" मन के दीप जलाओ "*-------डॉ. वेदपति मिश्र*
" मन के दीप जलाओ "
*-------डॉ. वेदपति मिश्र*
दूर करो , प्रभु ! अंधियारा,
मानव-जीवन , तम से हारा ।
रोजी से रोटी ग़ायब है,
सीपी से मोती सारा ॥
राम- महल में डाकू सक्रिय,
आम-आदमी किसे पुकारे ?
हल्कू की है वही कहानी !
आख़िर किसकी ओर निहारे ॥
पर्व-अर्थ क्या दीप जलाना ?
या फिर भूंखा पाये खाना ?
माँ वसुधा की व्यथा यही है-
कृषकों को है लोन चुकाना ॥
आम-आदमी या संन्यासी ,
भजता रहता मथुरा , काशी ।
बाबा को आती है ख़ासी ,
करें उँधारी, लगती फाँसी॥
बेटी घर में हुई सयानी ,
शादी की है बात चलानी ।
कान चबाती दादी-नानी !
दीप जलेगा, क्या फिर पानी?
दूल्हा है बाज़ार बिकाऊ ,
दाम करोड़ों, कहाँ से लाऊँ?
दाँतों को यदि तोड़, बेंच दूँ
फिर मैं कैसे पीऊँ - खाऊँ ?
छोटू की तो शर्ट फटी है ,
कालिज-फी , भी नहीं पटी है ।
फिर कल कैसे मने दीवाली ,
सजे दीप-पूजन की थाली ॥
सम्बन्धों की खाईं चौड़ी ,
आघातों की रेलें दौड़ी ।
जातिवाद का तन्त्र चल रहा,
मानवता का मन्त्र छल रहा ॥
आशाओं का धैर्य टुटा है ,
जन-जन का सुख-चैन लुटा है।
मन की व्यथा, लिखी छन्दों पर,
सरकारें चलती , चन्दों पर ॥
अगर मनानी है दीवाली -
विश्वासों के दीया- प्याली -
में, घृत- दीप जलाना होगा,
जन-मन को सहलाना होगा ॥
सूर्यवंश-अवतंश राम हैं-
नृप - पितु आज्ञाकारी ।
सियराम के बिना देश की-
कौन करे रखवारी ?
जिनको अब तक बालक जाना-
वह हैं जग के स्वामी !
राजनीति में सभी बनें अब-
राम-चरण - अनुगामी ॥
तम की कलुष कालिमा मेंटो -
सुखद लालिमा पाओ ।
तमस - निशा से जगकर प्यारे-
मन के दीप जलाओ ॥
डॉ. वेदपति मिश्र, प्रयागराज
Comments
Post a Comment