*संशय आशीर्वाद भी देता है....!*
*संशय आशीर्वाद भी देता है....!*
बचपन मे.....!
जब भी मैं....सफर पर जाता...
माँ-बापू को लगता....
मैं रास्ता भूल जाऊँगा....
बस में खिड़की के सहारे,
लापरवाही से सर निकालकर
नज़ारे देखूँगा... लुत्फ उठाऊँगा....
राह चलते लोगों को....!
अपना मित्र बना लूँगा..
भूख लगने पर.....!
किसी का भी दिया हुआ,
कुछ भी खा लूँगा....
बिन जाने पहचाने लोगों के
हाथों परोसा हुआ.....!
चना चबैना चबा लूँगा....
मित्रों...उनका सशंकित होना...
शायद....लाजमी था उस समय...
यह सच जान पाया मैं....!
कई-कई सालों बाद....
वह भी तब.....जब कि मैं.....
खुद ही सशंकित होने लगा....
अपनी संतति के प्रति.....!
इन्हीं बातों पर....
इतना ही नहीं....आज तो....
यह भी महसूस करता हूँ....
कि कितना महफूज था मैं....!
उन दिनों की....
उनकी शंकाओं के बीच.....
और यह अच्छी तरह से,
समझ में भी आता है कि....
संशय परेशान ही नहीं करता
आशीर्वाद भी देता है....
आशीर्वाद भी देता है....
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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