मध्यकालीन हिंदी साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाएँ : परंपरा और निरंतरता विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी, महिला महाविद्यालय, बीएचयू।मध्यकालीन हिंदी साहित्य भारतीय लोक चेतना का उजाला है ~ भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ काशी भारतीय परंपरा की चेतना है, जहाँ परंपरा ठहरती नहीं है बल्कि निरंतर प्रवाहित होती रहती है ~ भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’जब भक्ति सामूहिक चेतना बनती है, तब वह उत्सव बन जाती है ~ भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’मध्यकालीन हिंदी साहित्य में विभिन्न कलाओं का अद्भुत समन्वय है ~ माननीय कुलपति, प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी

मध्यकालीन हिंदी साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाएँ : परंपरा और निरंतरता विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी, महिला महाविद्यालय, बीएचयू।
मध्यकालीन हिंदी साहित्य भारतीय लोक चेतना का उजाला है ~ भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ 
काशी भारतीय परंपरा की चेतना है, जहाँ परंपरा ठहरती नहीं है बल्कि निरंतर प्रवाहित होती रहती है ~ भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
जब भक्ति सामूहिक चेतना बनती है, तब वह उत्सव बन जाती है ~ भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

मध्यकालीन हिंदी साहित्य में विभिन्न कलाओं का अद्भुत समन्वय है ~ माननीय कुलपति, प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी 


दिनांक 9 से 10 अक्टूबर 2026 को सावित्री बाई फुले प्रेक्षागृह, महिला महाविद्यालय, बीएचयू के तत्वावधान में ‘मध्यकालीन हिंदी साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाएँ : परंपरा और निरंतरता’ विषयक दो - दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन डॉ. हरीश कुमार के संयोजन में संपन्न हो रहा है। यह संगोष्ठी मध्यकालीन हिंदी साहित्य के संपूर्ण मूल्यांकन में एक सर्जनात्मक हस्तक्षेप है। अब तक हिंदी साहित्य में मध्यकाल को लेकर जितनी भी संगोष्ठियाँ हुईं उसमें मध्यकालीन हिंदी साहित्य में कलाओं का क्या स्वरूप था, इस पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया गया था, जो मध्यकालीन हिंदी साहित्य अर्थात् भक्तिकाल और रीतिकाल के सर्वांगीण मूल्यांकन में एक अनदेखा - सा पक्ष था। इस संगोष्ठी के जरिए हम मध्यकालीन हिंदी साहित्य के संपूर्ण स्वरूप से परिचित होंगे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से शब्दों को उधार लेते हुए कहे तो यह संगोष्ठी मध्यकालीन हिंदी साहित्य का कोना - कोना झाँक लेने का एक स्तुत्य पहल है। भारतरत्न महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी की प्रतिमा पर श्रद्धा सुमन अर्पित तथा दीप प्रज्ज्वलन करते हुए कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। विश्वविद्यालय के परंपरानुसार कुलगीत ‘मधुर मनोहर मनोहर अतीव सुंदर, यह सर्वविद्या की राजधानी’ की सुमधुर प्रस्तुति की गई। तबले पर डॉ. ललित कुमार थे। कुलगीत की प्रस्तुति श्रेया, जागृति, इशिता, प्रांजलि तथा अंकिता ने की। इस क्रम में प्रो. उर्वशी गहलौत की पुस्तक ‘रीतिकाव्यरंजनी’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक मंचस्थ विद्वतजनों तथा डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी के कर-कमलों में सुसज्जित था।


संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता बीएचयू के माननीय कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि इस संगोष्ठी का विषय ‘मध्यकालीन हिंदी साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाएँ : परंपरा और निरंतरता’ बहुत ही विशिष्ट है। इस काल के साहित्य में विभिन्न कलाओं का अद्भुत समन्वय है। भक्त कवि गायक भी थे और संगीत के जरिए ईश्वर का नैकट्य प्राप्त करते थे, यह अपने आपने अद्भुत था। आदरणीय पोखरियाल ‘निशंक’ जी के वचनों पर मैं खरा उतरने की कोशिश करूंगा। उन्होंने भक्तिकालीन साहित्य पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के विचारों का भी जिक्र किया।


संगोष्ठी के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ थे। उन्होंने अपने हृदय के गहरे भाव से महामना के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने मंचासीन विद्वानों के प्रति सम्मान व्यक्त किया। उन्होंने कहा प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी जी दुनिया के सबसे भव्य विश्वविद्यालय के कुलपति हैं, वे जुनूनी भी हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारत की संस्कृति का प्राण है। उन्होंने कहा कि आपको अपने दादा जी की अर्थात् आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी की परंपरा को आगे ले जाना है। प्रो. मंगला कपूर जी के संघर्ष को मैं सलाम करता हूँ। यदि जीवन में जुनून हो तो बाधाएँ आपके कार्य के आगे बौनी पड़ जाती हैं। वर्धा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे प्रो. आनंदवर्धन जी बुल्गारिया में जब थे तब भी हिंदुस्तान से अधिक काम कर रहे थे। मेरी पुस्तक ‘महाकुंभ’ का बुल्गारिया में अनुवाद करवाकर उसे वहाँ के पाठ्यपुस्तक में शामिल करवाया, जब वह पुस्तक मेरे पास पहुँची तब मुझे पता चला कि प्रो. आनंदवर्धन जी ने उसका अनुवाद करवाया है। यहाँ के हीरों (मणि) को देश-दुनिया में भेजना है ताकि भारत का नाम उज्ज्वल हो सके। उन्होंने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलगीत सुनकर मन गुनगुना उठता है, इस कुलगीत से आपको सामर्थ्य और विचार मिलता है। शांतिस्वरूप भटनागर द्वारा रचित कुलगीत से आपको सामर्थ्य मिल सकता है। जब हम शोध करते हैं हमें उन साहित्यकारों के सामाजिक चेतना को आगे की पीढ़ी में हस्तांतरित करने का दायित्व उठाना चाहिए। मध्यकालीन हिंदी साहित्य भारतीय लोक चेतना का उजाला है। काशी भारतीय परंपरा की चेतना है, जहाँ परंपरा ठहरती नहीं है बल्कि निरंतर प्रवाहित होती रहती है। कबीरदास जी ने उस समय सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया है। आज भी कबीर उतने ही जीवंत है। छोटी - छोटी बातों को मनुष्य के मन में संजोया है कबीर ने। तुलसीदास ने चरित्र निर्माण का, अनुशासन का, और भारतीयों की धमनियों में संस्कृति का रक्त प्रवाहित किया। मैंने इंडोनेशिया में मुस्लिम बहुल इलाकों में जैसी रामलीला देखी, अद्भुत थी। राम हमारे प्रतीक हैं। जब कथा मंच पर पहुँचती है तब वह अभिनय बन जाती है। यहाँ सब अभिनय कर रहे हैं, घर पर, संसद में , विश्वविद्यालय में। जब भक्ति सामूहिक चेतना बनती है, तब वह उत्सव बन जाती है। जब-जब देश, परिवार और समाज अपनी प्रकृति और संस्कृति से हटकर चला है तब - तब विनाश के गर्त में गया है। परिवार में प्यार होता है और बाजार में व्यापार होता है। हमने इस संसार को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव दिया है जबकि पाश्चात्य ने इस दुनिया को क्या कहा ‘बाजार’ कहा है। हमारे देश को जो प्रधानमंत्री मिले हैं जिन्होंने भारत की संस्कृति को जिया है, हम बहुत सौभाग्यशाली है। भारत की शिक्षा नीति 2020 पूरे संसार में एक प्रमाण बनेगी। जिसने भी अपनी परंपरा, संस्कृति को छोड़ा है, वह आसमान से गिरेगा, हमें अपने संस्कारों की आधारशिला पर खड़ा  होना चाहिए। सूर के पद संगीत की थिरकन पैदा करते हैं।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। गीता के श्लोक का भी उन्होंने ज़िक्र किया।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय महामना के स्वप्न का विस्तार है, हमें उनके स्वप्न को आगे बढ़ाना है। हमें भारत की संस्कृति को दुनिया में प्रतिष्ठित करना है। अमेरिका जैसे विकसित देश बताएं जब हमारे यहाँ नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय थे उस समय उनक देशों में कौन - सा विश्वविद्यालय था! हमनें दुनिया को ज्ञान - विज्ञान, संस्कृति से परिचित करवाया है। प्रधानमंत्री जी ने विचार के साथ नवाचार की बात की है। मुझे भरोसा है कि शब्द को स्वर मिले, स्वर को ताल मिले और यहाँ से साहित्य और कलाओं को नया संसार मिले यही शुभकामनाओं के साथ।


भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित प्रो. मंगला कपूर कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि थी। उन्होंने कहा अपने ही घर में अतिथि बनकर आई हूँ, अच्छा महसूस हो रहा है। आनंद जी और मैंने मिलकर काफ़ी कार्य किया है। अभिनय में संगीत के पक्ष को मैं संभालती थी। उन्होंने बताया कि कबीर, सूर जैसे संत कवियों के पदों हो, तुलसीदास जी की विनय पत्रिका हो या रामचरितमानस मैंने आकाशवाणी में भी गाया है। मध्ययुगीन साहित्य में साहित्य और संगीत का संबंध चोली - दामन का संबंध रहा है। संगीत के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति भक्त कवियों ने की। मीरा इसकी प्रमाण है। पूर्व के आक्रमणों से मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, तब वल्लभाचार्य ने मंदिर को मंदिर न कहकर हवेली कहा, और ऐसा ही कहा जाने लगा ताकि हवेली नाम सुनकर इसे कोई तोड़े नहीं। इसमें भगवान के आठों याम की सेवा विभिन्न रागों में की गई, जिसका स्वरूप कुछ अलग था। 


स्वागत वक्तव्य महिला महाविद्यालय, बीएचयू की प्राचार्य प्रो. रीता सिंह ने दिया। कलाएँ हमारे इंद्रियों को सजग और सक्रिय बनाती हैं। उन्होंने बताया कि पोखरियाल जी का लेखन ग्रास रूट स्तर पर उतरकर लिखा गया है। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व कौशल और साहित्य कौशल से मैं अभिभूत हूँ। विशाल गगन में जो नया सूर्य उदित हुआ है उसमें आपकी आभा उज्ज्वल है। पूरे देश भर में पोखरियाल जी के साहित्य पर शोध हो रहा है। आपने एक लेखक गाँव का निर्माण किया है।भारत गौरव सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान इत्यादि तीन सौ से अधिक पुरस्कारों से आप सम्मानित है। 

अपने घर में स्वागत का स्वाद ही अलग होता है, कुलपति महोदय प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी जी का उनके ही घर में स्वागत है। आपके मार्गदर्शन से हमारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और महिला महाविद्यालय लाभान्वित होता रहता है। इतना ज्ञान, इतनी शक्ति होने के बावजूद भी आपके सरल और सहज व्यक्तित्व से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। आपके मार्गदर्शन में टटकी अर्थात् रिलेवेंट बातें होती रहती हैं। प्रो. मंगला कपूर जी को ‘काशी लता’ के रूप में जाना जाता है, आप हम महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल हैं। आपके समक्ष चुनौतियों के साथ-साथ बाधाएँ आने के बावजूद आप सदैव प्रगति पथ पर बढ़ती रहीं। प्रो. आनंदवर्धन शर्मा जी का स्वागत किया, उनके सहज व्यक्तित्व और उनके उपलब्धियों के बारे में बताया।


बीज वक्तव्य यू.जी.सी.एम.टी.सी. बीएचयू के निदेशक प्रो. आनंदवर्धन शर्मा ने दिया। उन्होंने बताया कि पोखरियाल जी एक संवेदनशील साहित्यकार हैं। इस कार्यक्रम के केंद्र में प्रो. रीता सिंह, प्रो. शोभित कुमार नायर , पद्मश्री मंगला कपूर ,सभी का स्वागत और अभिनंदन किया। भक्तिकालीन साहित्य भारत का स्वर्णकाल था। प्रदर्शनकारी कलाएँ साहित्य को गति प्रदान करती हैं। ईश्वर के प्रति प्रेम को केवल साहित्य और लेखन के जरिए ही नहीं प्रकट किया गया, बल्कि उस प्रेम को गाया गया, नर्तन में ढाला गया, उसको चित्रों में प्रदर्शित किया गया। मध्यकालीन साहित्य मुख्यतः गेय साहित्य था। सूरदास, मीराबाई, कबीर, तुलसीदास इन सबकी रचनाएं गेय थीं। राग मल्हार, राग भैरवी इत्यादि के साथ-साथ सूफ़ी कवियों के यहाँ कव्वाली गायन भी है। मीरा के भजन लोक संगीत का हिस्सा है। हरिदास, तानसेन इसी काल में हुए। एक आधुनिक युवाओं का बैंड है जिसका नाम है ‘कबीर कैफ़े’ जो आधुनिक राग में कबीर के पदों को गाते हैं।भक्तिकाल ने नृत्य को मनोरंजन से  ऊपर उठाया। इसी काल में कत्थक का विकास हुआ। असम में सत्रीया नाट्य की नींव शंकरदेव ने रखी। काशी विशेषरूप से अपने रामलीला के लिए जानी जाती है। ब्रज क्षेत्र में रासलीला का विकास हुआ जिसमें नृत्य में संवाद होते हैं। भक्तिकाल में व्यासपीठ पर बैठकर पदों को गाया गया। पहाड़ी शैली, कांगड़ा, बसौली के साथ साथ मुगल चित्रकला भी थी। अयोध्या और मिथिलांचल में तो ख़ासकर मिथिलांचल के मधुबनी चित्रकलाओं में भक्ति के रंग को देख सकते हैं। स्थापत्य कला पर गोविंददेव मंदिर, राधादेवी मंदिर इत्यादि पर भारतीय चित्रकला के साथ-साथ मुगल चित्रकला का भी प्रभाव था। यदि संगीत, नृत्य और अभिनय का साथ नहीं मिला होता तो भक्तिकालीन साहित्य जन आंदोलन का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाता। ओरछा का राजा राममंदिर के स्थापत्य कला के बारे में भी बताया।

सत्र का संयोजन भोजपुरी लोक साहित्य की विशेषज्ञ, महिला महाविद्यालय, बीएचयू की प्रो. उर्वशी गहलौत ने किया।  

धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शोभित नायर जी ने किया। उन्होंने महाकवि तुलसीदास के एक पद का पाठ भी किया।

हिंदी विभाग, बीएचयू के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’, आचार्य डॉ. अशोक कुमार ज्योति, महिला महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. धीरेंद्र चौबे, डॉ. लक्ष्मण यादव, डॉ. विवेकानंद, डॉ. मनीष कुमार मीणा, प्रो. राजेश पासवान (जेएनयू), प्रो. अंबिका राम (दिल्ली), प्रो. अखिलेश कुमार दुबे, प्रो. प्रकाश चंद्र पटेल डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. गोपाल यादव, डॉ. अनुपम पटेल, श्री सुनील कुशवाहा, भूपेंद्र जी, डॉ. दीपिका दुबे, श्री सच्चिदानंद के साथ-साथ और भी विद्वतजनों की उपस्थिति रही। सावित्री बाई फुले प्रेक्षागृह शोधार्थियों और विद्यार्थियों से भरा हुआ था।


प्रथम अकादमिक सत्र का विषय था : ‘मध्यकालीन साहित्य : विविध स्वरूप’ 

इस सत्र की अध्यक्षता वसंत कन्या महाविद्यालय, बीएचयू की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. आशा यादव ने की। उन्होंने ‘कबीर चिंतन के विविध आयाम’, ‘जीवन के रंग अनेक’ जैसे ग्यारह पुस्तकों की रचनाएँ की है। देश-विदेश की यात्राओं का अनुभव है। ऐसा सत्र संयोजक आचार्य अशोक कुमार ज्योति ने कहा। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आशा यादव ने कहा कि संगोष्ठी का विषय बहुत ही समावेशी है। यह पूरा का पूरा परिवेश तथा संगोष्ठी के पीछे का उद्देश्य विद्यार्थियों के कौशल का विकास करना, नई शिक्षा नीति का रेगुलेटरी टर्म यहाँ फलीभूत हो रहा है। उन्होंने कहा कि वक्तव्यों के बीच - बीच में जो संगीत का प्रवाह गूँज रहा था उससे हमारी श्रवण इंद्रियाँ अघा गईं। ऐसी इच्छा हो रही थी कि उन्हें सुनते रहें, सुनते रहें। प्रो. आशा यादव ने समस्त विद्वानों द्वारा दिए गए वक्तव्यों के सार को स्पष्ट किया। मध्यकाल का दूसरी भाषाओं में जो साहित्य है, हमें अन्य - अन्य भाषाओं के अनुवादित करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हम उन प्रादेशिक साहित्य से परिचित हो सकें। आप शोध के लिए ऐसे विषय चुनिए जो मौखिक परंपरा में साहित्य है, उसे लिपिबद्ध करने की महती आवश्यकता हमें दिखाई दे रही है। ये गीत हमें जीवंत चेतना से युक्त करने में महती भूमिका निभाती हैं। केदारनाथ सिंह की कविता है न कि पांडुलिपियाँ बात करना चाहती हैं, संवाद करना चाहती हैं, छूना चाहती हैं। हमें पांडुलिपियों की भी खोज करनी चाहिए। यदि इस बात पर अमल होता है तो इस संगोष्ठी की सार्थकता होगी। उन्होंने आचार्य डॉ. अशोक कुमार ज्योति के संस्कृत भाषा पर पकड़ की सराहना की।


इस सत्र के मुख्य वक्ता इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के प्रो. राजन यादव, इनकी छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य में विशेषज्ञता है, ने बताया कि भक्तिकाल तथा रीतिकाल में पञ्च कलाओं पर बात करूंगा। विवेकानंद जी का कथन है, चाहे राग से हो, चाहे रेखा से हो , चाहे शब्द से हो हम उसी ब्रह्म से बात कर रहे होते हैं। यदि अन्य ललित कलाएँ शरीर है तो साहित्य श्वास है। सार्थक शब्द समूह को ही हम भाषा के अंतर्गत लेते हैं, नाद भी सार्थक होने चाहिए। छह राग और छत्तीस रागनियाँ हैं। कबीर साहब की बानी में

सबै दिन होत न एक समाना जी… 

एक दिन राजा हरिश्चंद्र जी कंचन भरे ख़ज़ाना 

कंचन भरे ख़ज़ाना संतों 

एक दिन भरे डोम घर पानी

सबै दिन होत न एक समाना जी..

छत्तीसगढ़ में जी लगकर लहजा बदल जाता है।

मोहे भावे जी भक्ति भिलनियां के जी…

वहीं बइठे पंडिताइन, वहीं बइठे शुक्लाइन 

बड़े बड़े ऋषि मुनि गंगा नहावे..

राजा भी आए, महाराजा भी आए 

अरे घंटा बजावे डोमिनियाँ के…

सूरदास का पद 


मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी।

किती बेर मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।

तू जो कहति बल की बेनी ज्यों, ह्वैहै लांबी-मोटी।

काढ़त-गुहत न्हवावत जेहै, नागिनि सी भुइँ लोटी।

काँचौ दूध पियावत पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।

सूर-चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी। 


कइसे धरि मन धीरा, हमार दोऊ हीरा निकर गए

उठत करेजवा में पीरा हमार दोऊ हीरा निकर गए…रामवन गमन का वर्णन। 

उन्होंने बताया कि कवि गंग को तबला वाले अधिक गाते हैं। 

यह प्रसिद्ध सवैया रीतिकाल के कवि कवि गंग गंगकवि का लिखा हुआ है। 

"एक समै जल आनन कों घर ते निकसी अबला बृजरानी।

जाति सु कोल में डोल लिये जल खींचत में अँगिया मसकानी।

देखत वै छतिया उघरी कबि गंग कहै मनसा ललचानी।

हाथ बिना पछिताइ रह्यो यदि कारन डोल में हालत पानीं॥" 

रीतिकाव्य के कवियों का मुकाबला एक तरफ नर्तकियों के साथ और एक साजिंदे के साथ हुआ करता था। रोटी के लिए ग़ज़ब - ग़ज़ब पच्चीकारी करते थे। चित्रकारी में।

बसंत वर्णन (अनुप्रास अलंकारयुक्त प्रसिद्ध कवित्त)

"कूलन में केलिन कछारन में कुंजन में, क्या-कलिन कलीन किलकंत है।

कहै पद्माकर परागन में पौनहूँ में, पानन में पिकन पलासत पंगत है।

द्वार में दिशान में दुनी में देश-देशन में, दीपो दीपन में दीपत दिगंत है।

बीथिन में ब्रज में न बेलिन में बेलिन में, बनन में बागन में बगर्यों बसंत है।" 

क्लासिकल में एक रिदम होता है जबकि लोक स्वतंत्र होता है।

विशिष्ट वक्तव्य देते हुए विश्व हिंदी सचिवालय के पूर्व महासचिव प्रो. विनोद मिश्र ने  असम के कवि शंकरदेव के बारे में बताते हुए कहते हैं कि वे काशी जाते हैं, मथुरा जाते हैं और दक्षिण तक की यात्रा करते हैं। उन्होंने यात्राओं के दौरान महसूस किया कि साहित्य के प्रसार के लिए उसे प्रदर्शनकारी कलाओं से जोड़ना चाहिए। नामघर के न तो कृष्ण की मूर्ति मिलेगी न विष्णु की बल्कि वहाँ ग्रन्थ मिलेंगे। उन्होंने ऐसा साहित्य लिखा जो जन - जन के बीच गाया जाता है। उन नामघरों में केवल ग्रंथ की पूजा, वहाँ सामाजिक मसले भी हल होते थे। कई स्थानों पर स्त्रियों का प्रवेश वर्जित था, इसके विरुद्ध भी शंकरदेव कार्य करते हैं।

वादन असमिया में जाके बायन हो जाता है, असमिया में गायन और बायन की परम्परा पिछले पाँच सौर वर्षों से निरंतर विद्यमान है। मध्यकाल का वह इकलौता संत कवि है जो नाटक भी लिखता है, ‘अंकिया नाट्य’ की परम्परा शुरू करता है। शंकरदेव के पहले कंदिया रामायण की परंपरा मिलती है। युद्ध भूमि में गीता का उपदेश कौन कर सकता है श्री कृष्ण ही कर सकते हैं। पूरे पूर्वोत्तर में श्रीकृष्ण इसी रूप में नामघरों में विद्यमान है लेकिन उन नामघरों में आपको श्रीकृष्ण की मूर्ति नहीं मिलेगी। उस माजुली में रहकर उनके मंडली के लोग आज भी समाजिक और सांस्कृतिक रूप से प्रभावित करते हैं। जहाँ - जहाँ शंकरदेव के चरण पड़े वहाँ से आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाता था। नहीं तो हमने वह भी दौर देखा है जब हिन्दी बोलने वालों को बसों से उतारकर दिनदहाड़े गोली मार दी जाती थी और अखबारों में खबर तक नहीं छपती थी। रूबिन गर्ग कलाकार असम का, जिसकी मृत्यु सिंगापुर में होती है पूरा असम यहाँ तक कि चाय की दुकान तक बंद थी। स्वयं शंकरदेव नाट्य में मंचन करते थे और अभिनय की भूमिका भी निभाते थे। हमारे यहाँ तो जाति व्यवस्था घृणित रही है लेकिक असम ने इस व्यवस्था को तोड़ने का काम किया। जातियों का तो पूरा ताना - बाना तोड़कर रख दिया था। मेरे पास एक शोध प्रबंध आया था गोहाटी विश्वविद्यालय से। जिसमें हिंदी और असम के कहावतों पर काम किया था, उसने कहा हमारे यहाँ ऐसी कहावतें नहीं है जो मनुष्य को ऊँच - नीच सिद्ध करे तब मैंने कहा कि हमारे समाज ने यह घोर अपराध तो हुआ है। मैंने कहा कि आपको शंकरदेव का शुक्रगुजार होना चाहिए। शंकरदेव के नाटक में सूत्रधार भी है। भाषा का यदि हमें विस्तार करना है तो जब विद्यापति को पढ़ाया जा सकता है तो शंकरदेव को क्यों नहीं। संतों के केवल उत्तर भारत के संत ही क्यों ? पूर्वोत्तर भारत के संतों को भी पढ़ाया जाना चाहिए। कैसे हमारे भारतीय परंपरा में पूर्वोत्तर भारत के संतों का योगदान है। मध्यकालीन साहित्य में इन संतों का बहुत सराहनीय योगदान है।


ललित कला अकादमी, लखनऊ के अध्यक्ष प्रो. सुनील विश्वकर्मा जी द्वारा श्री राम का स्केच बनाया गया था, जो रामलाल की जन्मभूमि अयोध्या में मूर्ति स्थापित है, उसके स्केचिंग में आपका भी योगदान है। उन्होंने कहा कि आज का विषय बहुत ही सरस है। मैं साहित्य को और कवि को कलाकार से अलग नहीं मानता क्योंकि ललित कलाओं में साहित्य भी शामिल है। कवियों ने भक्ति की दो धाराओं में बात किया है, कोई सगुण में  कोई निर्गुण में। कोई प्रेम की बातें कर रहा है। उस समय का काल संक्रमण का काल था, उस समय हम धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर टूट रहे थे, हमारे मूर्तियों को, कला स्थापत्यों को तोड़ा जा रहा था, धार्मिक ग्रंथों को लाल कपड़ों में बंद किया जा रहा था उस समय ये कवि पैदा हो रहे थे। नागर शैली में खजुराहो बनता है, द्रविड़ शैली में बृहदेश्वर मंदिर बन रहा था। काशी का नागनथैया लीला प्रसिद्ध है जो अभी कुछ दिनों के काशी के घाटों पर होगा। मुगल आएं उस समय में भी महाभारत और रामायण चित्रों में रचे गए। जब दीवारों से चित्र हटें तो ताड़ पत्रों, पन्नों में आ गए। राजस्थान के भोपा -भोपी करके एक गायन मंडली होती है। कला साहित्य को समाज में सरल बनाकर समाज को उपलब्ध करवाती हैं। सगुण और निर्गुण संतों के मध्य सेतु का कार्य आचार्य रामानंद ने किया था। जब आपस में पंथों में द्वंद्व होता है तब कलाकार निकलकर आता है और उनके मध्य सामंजस्य स्थापित करता है।

राम नाम का नाव बनाई, भक्ति का पतवार

मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान सागर में नैया डार गई..



इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संगीत विभाग से पधारे डॉ. सुरेन्द्र कुमार ने ‘मध्यकालीन साहित्य में सांगीतिक पक्ष’ का योगदान विषय पर अपनी बात रखी। यह इस साहित्य का बहुत ही महत्त्वपूर्ण पक्ष है। मध्यकालीन साहित्य केवल सुनने के लिए ही नहीं बल्कि गाने के लिए भी किया गया था। संगीत की उपस्थिति हमें कृष्ण काव्य, राम काव्य , सूफी काव्य तथा रीतिकाल में अलग-अलग  शैली में संगीत है। संगीत कबीर का वह तत्व है जो जनता तक उनकी वाणी को जन गम्य बताती है। कबीर का ‘सबद’ शब्द ही गायन को व्यक्त करता है। कबीर का संगीत शास्त्रीय गायन के बजाए लोक गायन और लोक परंपराओं में सन्निहित है। सुरेन्द्र जी ने कबीर का पद 

‘मुखड़ा क्या देखे दर्पन में, दया धरम नहीं मन में

हां रे…. मुखड़ा क्या देखे दर्पन में। 

अमवा के डारे कोयलिया बोले, अमवा के डारे…..

मोरवा बोले बन में हाँ जी.…. मुखड़ा क्या देखे दर्पन में। यह राग भैरव पर आधारित है।


‘कवन ठगवा नगरिया लुटल हो, लुटल हो…

सुन री सखी मेरी माँग सजावो, दुलहा मोसे रुसल हो…

कवन ठगवा नगरिया लुटल हो….

कवन ठगवा नगरिया लुटल हो! 

मध्यकालीन संत परंपरा में गुरु नानक जी का भी बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके पदों को कई रागनियों में गाया गया है। इनकी रचनाओं में रागात्मकता है, जो लोकाभिमुख है। मध्यकालीन साहित्य में भक्ति को व्यक्त करने और संवेदनाओं को उभारने में भी इस साहित्य के सांगीतिक पक्ष का महत्त्वपूर्ण योगदान है। मीराबाई जी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में हमारे साहित्य में है। उनके उदारहण के बिना यह साहित्य और यह संगोष्ठी अधूरी होती। मीरा के पदों में संगीत भावों की अभिव्यक्ति हुई है। मिश्र भैरवी में..

कहियो रे…. हे हे हे…नैना 

कहियो रे…प्रभु आऽवन के 

आपने लिख न ही भेजे 

नदियाँ बहे जैसे सावन के

आवन के, मनभावन के 

कोई कहियो रे….


पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

वस्तु अमोलकी, कृपा कर अपनायों

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। 

चित्तौड़ में जहाँ मीरा कृष्ण के पद गाया करती थी, वहाँ मुझे मौका मिला गाने का। 

सूरदास के पदों का व्यापक प्रयोग कृष्ण कीर्तन गायन की परम्परा में किया गया है। सूरदास के यहाँ भाव के अनुसार संगीत का तान और राग बदलते रहता है।

श्री रामचरितमानस का पाठ महुआ चैनल पर हुआ करता था बाल्यकाल से लौ-कुश काल तक के बाल गायन का मौका मुझे उस चैनल पर मिला था। 

ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनियाँ…


जब सीता जी की माँग भराई होती है, ईश्वर बरसात करने लगते हैं, वहाँ की महिलाएँ गाती हैं,

बरसा-बरसा हे बदरवा, सुहाग बरसा

हमरे सिया जी के माँग बरसा

मथवा पे बरसा

मांगटिकवा पे बरसा

बरसा - बरसा हे बदरवा, सुहाग बरसा


मंथरा कैकेयी को डांटती है

तोहरो तो कइसन विचार बाटें हो 

रानी खार लागे बतिया, मंथरा कैकेयी का दिया खाती है, पहनती है लेकिन वह कैकेयी के द्वारा राम के लिए चौदह वर्ष के वनवास पर फटकार लगाती है।

किन बन गवना राम रघुराई!

उन्होंने सूफ़ी काव्य में संगीत पक्ष पर भी प्रकाश डाला। सूफी काव्य के कविता, संगीत और आध्यात्मिक भाव का अद्भुत समन्वय रहा है।


देखिन है नज़र जब से

का रूप सवरिया

हम रोग लगा बैठे हैं, इस बाली उमरिया मा

हम नीचे नज़र करके, ढूंढत है चरन तुम्हरी 

तुम जाइके बइठे हो का ऊँची अटरियां मा…ऊँची अटरियां मा…


हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. सुजीत कुमार सिंह ने बताया कि पश्चिम के मेरे प्रिय लेखक हैं टी. एस. इलियट जिनका निबंध है ‘परम्परा और वैयक्तिक प्रज्ञा’ जिसमें उन्होंने इतिहास बोध पर बात की है। परम्परा हमें अर्जित करनी पड़ती है यह केवल विरासत में नहीं मिलती है। यह इतिहास बोध मध्यकालीन हिंदी साहित्य के साहित्यकारों में था। इस परम्परा को हम भरत के नाट्यशास्त्र और वात्स्यायन के कामसूत्र के जरिए विभिन्न कलाओं से परिचित हो सकते हैं। डॉ. नगेन्द्र जब रस सिद्धांत लिखते हैं तब भाव पक्ष पर जो देते हैं। कलाएँ हमारे इफेक्टिव डोमेन को प्रभावित करता है। कलाकार आत्मा के सौंदर्य को प्रकाशित करता है, उद्घाटित करता है। कवि भाषा के माध्यम से भावों को व्यक्त करता है, उसके शब्द चेतना को उद्बुद्ध करते हैं। आत्मा का सौंदर्य प्रतिमान अर्थ है। आत्मा के सौंदर्य में मन की भूमिका होती है, बुद्धि की भूमिका होती है और प्रेम की भी भूमिका होती है। हमारा मन आवेगों का एक तंत्र होता है, इसकी शुरुवात उद्दीपन में होता है और अवसान उद्वेग में। कबीर भी कहते हैं कि माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर, मनका मनका डारि दे.. मनका मनका फेर। कवि या कलाकार को दूसरा प्रजापति कहा गया है। अपनी कल्पना के द्वारा कवि या कलाकार एक नया संसार रचता है। तुलसी का ‘रामराज्य’  रैदास का ‘बेगमपुरा’ और जायसी का ‘बैकुंठ’ जहाँ कोई कुंठा न हो। प्रेम के बदौलत यह सब संभव है। कबीर, रैदास, जायसी और तुलसी के पास भोगा हुआ यथार्थ था। कवि बनाया नहीं जाता है, पैदा होता है। उन्होंने कबीर का एक भजन सुनाया, कोरोना का एक दौर था, कोरोना ने कौन राजा, कौन रंक सबको एक लपेटे में लिया, कबीर पहले की लिख चुके थे।

‘साधो..साधो..साधो..ये मुर्दों का गाँव 

पीर मरे.. पैगम्बर मरिहै…तान

राजा मरीहै, परजा मरिहै…तान

मरिए वैद और रोगी मरीहै….तान

राम नाम तत्त्व रहिहै,दूजा और न कोई 

साधो ये…. मुरदो का गाँव ..

प्रदर्शन में भी एक दर्शन है। कला की आंतरिक प्रक्रिया बहुत महत्त्वपूर्ण है। कबीर जितने क्रांतिकारी हैं उतने ही संवेदनशील है। कबीर इसीलिए रात में रोते हैं जैसे बच्चे को डांटने के बाद सोते हुए माँ देखकर पश्चाताप करती है। बिना परंपरा को आत्मसात किए हमारा मानस प्रौढ़ नहीं हो सकता, हमारी निरंतरता बाधित हो जाती है।


प्रथम अकादमिक सत्र का संयोजन हिंदी विभाग,बीएचयू के आचार्य डॉ. अशोक कुमार ज्योति कर रहे थे। उन्होंने इस संगोष्ठी के संयोजक डॉ. हरीश कुमार को संस्कृत शब्द ‘वितताध्वर:’ से नवाजा। यह शब्द उनके लिए हैं जिसने बड़े - बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया हो। यह संगोष्ठी भी इसी तरह का अनुष्ठान है। सभागार में बैठे व्यक्ति को सभ्य कहा गया, आप सज्जन के पर्याय हैं।

आचार्य ने कवि रैदास के पद

जिह्वा सों ओंकार जप, हत्थन सों कर कार।

राम मिलिहि घर आइ कर, कहि रैदास विचार॥ तथा कबीर के पद 

"शून्य मरै अजपा मरै, अनहद हू मरि जाय।

राम सनेही ना मरै, कहै कबीर समुझाय।।" का भी ज़िक्र किया।

मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित 'पद्मावत' महाकाव्य के 'मंडपगमन-खंड' (मंडप खंड) का वह कड़वक (छंद) जिसमें राजा रत्नसेन योगी भेष में पद्मावती के विरह में 'सिंगी' बजाते हुए तप करते हैं, इस प्रकार है, 

किंगरी गहे बजावै झूरै । भोर साँझ सिंगी निति पूरै ॥ सूफ़ी कवियों में जायसी के यहाँ इस तरह के कई वाद्ययंत्र देखने को मिलते हैं। 


धन्यवाद ज्ञापन डॉ. पीयूष कुमार द्विवेदी ने किया। 


द्वितीय अकादमिक सत्र के तहत ‘मध्यकालीन साहित्य : सांगीतिक प्रस्तुति’ में संगीत विभाग, बीएचयू की आचार्य प्रो. ऋचा कुमार ने पद गायन किया। तबले पर प्रसिद्ध तबला वादक डॉ. ललित कुमार थे और हारमोनियम पर डॉ. इंद्रदेव चौधरी थे। नाद ध्वनि से सांगीतिक संध्या का समापन हुआ। 

सत्र संयोजन डॉ. शुभांगी श्रीवास्तव ने किया। शुभांगी जी ने बताया कि प्रो. ऋचा कुमार मैम के स्वर में संवेदना और भाव का समन्वय था।

कार्यक्रम में प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, डॉ. अशोक कुमार ज्योति, डॉ. धीरेंद्र चौबे, डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. लक्ष्मण यादव, प्रो. उर्वशी गहलौत, डॉ. शैलेंद्र कुमार सिंह, डॉ. विभु कुमार, डॉ. आर्यपुत्र दीपक, डॉ. दीपेश कुमार मिश्र,अभिषेक उपाध्याय, सहित विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों की उपस्थिति रही।

प्रतिवेदन : कु. रोशनी, सहायक आचार्य, राजकीय डिग्री महाविद्यालय, मेहसी, पूर्वी चंपारण,बिहार।

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