*कितनी सच्चाई है.....?**----- जितेन्द्र कुमार दुबे*

*कितनी सच्चाई है.....?*
*----- जितेन्द्र कुमार दुबे*
जाने क्या....और जाने कैसा...?
शायद....कुछ नया-नया सा...
करने का...कर गुज़रने का...!
जोश है...उत्साह है....विश्वास है
समाज से...इनका अलगाव है...!
मन में बिछोह है...विद्रोह है...
घर-परिवार से....और...
पारम्परिक रीति-रिवाज से...
मनमानेपन की हद है...और...
मतवालेपन की जिद है....
इनके...मन पर या सर पर....!
ना किसी तरह का कोई बोझ है...
इनमें व्यवस्था से....आक्रोश है...
विचलन की उम्र में अपने....!
ये ...खुद ही आँक रहे हैं....
दुनियावी घाटा और मुनाफा....
बेवकूफ हैं...उनकी नजर में...!
देश के....सभी कर्णधार...
मान के चल रहे हैं सब ही...!
देश की नाव डूबने को है मँझधार,
बचाने को...अपने हाथ में लेकर..
कई-कई पतवार....
घोषित किए हैं सभी...
खुद ही....खुद को...!
नाविक....बेहद होशियार...
सही समझ रहे हो....!
आप सब मेरे भाई....
जाने किधर से....?
जेन जी की...ऐसी टीम है आई...
इनके पास...चाय है...सुट्टा है...
बीड़ी है...कचौड़ी है.....
संग इसके समोसा है....
अचरज़ तो देखो प्यारे....!
इस पर...इनको खूब भरोसा है...
इसी से इनको...हर नुकसान की..
करनी भरपाई है....और....
इसी से... टूटे रिश्तों की....
करनी तुरपाई है....!
अब प्रश्न यह मैं....
आप पर...छोड़ता हूँ प्यारे....
कि...परखिए आप सब यह कि..!
इनके दावे में...कितनी सच्चाई है
इनके दावे में...कितनी सच्चाई है

रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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