जौनपुर में श्रीराम कथा का पांचवा दिन, राम वनवास का वर्णन सुनकर भावुक हुए श्रद्धालु
जौनपुर में श्रीराम कथा का पांचवा दिन, राम वनवास का वर्णन सुनकर भावुक हुए श्रद्धालु
जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के पांचवें दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने अयोध्या कांड, सीता स्वयंवर, भगवान परशुराम-लक्ष्मण संवाद, माता सीता की विदाई और भगवान श्रीराम के वनवास समेत कई प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान महाराज ने भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, माता-पिता के प्रति सम्मान, पारिवारिक रिश्तों की पवित्रता और बहू को बेटी के समान मानने का संदेश दिया। माता सीता की विदाई और राजा दशरथ के दुख का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। शांतनु महाराज ने श्रीराम कथा के मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह के बारे में कहा कि वह एक ऐसे इंसान हैं जो किसी भी कार्य को बड़े ही मनोयोग से करते हैं इसका अंदाजा श्रीराम कथा में व्यवस्थाओं से लगाया जा सकता है। आचार्य शांतनु जी महाराज ने सीता स्वयंवर के बाद भगवान परशुराम के आगमन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि भगवान परशुराम की नजर जब दो खंडों में टूटे भगवान शिव के धनुष पर पड़ी तो उनका क्रोध बढ़ गया। इसी दौरान लक्ष्मण जी के साथ उनका तीखा संवाद हुआ। भगवान परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान श्रीराम ने विनम्रता का परिचय देते हुए कहा कि धनुष तोड़ने वाला कोई सेवक ही रहा होगा। महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि भगवान श्रीराम का स्वभाव करुणा, विनम्रता और मर्यादा से परिपूर्ण था। उनका व्यवहार हर परिस्थिति में लोगों को संयम और सद्भाव की सीख देता है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का चरित्र और उनकी भक्ति निराली है। गोवंश की रक्षा सहित धर्म और मर्यादा की स्थापना के लिए भगवान का अवतार हुआ। श्रीराम के आदर्शों को जीवन में अपनाकर समाज में प्रेम, सेवा और सद्भाव की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
महाराज ने सीता स्वयंवर के बाद जनकपुर में विवाहोत्सव और बारात के एक महीने तक ठहरने का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि राजा जनक ने महाराज दशरथ और पूरी बारात का विशेष आतिथ्य-सत्कार किया। इसके बाद जब माता सीता की विदाई का समय आया तो राजा जनक भावुक हो उठे। अपनी पुत्री को विदा करते समय उनके आंसू छलक पड़े। माता सीता भी पिता जनक से लिपटकर रोने लगीं। पिता-पुत्री के इस भावपूर्ण दृश्य ने पूरे जनकपुर को भावविभोर कर दिया। आचार्य शांतनु जी महाराज ने बताया कि विदाई के समय राजा जनक ने महाराज दशरथ से अपनी पुत्री का विशेष ध्यान रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जानकी को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए। विदाई के समय राजा जनक ने जब महाराज दशरथ के सामने सिर झुकाया तो दशरथ जी ने उन्हें सम्मान देते हुए कहा कि आप बड़े हैं, क्योंकि दाता बड़ा होता है। आपने मुझे अपनी बेटी सौंपी है। महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से पिता और बेटी के रिश्ते की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि संसार में पिता-पुत्री का रिश्ता अत्यंत पवित्र होता है। पिता अपनी बेटी के जीवन में सुरक्षा, विश्वास और आत्मसम्मान का आधार होता है। बेटी के मायके से जुड़े रिश्तों में पिता का स्थान विशेष होता है। उन्होंने कहा कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को बेटी के सम्मान और उसके भावनात्मक जुड़ाव को समझना चाहिए।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने बताया कि जब बारात अयोध्या पहुंची तो माता कौशल्या ने बहू जानकी का स्वागत किया। इस दौरान तीनों माताओं ने अपने-अपने भाव के अनुसार माता सीता को उपहार दिए। माता कौशल्या ने भगवान श्रीराम को ही अपना उपहार बताया। माता कैकेयी ने कनक भवन देने की बात कही, जबकि माता सुमित्रा ने कहा कि उनका पुत्र लक्ष्मण आज से सीता की सेवा में रहेगा और माता सीता ही उसकी मां के समान होंगी। इस प्रसंग के जरिए महाराज ने परिवार में आपसी प्रेम, त्याग और समर्पण की भावना को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवार व्यवस्था की मजबूती आपसी सम्मान और रिश्तों की मर्यादा में निहित है। जिस घर में बहू को बेटी का सम्मान मिलता है, वहां प्रेम और सद्भाव का वातावरण बना रहता है। उन्होंने कहा कि राजा दशरथ ने अपनी बहुओं को बेटी के समान स्नेह और सम्मान दिया। समाज के लोगों को भी उनके आदर्शों से सीख लेनी चाहिए। जिस दिन बहू अपने ससुर को पिता और सास को मां के समान समझने लगेगी तथा ससुराल के लोग भी उसे बेटी की तरह अपनाएंगे, उस दिन परिवारों की अनेक समस्याओं का समाधान अपने आप होने लगेगा।
कथा के दौरान आचार्य शांतनु जी महाराज ने गुरु विश्वामित्र की विदाई का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि जब गुरु विश्वामित्र के जाने का समय आया तो राजा दशरथ भावुक हो गए। उन्होंने गुरु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने उनके परिवार पर बहुत बड़ा उपकार किया है। गुरु विश्वामित्र की विदाई के समय राजा दशरथ का भावुक होना गुरु-शिष्य और श्रद्धा के रिश्ते की गहराई को दर्शाता है। महाराज ने कहा कि जीवन में कभी खुशियों का माहौल रहता है तो कभी ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं, जिनसे पूरा परिवार दुख में डूब जाता है। इसलिए सुख के समय विनम्रता और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना चाहिए। जीवन की अनिश्चितता को समझते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। अयोध्या कांड के सबसे मार्मिक प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्य शांतनु जी महाराज ने बताया कि एक ओर अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, वहीं दूसरी ओर माता कैकेयी कोपभवन में बैठी थीं। जब राजा दशरथ को इसकी जानकारी मिली तो वह व्याकुल होकर उनके पास पहुंचे और उनसे नाराजगी का कारण पूछा। माता कैकेयी ने राजा दशरथ को उनके द्वारा दिए गए दो वरदानों की याद दिलाई। राजा दशरथ ने प्रसन्नता के साथ उनसे वरदान मांगने को कहा। लेकिन जब कैकेयी ने अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी और भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा तो राजा दशरथ के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस अयोध्या में राज्याभिषेक की खुशियां मनाने की तैयारी थी, वहां अचानक शोक छा गया। महाराज ने बताया कि यह प्रसंग राजा दशरथ के लिए असहनीय था। एक ओर उन्हें अपने वचन का पालन करना था, तो दूसरी ओर पुत्र श्रीराम से बिछड़ने का दुख सहना था। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन और परिवार की मर्यादा की रक्षा के लिए वनवास स्वीकार किया। यह प्रसंग त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और मर्यादा पालन का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, व्यक्ति को अपने कर्तव्यों, वचनों और संस्कारों से पीछे नहीं हटना चाहिए। परिवार में प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना रहे तो कठिन से कठिन समय का सामना किया जा सकता है। श्रीरामकथा में राज्यमंत्री गिरीश चन्द्र यादव, पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राकेश सिंह, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय सचिव शैलेंद्र सिंह गुड्डू, विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. विनोद कुमार सिंह, डॉ. मनोज मिश्रा, चेयरमैन मनोरमा मौर्या, राम सूरत मौर्या, माउंट लिट्रा जी स्कूल के निदेशक अरविंद सिंह, पूर्व विधायक दिनेश चौधरी, पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. रणजीत सिंह, अमित सिंह, सुमित सिंह, महंत तपसी धाम जय बक्श दास महाराज, जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के राकेश उपाध्याय, सेवा भारती के प्रांत प्रमुख एवं संत अतुलानंद कॉन्वेंट के निदेशक राहुल सिंह, पुरेव के रिंकू महाराज, रजनीकांत मिश्र अमरावती ग्रुप, राजन सिंह, पंकज, महेंद्र सिंह, राधेश्याम सिंह मुन्ना, विनोद मिश्रा, शैलेन्द्र सिंह गुड्डू, शैलेन्द्र सिंह, यादवेंद्र प्रताप सिंह लवकुश, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, दयाल सिंह, मनोज मिश्रा, कुंवर ज्ञानंजय सिंह, मीनाक्षी सिंह, राजेश सिंह, अमरेश सिंह, आदित्य सिंह, मनोज सिंह, डॉ. अरुण मिश्रा, बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद सिंह, डॉ. अजय दुबे और डॉ. सुधीर श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग मौजूद रहे।
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