*जरा ठहरो तुम्हारे रूप का मै आचमन कर लूँ।।**-------- मुक्तक कार गिरीश कुमार गिरीश*

*जरा ठहरो तुम्हारे रूप का मै आचमन कर लूँ।।*
*-------- मुक्तक कार गिरीश कुमार गिरीश*
जरा ठहरो तुम्हारे रूप का मै आचमन कर लूँ।। 
सुमन अर्पित करूँ श्रद्धा से झुक कर मै नमन् कर लूँ।।
धधकती रहती तन मन में मेरे जो प्रेम की ज्वाला-
 तुम्हारे प्रेम के वर्षा विना कैसे समन कर लूँ।।

धड़कता ही नहीं दिल इस में स्पन्दन नहीं होता
न आओ याद तुम ऐसा कोई भी छन नहीं होता।। 
सुकूँ और चैन मिलता है तुम्हारे साथ होने से 
तुम्हारे पास से जाने का जानम मन नहीं होता।

ये हरियाली कहाँ होती अगर सावन नहीं होता।। 
अगर सांसें नहीं होती तो ये जीवन नहीं होता।। 
ये निधिवन और वृन्दावन की चर्चा तक नहीं होती-
न होती राधिका घनश्याम तो मधुवन नहीं होता।।

रवानी गर नहीं होती तो ये कल कल नहीं होता।। 
अगर गंगा नहीं होती तो अमृत जल नहीं होता।। 
समन्दर से अगर मिलने की आतुरता नहीं होती-
हृदय ब्याकुल नहीं होता कभी हलचल नहीं होता।।
----------9919667469

Comments

Popular posts from this blog

हिन्दी प्रवक्ता पद का कार्यभार ग्रहण किया

शिक्षा द्वारा हजारों बच्चों की जिंदगी बनाने वाली राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त प्रधानाध्यापिका सुश्री ललीता गुलाटी का दु:खद निधन

सिटी इंटरनेशनल स्कूल की छात्राओं ने किया विद्यालय का नाम रोशन