आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि आज भी प्रासंगिक : डॉ. अलका प्रकाश
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि आज भी प्रासंगिक : डॉ. अलका प्रकाश
प्रयागराज। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की 142वीं जयंती के उपलक्ष्य में 05 अक्टूबर 2026 को प्रो. राजेन्द्र सिंह रज्जू भैया विश्वविद्यालय, प्रयागराज के अकादमिक-ए, जी-10 में ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की दृष्टि से परिचित कराते हुए उसकी वर्तमान प्रासंगिकता को रेखांकित करना था।
कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अखिलेश कुमार सिंह रहे। समन्वयक हिंदी विभागाध्यक्ष एवं अधिष्ठाता कला संकाय प्रो. आशुतोष कुमार सिंह रहे। मुख्य अतिथि डॉ. मुक्ता अध्यक्ष, रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान आभासी माध्यम से विद्यार्थियों से जुड़ीं जबकि विशिष्ट अतिथि डॉ. अलका प्रकाश गौरवमयी उपस्थिति रहीं।
अपने व्याख्यान में डॉ. अलका प्रकाश ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास, आलोचना और निबंध-परंपरा के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनके बिना हिंदी की वैचारिक नींव अधूरी मानी जाएगी। उन्होंने कहा कि शुक्ल जी ने साहित्य को केवल राजाओं और दरबारों की कथा न मानकर उसे समाज की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक संरचना तथा लोक-चेतना से जोड़ा। उनकी साहित्य-दृष्टि में जनमानस की मनोवृत्तियों और साहित्यिक प्रवृत्तियों का गहरा संबंध दिखाई देता है।
डॉ. अलका प्रकाश ने शुक्ल के वीरगाथाकाल, भक्ति काल, रीति काल और आधुनिक काल संबंधी काल-विभाजन एवं नामकरण की तार्किकता को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी साहित्य के इतिहास की बुनियादी समझ के लिए आज भी आचार्य शुक्ल की पुस्तक का अध्ययन अपरिहार्य है। उन्होंने ‘चिंतामणि’, ‘कविता क्या है?’ तथा ‘भाव या मनोविकार’ जैसे निबंधों के माध्यम से उनकी आलोचना-दृष्टि, लोकमंगल की भावना और मानवीय संवेदना पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि डॉ. मुक्ता ने आचार्य शुक्ल की बाल्यावस्था से ही लेखन में रुचि, उनके इतिहास-लेखन की यात्रा तथा साहित्यिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें ‘हिंदी निर्माता’ की संज्ञा दी। उन्होंने ‘मनोहर कला’ कविता का उल्लेख करते हुए शुक्ल जी के रचनात्मक व्यक्तित्व पर चर्चा की। साथ ही बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ और श्यामसुंदर दास से उनके निकट संबंधों तथा नागरी प्रचारिणी सभा से जुड़ने के प्रसंगों को विद्यार्थियों के सामने रखा।
उन्होंने बताया कि जायसी और तुलसीदास को हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठित करने में आचार्य शुक्ल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। तुलसीदास को उन्होंने ‘जीवन गाथा का कवि’ कहा। डॉ. मुक्ता ने ‘विश्व प्रपंच’ की भूमिका के संदर्भ में शुक्ल जी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा उनके विभिन्न उद्धरणों के माध्यम से सामान्य जनता के महत्व को भी रेखांकित किया।
वक्ताओं ने कहा कि बदलती सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के बीच भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लोककेन्द्रित, वैज्ञानिक और मूल्यपरक दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अजीत सिंह ने किया तथा आभार ज्ञापन डॉ. बबलू यादव ने किया। इस अवसर पर प्रियंका त्रिपाठी, किसलय सिंह, कोमल यादव, सुमनलता सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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