*अस्तित्व का सवाल है.....!*
*अस्तित्व का सवाल है.....!*
पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ.....!
गुफ्तगू में मशगूल थीं....
एक-ब-एक सुगबुगाते हुए
"नाक" आगे आकर बोलती है...
सोशल मीडिया के इस दौर में....!
आप सब की उपयोगिता है....
काला-सफेद और रंगीन...
"आँख" सब कुछ देखती है....
भला-बुरा दोनों ही....
"कान" सुनता रहता है....
संदेश देने को...."जिह्वा" को...
हिला-डुला लिया जाता है....
और "त्वचा" के स्पर्श से ही..…
मोबाइल चलाया जाता है...
मेरा तो....कोई सरोकार नहीं...
बस निराकार साँसे देकर...!
व्यक्ति को जिंदा किए भर हूँ....
फिर रोती हुई बोली....
तुम सब भी ध्यान मेरा नहीं देते
सुध भी मेरी....कभी नहीं लेते...
मुझे तो लगने लगा है....
कि....डार्विन का सिद्धांत....!
अब मुझ पर लागू होने वाला है....
उपयोगिता के आधार पर....
मेरा अस्तित्व ही....
जल्दी खत्म होने वाला है...
इसलिए...सहेलियों तुम सबसे..
मेरी आरजू है....
कि मेरी इस व्यथा पर...
गहराई से विचार कीजिए...
मत समझिए कि....!
यह मेरी नाक का सवाल है....
बस इतना समझिए कि...!
यह मेरे अस्तित्व का सवाल है...
यह मेरे अस्तित्व का सवाल है...
रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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