्याचार मिटाने दो  ।।
सुखपूर्वक आजाद हवा में ।
सच्चाई को गाने दो ।।

थोड़ा सा सहयोग करो तुम ।
उसे सफलता पाने दो ।।
सच्चाई को बीच सभा में ।
सच्चाई फरमाने दो ।।

नैतिकता मानवता के संग।
भारत भाग्य बनाने दो ।।
सत्यमेव जयते का झंडा।
भारत में फहराने दो ।।
      @            


गुत्थी को सुलझाता चल ।
नया नया कुछ गाता चल ।।
बीत गई सो बात गई अब,
आगे कदम बढ़ाता चल ।

अनुभव की थाती को लेकर ।
मन में प्रश्न उठाता चल ।।
आगे जो अवरोध खड़ा है ।
उसमें राह बनाता चल ।।

सारी व्यथा कथा को छोड़ो ।
मन को भी समझाता चल ।।
पतन काल है मान रहा हूँ।
फिर भी जोर लगाता चल ।।

सारे प्रश्नों को खँगालकर ।
अपना लक्ष्य बनाता चल ।।
जीवन को संग्राम समझकर ।
सद्विचार को लाता चल ।।

कौन विदेशी लूट रहा है ।
उसको दूर हटाता चल ।।
जितने भी असली दलाल हैं ।
उनको मार भगाता चल ।।

भारत कैसे रहे सुरक्षित ।
इस पर अकल लगाता चल ।।
अपना पूरा जीवन देकर ।
अपना मान बढ़ाता चल ।।
      @
                         

मन का बोझ उठाना सीखो ।
मन के भीतर गाना सीखो ।
दुख दर्दों के साथ यहाँ पर ।
मन ही मन मुस्काना सीखो ।।

आए हो तो किसी तरह से।
अपना फर्ज निभाना सीखो।।
पढ़ लिखकर काबिल बन जाओ ।
अपना स्वास्थ्य बनाना सीखो ।।

औरों की सेवा करने का।
मन में भाव जगाना सीखो ।।
शक्ति और सामर्थ्य बड़ा है ।
अपना शौर्य लुटाना सीखो ।।

परोपकार करने से पहले।
खुद को ही समझाना सीखो।।
दिशा चयन के कठिन मोड़ पर ।
नैतिक धर्म निभाना सीखो ।।

दुश्मन को भी प्रेम पिला कर ।
खुद को बड़ा बनाना सीखो ।।
औरों की सुविधा को देखो ।
अपना काम  चलाना सीखो ।।

व्यर्थ बात सुनने से पहले ।
मन में धैर्य उगाना सीखो ।।
मन के भीतर छिपा देवता ।
उसको रोज जगाना सीखो ।।

राष्ट्र भक्ति का बिगुल बजाकर ।
अपना देश बचाना सीखो ।।
गौरवशाली हर प्रतीक को ।
हरदम गले लगाना सीखो ।।

मानवता के बड़े मंत्र को।
जीवन मंत्र बनाना सीखो ।।
नैतिकता के लिए विश्व में ।
तुम सर्वस्व लुटाना सीखो ।।                    
@


अब केवल पछताना होगा ।
लुटता हुआ खजाना होगा ।।
बड़ा विदेशी गठबंधन है।
हमको सिर्फ लुटाना होगा ।।

मजबूरी का खेल चला है।
नासमझी हीं गाना होगा ।।
गलत सही साथी हैं अपने।
झूठा राग सुनाना होगा ।।

और स्वदेशी की बातों पर ।
केवल जी बहलाना होगा ।।
बड़ा आत्म निर्भर होना है ।
सबको यही सुनाना होगा ।।

सच को ढँककर बड़े झूठ से।
अपना काम चलाना होगा ।।
नैतिकता की बात चले तो।
सनक सनक बतियाना होगा ।।

छल प्रपंच के पाठ्यक्रमों में।
अपना नाम लिखाना होगा ।।
सत्यापित होने के खातिर ।
अंतिम हद तक जाना होगा ।।

जब भी बात उधर से आए।
झटपट शीश झुकाना होगा ।।
अर्थ बदलकर हर शब्दों का ।
लोगों को समझाना होगा ।।
         @
                         

दिन आया।
गया।
अब रह गया है
दुर्दिन।
उसी से 
काम चल रहा है
देश 
हाथ मल रहा है।
समय जाम है
किए का
दुष्परिणाम है ।
आगे सब
राम राम है ।
चलता हूँ ,
सुबह शाम
ढलता हूँ।
गिरावट जारी है
वह 
सब पर भारी है ।
लगता है
अत्याचारी है ।।
         @            


भाषाविहीन
समाज से
गुजरते हुए,
जब हम
पहुँचते हैं
खंडहर में
सपनों के।
पाते हैं
बिकी हुई निष्ठा,
गारा हुआ
वर्तमान।
तब मैं
करने लगता हूँ
दो दो हाथ
दुखों से।
और रोने लगता हूँ
आँसू
सपनों का ,
पसीने को
कोसकर ।।
    @           


यह वक्त है
अपने दुखों को
सम्हालने का,
और याद करने का
उन्हें
जो कारण हैं
इन दुखों के,
ताकि
दिया जा सके
जवाब
वक्त पर,
किसी त्यागपत्र की तरह
निर्मम ।।
     @                     


नष्ट हुए देश को
पटरी पर लाते हुए
उसने
उतार दिया
देश को
पटरी से,
और लगा करने
झूठा योगाभ्यास,
भाषा के
रमणीक जंगल में।
जहाँ शब्दों में
सबकुछ था
सार्थकता के सिवा ।
जिसे हम
कह सकें
सार्थक
अपने 
और अपने
 देश के लिए ।।
     @   
                         

मेरा देश मेरा देश।
यह दुनिया से प्यारा देश ।।
सदा हिमालय बोल रहा है ।
हम सबका है प्यारा देश ।।

यहाँ प्रेम भाईचारे को।
देता सदा सहारा देश ।।
हर प्राणी की चिंता करता।
ऐसा रहा हमारा देश ।।

गौतम गाँधी औ नानक का।
हरदम रहा दुलारा देश ।।
क्या मालुम किस बुरी नजर से।
इतनी जल्दी हारा देश ।।

बड़े बड़े आदर्श हमारे।
नष्ट किया यह प्यारा देश ।।
सच्चाई को कैसे खाया।
कैसे खुद को मारा देश ।।

झूठ यहाँ पर नाच रहा है।
देख रहा बेचारा देश ।।
नैतिकता के भक्षक को ही।
कैसे दिया सहारा देश ।।

मानवता की हुई परीक्षा।
उसमें किया किनारा देश ।।
चकित हुआ है आम आदमी।
चकित हुआ है सारा देश  ।।
      @                         


कुछ तो हमें बताओ यारो ।
इधर उधर मत जाओ यारो ।।
कौन कहाँ पर क्या करता है।
यही बात समझाओ यारो ।।

ठहर गई है आज गुलामी ।
इसकी कथा सुनाओ यारो ।।
नैतिकता की कथा सुनाकर ।
उसकी  दशा बताओ यारो ।।

क्या कहता है भारत अपना।
आकर हमें सुनाओ यारो ।।
कौन विदेशी गाना गाता।
 उसका नाम बताओ यारो।।

समझौते में कौन गया था ।
उसको यहाँ बुलाओ यारो ।।
जो ऐसी हरकत करता है ।
उसको मजा चखाओ यारो ।।

इन  सारे अवरोधों को ही ।
जल्दी मार भगाओ यारो ।।
मजबूरी से लड़कर हरदम।
बढ़िया देश बनाओ यारो ।।

सत्य जहाँ भी रखड़ रहा है।
दौड़ो उसे बचाओ यारो ।।
और झूठ को दूर भगाकर ।
अप्प दीप बन जाओ यारो ।।

हवा वसंत बहे हमेशा।
ऐसा मौसम लाओ यारो ।।
क्या रोते हो उठो आज तुम।
अपना देश सजाओ यारो ।।

मिथ्याचारी के मिजाज मे।
अपना सत्य घुसाओ यारो।।
जैसे भी हो मंगल अपना ।।
वही राग तुम गाओ यारो ।।
@

                         

कई लोग आए।
गए।
यह भी 
एक हवा है।
चली जाएगी
मगर
खैकार करके ।।
      @            


आपके हाथ में
कुछ हो
न हो।
अपनी कलम उठाओ
और हथौड़े की तरह
जड़ दो
चनौती के मुँह पर
समय देखकर ।
यही आपका धर्म है
साहित्यिक कर्म है ।।
    @


चलो
बाहर का खाना छोड़कर
घर में
बनाओ
खाओ
मौज करो
और खाते पीते
उठते बैठते
जोर से चिल्लाओ
आत्मनिर्भर ।
हो सके तो
स्वदेशी भी।
बाहरी का
बहिष्कार करते हुए
चिल्ला उठो
यूरेका
कानफाड़ू
होशोहवाश खोकर ।।
      @
                       

मतभेदों से बाहर आओ।
आकर बैठो कथा सुनाओ ।
व्यक्तिवाद का झंझट छोड़ो।
सबको आकर गले लगाओ ।।

सबके मन की बातें सुनकर।
सबकी पीड़ा दूर भगाओ ।।
सामाजिक उत्तम विचार का।
सबसे पहले दर्शन लाओ ।।

त्याग और श्रमदान माँग लो।
सबका जीवन सफल बनाओ ।।
जनहितवाले हर विचार पर ।
उत्सव का माहौल बनाओ ।।

सब लोगों को साथ मिलाकर ।
सबका ही तुम मंगल गाओ ।।
अपने इस छोटे जीवन में ।
अपना बढ़िया नाम कमाओ ।।

गाँव वासियों के भीतर ही ।
तुम विकास का अलख जगाओ ।।
नैतिकता को कसकर पकड़ो ।
आगे आगे कदम बढ़ाओ ।।

प्रेम और व्यवहार मिलाकर।
कर्मठता का घोल बनाओ ।।
भेदभाव से ऊपर उठकर।  
सब लोगों से हाथ मिलाओ ।।

सज्जन को तुम प्रेम परोसो।
दुर्जन को इंसान बनाओ ।।
रुकी हुई गाड़ी है अपनी ।
उठकर धक्का आज लगाओ ।।

संकल्पों की  पूँजी से तुम।
हरियाली का मौसम लाओ ।।
छोटा सा यह गाँव हमारा ।
आओ मिलकर स्वर्ग बनाओ ।।

प्यार बाँट कर सब होताहै।
पहले जागो और जगाओ ।।
सोने वालों के जगने पर ।
खुशहाली का जश्न मनाओ।।
      @     
                          

देश आजाद हुआ 
तब सबने चाहा था,
धूमिल ने भी 
अब देश 
खुशहाल होगा ,
मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ 
मोह था 
नेहरू
चलेंगे
गाँधी के रास्ते।
मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।
समानता आएगी
आर्थिक आजादी मिलेगी
भाईचारा बढ़ेगा
मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।
उल्टा हो गया मोहभंग
धूमिल का
पुरे देश का
एक साथ 
सन बासठ में ।
और फट पड़ा विद्रोह
कवि का कलेजा भी
एक साथ ।
लेकिन आज
कहाँ है
कवि
और कहाँ है
मोहभंग ।
सब सपाट ।
@


हम सब
करते हैं काम,
साहित्य का,
बिना समझे 
साहित्य को।
कलम उठाते हैं
और घँसने लगते हैं
भाव ,विचार
सीमित,
कभी कभी तो
व्यक्तिगत भी ।
जबकि साहित्य
 काम है
जनहित का,
जिसमें छिपा है
जन कल्याण
लोकमंगल ।
और विनाश भी
अमंगल का ।
इसीलिए
वह संघर्ष है
चिंतन है
व्यवहार भी है ,
सही दिशा में
सही समझ के साथ
और दस्तावेज भी
अपने समय का ,
पूरी परंपरा बोध के साथ ।
वह उज्ज्वल भविश्य
मानव कल्याण
और देशोन्नति के लिए
प्रचलित है
अविचल ।।
    @                 


सब कुछ इतना सुंदर था तो,
भ्रष्टाचार हुआ कैसे  ।
पागलपन जो चला आ रहा ।
वह साकार हुआ कैसे ।।

जानेवाला चला गया फिर ।
अत्याचार  हुआ कैसे ।।
वह जो थोड़ा ठीक ठाक था ।
वह बेकार हुआ कैसे ।।

देश हमारा इतना नैतिक।
फिर लाचार हुआ कैसे ।।
सब कुछ था फिर आज खोखला ।
यह आधार हुआ कैसे ।।

बड़ा बड़ा आदर्श हमारा ।
सब इनकार हुआ कैसे ।।
लूटपाट करनेवालों से ।
जमकर प्यार हुआ कैसे ।।

नफरत वाला यह दर्शन भी।
अब स्वीकार हुआ कैसे ।।
क्रय विक्रय में लाभ हानि का।
यह व्यापार हुआ कैसे ।।

समझौतों के भीतर इतना।
बंटाधार हुआ कैसे ।।
पतन हमारा इस दुनिया में।
बारंबार हुआ कैसे  ।।
@
                        

संकट की इस अशुभ घड़ी में ।
कैसे सारा काम करें ।।
किसका जै जैकार करें हम।
किसको हम बदनाम करें ।।

यह अभाव का जीवन देखो।
कैसे हम आराम करें । ।
बिखर गए हैं साथी मेरे ।
कैसे चक्का जाम करें ।।

बेमौसम के इस भाषण में ।
कैसे काम तमाम करें ।।
कैसे इस पावन धरती पर।
चलकर चारों धाम करें ।।

समर खड़ा है ठीक सामने।
कैसे हम विश्राम करें  ।।
किसको किसको साथी बोलें।
किसको लाल सलाम करें ।।

आज स्वदेशी की भाषा को।
क्यों इतना बदनाम करें ।।
बिगड़ गई है हवा देश की।
कैसे हम व्यायाम करें ।।

रावण का डंका बजता है।
कैसे दिल में राम करें ।।
मानवता का रुदन देखकर ।
कैसे सुबहो शाम करें ।।
@
                                   

बकवास
वह  ईश्वरी  वरदान है,
जिसे साध लेने पर
आदमी,
हो  जाता है
काना राजा,
अंधों में ।
और देने लगता है
भाषण,
अंधों को।
जिसे सुनते हैं
काने भी
मन लगाकर ।
इस तरह
चल निकलता है
राज
अंधो का
कानों के साथ।
जिसे भोगते हैं
सब के सब
आँख वाले भी ,
विवश होकर ।।
@
               

पैसा
सिकुड़ कर
चला गया है
वहाँ
दो घरों में।
और तुम
ढूँढ़ रहे हो 
यहाँ
जेब में, 
पागलों की तरह।
जैसे ईश्वर को
ढूँढ़ते हो
बाहर 
कहीं और ,
अंधों की तरह,
मूर्खवत ,
बेहोश होकर ।।
@
                      

भारत में बरबादी आई ।
सारी हवा विवादी आई ।।
अच्छे दिन के इंतजार में।
किस्मत ही फरियादी आई ।।

अंधे नाच रहे हैं जैसे।
जीवन में आजादी आई ।।
भिक्षाटन में निकल पड़े हैं ।
यह मुश्किल बुनियादी आई ।।

टेढ़ी मेढ़ी चाल चल  रही ।
राजनीति  बकवादी आई ।।
भर भर झूठ परोसा उसने।
यहाँ झूठ की  दादी आई ।।

खानेवाले बोल रहे हैं।
यह कैसी आबादी आई ।।
भक्तों की टोली को देखो ।
यह कितनी उन्मादी आई ।।

लफ्फाजी का उत्सव देखो।
लगता जैसे शादी आई ।।
अपनी भी छोटी सी टोली।
आज यहाँ प्रतिवादी आई 

सोने वालों उठ बैठो तुम ।
समर आज फौलादी आई ।।
मानवता का बिगुल बजाने ।
अब जनता जनवादी आई ।।
@
                             

जो करना था
किए।
अब बैठे हैं
मुँह पर खोंता बाँधक
आश में  
अच्छे दिन की ।
वह आसमान से गिरा
खजूर में अटका है।
हमें
जमीन पर पटका है ,
चारों खाने चित्त ।
और हम,
सो रहे हैं
गिरा समय ढो रहे हैं ।
बैठकर
अनाथालय में ।।
@
                         

आत्मनिर्भर बनना है तो
खड़े हो जाओ
अपने पैरों पर ।
रूस चीन 
जापान अमेरिका  को
झटक कर ।
और कहो कि 
हम भारत हैं ,
भारत। 
जो न रिरियाता है 
न गिड़गिड़ाता है 
किसी के सामने।
हाथ जोड़ने का तो 
सवाल ही पैदा नहीं होता ,
इस दुनिया में ।।
      @


सब व्यर्थ है तो
उसे तोड़कर फेंक दो
और ले आओ
एक मुकम्मल
 संदर्भ
 राष्ट्रीय,
बिन घालमेल के ,
बिल्कुल विशुद्ध
मानवीय ।।
और लूट लो
अपना यश
वर्तमान से ।।
      @


हम वंदे मातरम् गाएँगे ।
वाशिंगटन यहीं बुलाएँगे ।।
उसके ही सारे शब्दों से ।
अपना काम चलाएँगे  ।।

शासन और प्रशासन में भी।
उसकी गाथा गाएँगे  ।।
जितना भी आदेश मिलेगा।
हम तो उसे निभाएँगे  ।।

बच्चा बनकर चुज्जा बनकर।
अपना समय  बिताएँगे ।।
बड़ा बाप है बड़ी बात है।
हम सम्मान बढ़ाएँगे ।।

शोषणवाले हर सवाल को ।
भीतर ही सुलझाएँगे । ।
बाहर तो आजादी का हम।
डंका रोज बजाएँगे । ।

और आत्मनिर्भर होने का ।
सारा यश ले जाएँगे  ।।
वंदे मातरम् का गाना हम।
हरदम गाते जाएँगे  ।।

और विदेशी  हर ताकत को ।
स्वागत गान सुनाएँगे  ।।
आओ मेरे बाहर वालों  ।
कहकर उन्हें बुलाएँगे ।।

लूट पाट होने से पहले ।
वंदे मातरम् गाएँगे  ।।
आक्रांता बनकर मत आना ।
यही  बात समझाएँगे  ।।

आओ आकर ले जाओ तुम ।
कहकर हम सो जाएँगे 
वंदे मातरम् गाएँगे हम ।
वंदे मातरम् गाएंगे हम ।।
@


समय से पहले
खाना परोसते हुए
उसने कहा
खाओ
इसमें  सब है
भाषण भी।
हम उठे
 बेअकली में
ना समझी को मिलाए
और खाने लगे
चाव से।
इसी बीच
उसने परोस दिया
एक नया शब्द
शिगूफा ।
और हम
ढ़ूँढ़ने लगे
ढूँढ़ रहे हैं
पूरा अर्थ 
आज तक ।।
    @               


जायका बिगाड़ते हुए
उसने
कई शब्दों को फेका।
और हम
लूटने लगे
उसे
बारात में उछाले गए
सिक्कों की तरह ।
गिरते 
पड़ते
तोड़ लिए
अपना मुँह
उस
अफरा तफरी में
होश खोकर ।
और अब
ताक रहे हैं
उसकी ओर
अकिंचन की तरह ,
निरर्थक ।।
     @
                 

वह
मर गया है
तो अर्थी निकलेगी,
कब निकलेगी
यही सोच रहा हूँ
सर का बाल
नोच रहा हूँ।
आँसू नही है
फिर भी पोंछ रहा हूँ।
मैं
कुछ सोच रहा हूँ ,
 खुद को टोंच रहा हूँ ।।
@


हरदम नजर गड़ाते जाओ ।
खुद को भी समझाते जाओ ।।
कैसे घटना घटित हो गई ।
इसका पता लगाते जाओ ।।

अपने कैसे हुए पराए ।
यह रहस्य सुलझाते जाओ ।।
आयातों निर्यातों में भी ।
थोड़ी अकल लगाते जाओ ।।

कौन इकट्ठा गोल कर रहा ।
उसको सबक सिखाते जाओ ।।
भारत की जो करे दलाली ।
उसको हवा खिलाते जाओ ।।

शायद लेकिन किंतु बोलकर ।
सारा प्रश्न उठाते जाओ । ।
झूठ पकड़ में आ जाए तो ।
रुक कर पाठ पढ़ाते जाओ । ।

भारत की पूरी जनता पर।
सुख सुविधा बरसाते  जाओ ।।
नालायक सारी बातों से ।
अपना पिंड छुड़ाते जाओ ।।

सम वितरण भाईचारे का ।
नारा रोज लगाते जाओ ।।
संयम पूर्वक आगे बढ़कर ।
भारत देश बनाते जाओ ।।
@


सच्चाई जो डूब रही है।
उसको आज बचाना होगा ।।
उसके अंतिम तह में जाकर।
उसको बाहर लाना होगा ।।

उसकी सेवा में जीवन का।
सारा समय लगाना होगा ।।
सच्चाई जो डरी हुई है।
उसको भी समझाना होगा ।।

घायल सत्य दिखे तो उसको।
मरहम रोज लगाना होगा ।।
और उसे जीवन के पथ पर।
खुले आम दौड़ाना होगा ।।


जहाँ कहीं भी सच्चाई है।
उस पर प्यार लुटाना होगा ।।
और उसे बीमार देखकर।
अस्पताल पहुँचाना होगा ।।

सच्चाई में साहस भरकर ।
आगे काम बढ़ाना होगा ।।
और झूठ को भेज रसातल ।
वंदे मातरम् गाना होगा ।

शुभ चिंतन से शुभ विचार से ।
मन को रोज सजाना होगा ।।
अपनी सारी शक्ति लगाकर।
देश राग को गाना होगा ।।

 परमारथ में समय बिता कर  ।
थोड़ा सा मुस्काना होगा ।।
आत्म तोष से आगे बढ़कर ।
मन ही मन कुछ गाना होगा ।।
@                        


 भाषा में आत्मनिर्भरता
 
आत्मनिर्भर होने के लिए 
जरूरी है 
आत्मभाषा
 आत्म  विचार 
और आत्म संस्कार।
 जिसे आर्थिक जमीन पर 
उगाकर
 हम 
हो सकते हैं खड़ा 
अपने पैरों पर,
 पूरे स्वाभिमान के साथ।
 और तोड़ सकते हैं 
विकलांगता की बेड़ी
जिसे पहन रखे हैं 
हम 
उपनिवेश काल से।
 भाषा को स्वाभिमान से जोड़ते हुए       
 हम गा सकते हैं 
राष्ट्र गीत 
राष्ट्र विचार 
अपनी भाषा में ।
इसके लिए 
हमें जलानी होगी
 एक भट्ठी,
अनुवाद की 
पूरी तत्परता से ,
निश्चल होकर 
अपने देश में ।।
    @   
           

चलते चलते रुकीजिंदगी । 
कहां कहां है झुकी जिंदगी ।।
मुँह पर पट्टी बांध लिया है ।
यह कैसी है दुखी जिंदगी।

 रोज एक ही प्रश्न कर रही ।
कैसे होगी सुखी जिंदगी।।
 किसी तरह जो घिसट रही थी ।
आज वही है मरी जिंदगी ।।

किसको दोष लगाए हम सब ।
अब तो यह है चुकी जिंदगी । ।
रोज-रोज की पक पक सुनकर।                      नौजवान की पकी जिंदगी ।।

आज सड़क पर उतर रही है ।
इंतजार से थकी ज़िंदगी।।
 हर उड़ान से पहले आकर ।
प्रश्नकाल में फँसी जिंदगी।।
 
प्रेम जहां लिखना था उसको ।
घृणा वही लिख रही जिंदगी ।।
याद नहीं आता है हमको।
 कब कितनी है हँसी जिंदगी।।
 
बररबादी को आमंत्रित कर ।
खुद धरती में धँसी जिंदगी ।।
कब आएगी पता नहीं है ।
फिर भी मन में बसी जिंदगी।।

 चलते चलते रुक जिंदगी ।
कहां कहां है झुकी जिंदगी ।।
@
          

आत्महत्या से गुजरते हुए 
हमने कहा 
नीचे वाले मर रहे हैं ।
और ऊपर वाले 
खिल खिला रहे हैं 
अपनी हँसी
उनकी मौत पर  ।
वे जो
पथ प्रदर्शक हैं,
 दिखा रहे हैं 
सीधा रास्ता,
 किसानों को
 छोटे व्यापारियों को 
लघु उद्योग को भी ।
जिसे ढो रहे हैं
बेरोजगार
अपने कंधों पर
 मजबूत कंधों पर ।
और उतर रहे हैं
सड़क पर
अच्छे दिन के लिए
आजकल
 विवश होकर ।।
@
               

सबसे बढ़िया यह गुलाब है ।
प्रेम बाँटता बेहिसाब है ।
नफरत को भी बड़े प्रेम से।
 दे देता बढ़िया है जवाब है ।।

जो कहता इसमें कांटे हैं।
 हमको वह लगता  खराब है।।
 वह क्या जाने यह कैसा है ।
स्वयं प्रेम की यह किताब है ।।

जो भी सौदा समझ रहे हैं।
 बेवकूफ हैं ,बेहिसाब है ।।
दिल का सौदा करने वालों।
 सदा समर्पण यह गुलाब है ।।

जो भी इसको प्यार किया है ।
उसको हम कहते जनाब हैं ।।
इसके भीतर का गुण देखो ।
बिल्कुल बढ़िया लाजवाब है ।।

अंधेरे में चमक रहा है ।
जैसे कोई आफताब है।।
 हमको तो बस प्यार चाहिए ।
जीवन में बस यही ख्वाब है ।।

सबसे बढ़िया यह गुलाब है ।
प्रेम बाँटता बेहिसाब है ।।।
              @


सारा पर्दाफास हो गया।
ललुआ भी नापास हो गया।।
पूरा भारत मुँह बाए था।
वह भी आज निराश हो गया ।।

खुली आँख से विक्रय देखा।
अब उसको विश्वास हो गया ।।
आज जागरण मंच हमारा।
अपने आप निराश हो गया ।।

पूरब पूरब कहने वाला।
अब पश्चिम के पास हो गया ।।
विश्व गुरू कहलाने वाला।
आज किसी का दास हो गया ।।

आजादी तो झूठी निकली।
बहुत बुरा इतिहास हो गया ।।
अच्छे दिन के घनचक्कर में ।
सारा गलत विकास हो गया ।।

जीवन भर की मिली गुलामी।
यह हमको आभास हो गया ।।
कर्जे में हम डूब गए है ।
सारा सत्यानाश हो गया ।।

भावुकता ने देश डुबाता ।
तर्कों का तो नाश  हो गया ।।
अंधी लंगड़ इस आँधी में।
झूठ आज आकाश हो गया ।।

परिवर्तन हमने सोचा था ।
यह तो महा विनाश हो गया ।।
घॄणा और नफरत का दर्शन।
भारत में  अब खास हो गया ।।

   सच्चाई नैतिकता को तो।
जैसे कारावास हो गया ।।
लाचारी के इस मौसम में।
पूरा देश उदास हो गया ।।
@
               

खाते पीते सोते लोग ।
आ जाते हैं रोते लोग ।।
इतने सारे दुख दर्द को।
 कैसे कैसे ढोते लोग ।

कौन इन्हें तकलीफ बाँटता।
 किसके बस में होते लोग।।
 सुबह शाम सब देख रहे हैं ।
फिर भी दीदा खोते लोग।।

 ऊपर की कुर्सी पर बैठे ।
दिनभर नफरत बोते लोग।।
 बाहर वालों से मिल करके।
  घर में पूड़ी  पोते लोग ।।

 झूठ यहां फैलाने वाले ।
सच्चाई को धोते लोग ।।
 जेब कटी तब पीछे मुड़कर। 
अपनी जेबे टोते लोग।।

 मिलीभगत के इस मौसम में।
 मार रहे हैं गोते लोग ।।
बिखर रहे हैं फिर भी खुद को।
 दिनभर यहां सँजोते लोग। ।

खाते पीते सोते लोग।
 आ जाते हैं रोते लोग ।
       @
                     

अब तो कर्ज उठाना होगा ।
हंसकर ब्याज चुकाना होगा ।।
 लापरवाही के धंधे में ।
 सब कुछ हमें गांवना होगा ।।

फैशन का जीवन जीने में । 
कर्जखोर बन जाना होगा ।।
जब तक कर्ज चढ़ा है समझो ।
हमें रसातल जाना होगा ।।

उत्पादन जब ठप्प पड़ा हो ।
तब तो गोता खाना होगा ।।
सही दिशा में सही खर्च से ।
अगला कदम बढ़ाना होगा ।।

रोजी रोटी की सीमा में ।
सारा जोर लगाना होगा।।
 और अमीरों की बस्ती में ।
त्याग मंत्र ले जाना होगा ।।

नीचे वाले अंतिम घर में ।
रोशनीयों को लाना होगा ।।
जितना भी है बचा स्वदेशी ।
उससे काम चलाना  होगा ।।

एक साथ सब मिलकर हमको।
 राष्ट्रगान अब गाना होगा ।। 
नेताजी को देश भक्ति का।
 बढ़िया पाठ पढ़ाना होगा।।

 अब तो कर्ज उठाना होगा ।
हंसकर ब्याज चुकाना होगा ।।
@

 
हम
कुछ नहीं बोलेंगे।
अमेरिका
जो कहेगा, 
वही
कह देंगे।
सच के ऊपर
झूठ को
तह देंगे ,
बस ।।
    @
         

इतना खुलापन ।
इतनी नैतिकता ।
हम
 कहां से लाएं ,
जो 
सड़ांध को हटाए ,
खुशबू  फैलाए ।
और खड़ा कर दे 
एक भव्य इमारत ,
लोकतंत्र का  ,
हमारे देश में ।।
@
                     

दुबको मत अब बाहर आओ।
 सच्चाई का गाना गाओ।।
 उम्मीदों पर मुहर लगाकर ।
 क्या पाए तुम हमें दिखाओ।।

 रोजी रोटी गई हाथ से।
 अब क्या होगा हमें बताओ।।
 थाती भी बिकने को आतुर।
 इस पर थोड़ा रोक लगाओ ।।

वे कहते हैं अभी इसी क्षण।
 तुम सब यायावर बन जाओ।। 
  आदिकाल का मानव बनकर ।
दास प्रथा में समय बिताओ ।।

जो भी विकसित हुआ देश में।
 वह अमीर को देते जाओ ।।
बैठे क्या हो चलो रसातल ।
वहीं बैठकर नाचो गाओ ।।

हम चिंता में डूब गए हैं ।
खुद से कहते राह दिखाओ ।।
अंधेपन के इस मौसम में ।
बाहर आकर साथ निभाओ ।।

मानवता तो चली गई है ।
नैतिकता को आज बुलाओ।।
रोकथाम करना है तुमको ।
आओ थोड़ा जोर लगाओ।।


 दुबुको मत अब बाहर आओ ।
सच्चाई का गाना गाओ।।
@
                            

यह मेरा अंतिम सवाल है।
दुनिया में कितना बवाल है ।।
कोई घर में पूड़ी पोता ।
कोई बेमतलब हलाल है ।।

जहाँ जहाँ नजरें दौड़ाओ।
सभी जगह तो बिछी जाल है ।।
कोई रोटी ढूँढ़ रहा है।
कोई कहता कहाँ माल है ।।

हिटलरशाही आ धमकी है।
सुबह शाम करती धमाल है ।।
अफरा तफरी मची हुई है।
दुख में बीता कई साल है ।।

रोज नरक सरियाया जाता।
इसी बात का अब मलाल है ।।
कोई परम हितैषी बनकर ।
हरदम चलता गजब चाल है ।।

इसी बात का अब रोना है।
सब कहते हैं पतन काल है।।
कहाँ हमारा रक्षक बैठा ।
कहाँ हमारा लोकपाल है ।।

लोकतंत्र गफलत में डूबा ।
कौन बजाता यहाँ गाल है ।।
अब मत पूछो मेरे घर का ।
कैसे इतना बुरा हाल है ।।

कैसे यहाँ बिकलता आई ।
कैसे सब होता हलाल है ।।
जटिल प्रश्न है उत्तर दे दो।
तब तो समझूँगा कमाल है ।।

वर्ना प्रश्न रहेगा जिंदा ।
कहाँ कहाँ बैठा दलाल है ।।
भगत सिंह के साथी बोलो।
कैसे बिगड़ा हालचाल है ।।
@
                

उस एकांत में 
जहां कुछ नहीं था ,
हमने गढ़ लिया 
एक विचार ,
सपनों का ।
अब उसी को लेकर
 ओढ़ता हूं 
बिछाता हूं ,
कभी-कभी तो
 पहन भी लेता हूं 
सपनों को 
जरूरत पड़ने पर ।
और जीने लगता हूं 
सपनों में
 मूल्यवान क्षण
सपनों का  ।। 
         @


खुद को ही गरमाता चल ।
 अपना स्वास्थ्य बनाता चल ।।
घबराहट से बाहर आकर ।
मुश्किल में मुस्काता चल ।।

कई ठोकरों से लड़ना है।
 जीवन को समझाता चल ।।
और चेतना के विकास में ।
सारा समय लगाता चल।।

 संबंधों का अर्थ समझ कर ।
अपना प्यार लुटाता चल।।
 सहयोगी को साथ बुलाकर ।
हरदम गले लगाता चल।।
 
ऊँच नीच के भेदभाव को। 
मन से दूर हटाता चल ।।
 सच्चरित्र को सद्विचार को । 
कदम कदमअपनाता चल  ।।

ज्ञान गिरा हो जहां कहीं भी ।
झटपट उसे उठाता चल ।।
अगर कहीं लाचार मिले तो ।
करुणा में नहलाता चल।।

 अपने मन के भीतर जाकर ।
बढ़िया ज्योति जलाता चल ।।
सत्य पकड़कर इस जीवन में ।
सारा काम  बनाता चल।। 


खुद को ही गरमाता चल ।
अपना स्वास्थ्य बनाता चल ।।
@
             

गायन वादन हो रहा ।
झूम रहा है देश। ।
ऐसे में हम ले रहे ।
क्या बढ़िया संदेश।।

 आज आदमी शून्य है ।
,सक्रिय है  शैतान ।।
रात घनेरी आ गई ।
कैसे करें बिहान ।। 

मौसम को ही खा गया ।
देख हमें लाचार।।
 और हवा में हो रहा।
सारा कारोबार ।।

रिश्तेदारी छोड़िए  ।
घर में घुसा सियार ।।
छौनों को है ले गया ।
वह नदिया के पार ।।

यह गुलाम ऐसा मिला ।
जैसे कोई संत ।।
 कालनेमि का बाप है ।
 इसका होगा अंत ।।

 लोगों के ही बीच में
चिंतन किया स्वतंत्र
वहीं अंधेरे में मिला
आजादी का जश्न ।।
@


मधुर मधुर मुस्काता चल ।
अच्छा नाम कमाता चल ।।
अपना देश किधर जाता है ।
इसका पता लगाता चल ।।

कौन खरीदा आजादी को।
 उसको अकल सिखाता चल ।।
हम विचार हमदर्द बुलाकर ।
सबको साथ  मिलाता चल ।।

 सद्विचार हो जहां कहीं भी ।
 उस पर प्रेम लुटाता चल ।।
दक्षिणपंथी हर विचार को ।
मानव धर्म सिखाता चल ।।

जहां कहीं हो गजब गरीबी।
 उसका दर्द मिटाता चल ।।
मुस्कानों को भीतर भरकर।
 बाहर नजर घुमाता चल।।
 
हरियाली मौसम को देखो ।
मन को भी बहलाता चल।।
 फूलों जैसा महक उठो तुम।
 गीत प्रेम का गाता चल।।
 
चिड़ियों और सभी जीवो से ।
मन ही मन बतियाता चल ।
संघर्षों में हर विवेक से ।
अपनी राह बनाता चल।

 खुद से बाहर आकर अपना।
 सारा धर्म निभाता चल ।।
मानवता को मानवता से ।
मानव को समझाता चल।।

 मधुर मधुर मुस्काता चल।
 अच्छा नाम कमाता चल ।।
@
                              

दाल में 
नमक की तरह
 सच बोलते हुए 
हमने कहा ,
मौसम खराब है ।
मत देखो 
मत बोलो 
मत सुनो,
 हो सके तो ,
धृतराष्ट्र बन जाओ ।
अथवा खिसक कर
 गांधीजी के 
तीन बंदर।
 लेकिन 
समस्या वहां भी है।
 जो मुंह बंद रखता है ,
वह देखता है
 सुनता भी है ।
और जो कान बंद रखता है,
 वह देखने के साथ 
बोलता भी है ।
और वह जो ,
आंख बंद रखता है,
 सुनता है 
और फुसफुसाता भी है ,
मालूम नहीं क्या?
मगर हम ,
प्रश्नवाचक हैं ,
प्रश्नवाचक , 
आजकल ।।
@


जीवन मधुर बनाना होगा ।
सदा सत्य अपनाना होगा।।
 दुनिया भर के आडंबर को।
 मन से दूर भगाना होगा।।
 
शांति भाव से मर्यादा के।
 भीतर रहकर गाना होगा।।
 खुद को ही इंसान बना कर ।
सब पर प्यार लुटाना होगा।।
 
जो भी है इंसान विरोधी।
 उसको सबक सिखाना होगा ।।
नर नारी बच्चों का जीवन ।
सुखमय सदा बनाना होगा ।।

पावन मन से पावन बातें ।
मिलने पर बतियाना  होगा ।।
लाभ कमाने में औरों को ।
पूरा लाभ दिलाना होगा।।
 
सामाजिक ताने-बाने में।
 अपना फर्ज निभाना होगा ।।
भारत के उत्तम भविष्य का ।
सपना रोज उगाना होगा ।।

राष्ट्र विरोधी हर विचार को ।
यत्र तत्र दफनाना होगा।।
 सामाजिक सद्भाव बढ़ाकर।
 मानवता को लाना होगा ।।

जीवन मधुर बनाना होगा।
 सदा सत्य अपनाना होगा ।।
        @                     



जागो आज बिहार सवेरा आएगा ।
देश उछलकर तेरा साथ निभाएगा।
सत्य उठेगा गोला दागेगा ।
लोकतंत्र फिर  जीवित हो जाएगा ।।
जागेगा इंसान बहादुर मौसम में ।।
नव बिहार कुछ नया जागरण लाएगा ।
संविधान भी जीवित होगा अमर यहाँ
शब्द शब्द जीवित हो जाएगा ।
अंधेरे को चीर फाड़कर फिर कोई
रोशनियों को यहाँ बुलाएगा ।।
हम कहते हैं यह बिहार ही 
कुछ और नया कर जाएगा
हमको तो लगता है वह
सूरज  भी नया उगाएगा।।
डूब गए इस लोकतंत्र कीनैया को
 निश्चित ही वह पार लगाएगा ।
प्रतिभा की यह जन्मभूमि है मंदिर है
यह प्रकाश को धरती पर दौड़ाएगा।
जनक बुद्ध चाणक्य भूमि पर
सद्विचार फिर लाएगा ।
सबको राह दिखाएगा।।

जागो आज बिहार सवेरा आएगा।
देश उछलकर तेरा साथ निभाएगा ।
@

                                  

नतीजा (कर्मफल) अब आने लगा है ।
असर दूरगामी दिखाने लगा है।
बिकने से जो बचा है , भरमाने लगा है।
क्या कहें यह देश किधर जाने लगा है।
सुबह उठते ही कोई
 झूठ का मुलम्मा चढ़ाने लगा है ।
गधा को क्या कहें, वह बेशुमार गाने लगा है ।।
मेरा मन अब तो गरमाने लगा है ।।
कल क्या होगा यह प्रश्न भी उठाने लगा है ।।
चलो देखते हैं एकजुट होकर ।
वक्त अब हमको बुलाने लगा है ।।
@


उम्मीदों का दीपक जलाना जरूरी।
 हमें प्यार सब पर लुटाना जरूरी।।
भीतर औ बाहर अंधेरा बहुत है ।
उसे आज मन से हटाना जरूरी ।।
@


इतने अच्छे सफल देश को।
 राजनीति ने मारा है ।।
फिर भी कैसे बचा हुआ यह।
 भारत देश हमारा है ।।

भीतर बाहर दो पाटों में।
 षड़ेयंत्रों की धारा है ।
पूँजी निवेश करने वालों का ।
चढ़ा हुआ अब  पारा है ।।

और इन्हीं के बीच छिपा वह।
 भारत का हत्यारा है।।
 यहां दलाली का मौसम है।
 और खोखला नारा है  ।


जो आमंत्रण भेज रहे हैं ।
उनका वही सहारा है ।।
 मिलजुल कर दोनों के हाथों ।
 होता वारा न्यारा है  ।।

जनता के सेवक को देखो ।
वह तो राज दुलारा है ।।
 आज संपदा चली जा रही।
यह  दुर्भाग्य हमारा है  ।।

हम भी गाफिल तुम भी गाफिल।                                       मिलता नहीं किनारा है  ।।
और गुलामी के आगे अब ।
बचा न कोई चारा है ।

इतने अच्छे सफल देश को।
 राजनीति ने मारा है  ।।
@
                          

वह देखो ।
उस आदमी को,
 उसकी गरिमा 
गिर चुकी है ,
मूल्य बिखर गए हैं ।
वहाँ जाओ
 दौड़ो 
जल्दी दौड़ो ।
बिखरे मूल्यों को 
 गिरी गरिमा को 
उठाओ ।
उसके गले में पहनाओ
उसे  संस्कार दो
 फिर आओ 
और अपनी कलम चलाओ ।
और कलमकार कहलाओ।
 अन्यथा
 तुम जो कर रहे हो 
गत्ता भाँज रहे हो 
तीर चला रहे हो
 बेमतलब है 
शायद व्यर्थ भी ।।
    @             


सुबह शाम  कुछ गाता हूं मैं ।
सपने रोज सजाता हूं मैं ।।
कैसे हुआ समय यह पागल।
 हरदम प्रश्न उठाता हूं मैं।।

 संस्कार जीवन मूल्यों का ।
 सबको पाठ पढ़ाता हूं मैं  ।।
किसने ताना-बाना थोड़ा ।
उसका नाम बताता हूं मैं ।।

लक्ष्मी जी ने क्या कर डाला ।
इस पर ही पछताता हूं मैं ।।
कौन विदेशी कौन स्वदेशी ।
 सब पर कलम चलाता हूं मैं ।।

नैतिकता के जो दुश्मन हैं ।
उनको खूब सुनाता हूं मैं ।।
मानवता के प्रेमी जन पर ।
प्रायः प्रेम लुटाता हूं मैं ।।

सामाजिक विद्रूपों पर तो ।
सदा आग बरसाता हूं मैं ।
क्रांति बगावत विद्रोहों पर ।
खुद को ही समझाता हूं मैं ।।

सुबह शाम  कुछ  गाता हूं मैं ।
सपने रोज सजाता हूं मैं ।।
@                      


कथा श्रवण अब कीजिए
 आए बकबक दास ।
वे अपने उत्साह से 
करते हमें  उदास।

 कोई चाबी दे रहा ।
कोई देता दर्द ।।
दोनों हमसे कह रहे ।
दोनों हैं हमदर्द ।।

भाषण सुनकर हो गए ।
कुछ बच्चे बीमार ।।
सारी औषधि हो गई 
बिल्कुल ही बेकार ।।

हम भी लाचारी लिए ।
चले दूसरी बार ।।
परिवर्तन को  देखकर ।
चकित हुआ संसार ।।

मुद्दों को वह खा गया ।
लेकर हरि का नाम ।।
और विरोधी कर रहे ।
बीच राह संग्राम ।।

लक्ष्मी पति के प्यार में ।
दीवाना है यार ।।
यही पुराना रोग है ।
यही पुराना प्यार ।।

तुम तो केवल वोट हो ।
नासमझी के यार।
 वे सब लेकर चल रहे ।
बातों का हथियार ।।

दिल्ली से न्यूयॉर्क तक।
 बँधी हुई है डोर।
 हम तो हरदम कर रहे ।
चौराहे पर शोर ।।

उल्टा सीधा हो गया।
 सीधा उल्टा आज ।
सच्चाई को मारकर ।
बनता गया समाज ।।

नैतिकता को खा गया।
 आज अनैतिक शोर ।।
वही अनैतिक हो गया  ।
  जो बिल्कुल कमजोर ।।
@


जब कुछ होता है 
कहने को 
तब कहा जाता है 
जब कुछ है ही नहीं 
कहने को 
तो तुम 
रोओ 
अपना दुख 
अपनी प्रशंसा 
अपना विरह
अपनी स्थापना 
अपना हास्य व्यंग चुटकुला 
और पालो भ्रम कि 
तुम कवि हो
सर्वज्ञ हो 
विशेषज्ञ हो 
भजन गाते हो 
मनोरंजन करते हो 
मेरी मानो 
आदमी को देखो 
समाज को देखो 
देश को देखो 
गड़बड़ी कहां है 
क्यों है
 सोचो समझो 
फिर कहो 
तब होगी कविता 
वास्तविक ।।
      @              


अब हम
 इस सत्य का 
क्या करें 
जो न बोल पा रहे हैं 
न देख पा रहे हैं 
और कभी-कभी तो 
हम समझ भी नहीं पा रहे हैं 
इस सत्य को 
इसे हम गटक गए हैं
 बीच में ही लटक गए हैं 
सामने पड़ा है 
झूठ 
उसी से काम चलाते हैं 
हाड़  मांस गलाते हैं 
खुद को जलाते हैं 
और झूठ को ही
 माई बाप बनाते हैं 
उसी का गीत गाते हैं 
जीवन बिताते हैं 
 चले जाते हैं।।
@

                     
सीधे तीर चलाना सीखो ।
अपना देश बचाना सीखो ।
कौन यहाँ गड़बड़ करता है।
जल्दी उसे हटाना सीखो ।।

कहाँ फँसा है देश हमारा।
इसका पता लगाना सीखो ।
घर में बैठे सोच रहे हो।
घर से बाहर आना सीखो ।

कुछ बंधन हैं, कुछ रुकावटें ।
क्रमशः उन्हें हटाना सीखो ।
कितने अब अंग्रेज बचे हैं।
उनको मार भागना सीखो ।।

अपने प्यारे लोकतंत्र को ।
मजबूती में लाना सीखो ।।
अपने घर में लूट मची है।
इसपर रोक लगाना सीखो ।

और समानता के दर्शन को।
भारत में फैलाना सीखो ।।
नैतिकता के गिरे ग्राफ को।
ऊपर जरा उठाना सीखो ।।

खुद ही हम बाजार बनेंगे ।
खाना और खिलाना सीखो ।।
कंगूरे पर जो बैठे हैं ।
उन्हें जमीन पर लाना सीखो ।।

जहाँ जरूरत रुदन कर रही।
वहाँ रसद पहुँचाना सीखो ।।
भाईचारा के विचार को ।
जीवन में अपनाना सीखो ।।

अपना ऊँचा रहे तिरंगा ।
वही गान बस गाना  सीखो ।।
मानवता के लिए समर्पित ।
सारा प्रेम लुटाना सीखो ।।

परोपकार का भाव जगा कर ।
जीवन सफल बनाना सीखो ।।
सोए हो तुम कहाँ मुसाफिर ।
खुद को आज जगाना सीखो ।।
@
                     
झूठ की 
लंगडी आंधी में 
जब गिर रहे थे
 चारों खंभे
 इमारत के
 और हम 
उड़ रहे थे
 आंधी के साथ 
अगंभीर होकर ।
साथ ही 
नोच रहे थे मुँह
 गंभीर चिंतकों का 
जो हताश थे
 देखकर आवेग
हवा का 
और कह रहे थे
 या बवंडर है 
उड़ा ले जाएगा 
सत्य को 
क्षण भर में।।
            @       


 लाभ हानि के 
भौतिक तुला पर 
तुल रहा 
व्यवहार 
व्यवहार नहीं होता।
  व्यवहार होता हैं 
प्रेम
 बंधुत्व 
और अपनत्व ।
जिसकी आधारशिला है 
अपनापन।
 वह नहीं तो
पूरा व्यवहार 
एक धंधा है 
बिजनेस है 
और घृणित व्यवहार भी ।।
@

 सुबह शाम कुछ गाना होगा ।
 अपना देश बचाना होगा ।
आजादी जो चली गई है ।
उसको वापस लाना होगा।। 

संविधान का पहला पन्ना ।
पढ़कर रोज सुनाना होगा ।।
जो प्रहार करते हैं हम पर ।
उनको आंख दिखाना होगा ।।

लूटपाट पर रोक लगाकर ।
अपना देश बनाना होगा ।।
 जहां पसीना गिरे हमारा ।
संयम वहीं  उगाना होगा ।।

भारत की प्यारी धरती का ।
बढ़कर मान बढ़ाना होगा ।।
 सदा विदेशी हवा देखकर ।
अपना नियम बनाना होगा ।।

 कैसे होगा सत्य प्रतिष्ठित ।
 इस पर जोर लगाना होगा ।।
 खुशहाली के वायुयान को।
 भारत में दौड़ाना  होगा ।।

इंसानों की इस  बस्ती में।
 सदा प्रेम बरसाना होगा ।।
जलचर थलचर नभचर जो हैं।
उनको गले लगाना होगा ।।

 सुबह शाम कुछ गाना होगा ।
अपना देश बचाना होगा  ।।
@

 गुर्राहटों के बीच
यह जो
तेजी से
गिर रहा है
जनतंत्र।
इसे उठाओ 
और तख्त से कह दो
यह वक्त
गुर्राने का नहीं,
देश बचाने का है।
इसे हिटलर को देने से
 बेहतर है
जनता को दे दो।
और कहो कि
इसमें पसीना मिलाओ
शायद खड़ा हो जाय 
देश
फिर से ।
चरमराए हुए खंभों को देखो
और हो सके तो 
उसे
सौंप दो 
अपना हाथ
खड़ा करने से पहले
और खड़े हो जाओ
पक्ष में
देश के 
तत्काल ।।
          @

असहमति की समझ
 और सहमति का
 विवेक लिए ,
जब एक कवि 
लड़ता है 
सामाजिक 
राजनीतिक 
आर्थिक गुलामी से,
  निराश होते ही 
उतर आता है 
कविता में ।
और लगता है
 उगलने 
अपने भीतर का 
खाया पचाया 
हाहाकार ,
शब्दों में ।
जो कि होते हैं 
नाकाफी ,
अनुभव और अनुभूति 
दोनों से ,
फिर भी 
वह रंगता है 
पन्नों को ,
 अपने  ही ,
भोगे हुए यथार्थ से।
 एक बार नहीं ,
 बार-बार 
पूरे साहस से।
 ताकि 
पा सके निजात ,
इन गुलामियों से 
इंकलाब के पहले
 एक दिन ।।

                       अन्वेषी

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