भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई पटेललौहपुरुष की 151वीं जयंती पर लेख
भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई पटेल
लौहपुरुष की 151वीं जयंती पर लेख
रियासतों को जोड़कर जो देश बना गए,
अखंड भारत की नींव वो रख गए,
लौह सी थी छाती और फौलादी इरादे,
सदा याद रहेंगे हमें उनके वो वादे।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके इस योगदान के कारण भारतीय इतिहास में उन्हें एक विशेष स्थान प्राप्त है। देश की अनेक रियासतों का भारत में विलय कर एक अखंड राष्ट्र के निर्माण में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इस महान कार्य के सम्मान में गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के निकट, विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित साधुबेट द्वीप पर उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। इस प्रतिमा को ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ नाम दिया गया है। 182 मीटर ऊंची यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में जानी जाती है। यह प्रतिमा भारतीयों के मन में सरदार पटेल के प्रति सम्मान और देश की एकता का प्रतीक है।
इस परिसर में एक भव्य संग्रहालय भी बनाया गया है। इस संग्रहालय में सरदार पटेल के जन्म से लेकर देश के महान नेता और ‘लौह पुरुष’ के रूप में पहचान प्राप्त करने तक की उनकी जीवन यात्रा को दर्शाया गया है। ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ अमेरिका की ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ से लगभग दोगुनी ऊंची तथा ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में स्थित ‘क्राइस्ट द रिडीमर’ की प्रतिमा से लगभग चार गुना ऊंची है। इस प्रतिमा के निर्माण में विभिन्न धातुओं का उपयोग किया गया है, जिससे इसे लंबे समय तक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सके। यह प्रतिमा प्रत्येक भारतीय को देश की एकता और अखंडता बनाए रखने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि जब कभी देश की एकता को खतरा उत्पन्न हो, तब प्रत्येक नागरिक को उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सरदार पटेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सरदार वल्लभभाई पटेल केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे एक महान राष्ट्रनिर्माता भी थे। स्वतंत्रता के बाद भारत की अनेक रियासतों का विलय कर एक अखंड राष्ट्र के निर्माण में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनमें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसी दूरदृष्टि, चाणक्य जैसी राजनीतिक समझ और एक कुशल प्रशासक की क्षमता थी। देश के सामने उपस्थित कठिन समस्याओं का समाधान करते समय उन्होंने व्यावहारिक सोच, साहस और निर्णय लेने की क्षमता का उचित उपयोग किया।सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भी सरदार पटेल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मंदिर पूर्व में हुए आक्रमणों के कारण क्षतिग्रस्त हो गया था। सरदार पटेल की इच्छा थी कि इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाए। उनके प्रयासों से इस कार्य को गति मिली। मंदिर का उद्घाटन वर्ष 1951 में हुआ, जिसमें भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। सरदार पटेल की विशेषता यह थी कि उन्होंने अपनी प्रसिद्धि से अधिक देश के हित को महत्व दिया। व्यक्तिगत सफलता, प्रसिद्धि और अपनी प्रशंसा करवाने की अपेक्षा राष्ट्रसेवा ही उनका मुख्य उद्देश्य था।
हैदराबाद रियासत का भारत में विलय स्वतंत्रता के बाद देश के सामने उपस्थित एक महत्वपूर्ण प्रश्न था। उस समय हैदराबाद में तनावपूर्ण वातावरण था और आम नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न गंभीर हो गया था। सरदार पटेल ने इस समस्या को गंभीरता से लिया। हैदराबाद का भारत में विलय शांतिपूर्ण ढंग से हो और देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले, इसके लिए उन्होंने प्रयास किए। उनकी दृढ़ भूमिका के कारण हैदराबाद रियासत भारत में शामिल हो गई।हैदराबाद के विलय के बाद भी भारत सरकार और निजाम के बीच संबंधों में कुछ समस्याएं बनी हुई थीं। ऐसे अवसरों पर सरदार पटेल ने देश के सर्वोच्च पदों की गरिमा बनाए रखने पर जोर दिया। उनका मानना था कि भारत के प्रधानमंत्री का सम्मान बनाए रखना देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। उनके स्वभाव में दृढ़ता, स्पष्टवादिता और परिस्थितियों के अनुसार उचित निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता थी।सरदार पटेल में राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की विशेष क्षमता थी। किसी भी निर्णय के भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं, इसका वे पहले ही आकलन कर लेते थे। भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भी उनकी राजनीतिक कुशलता को स्वीकार किया था। उनकी कूटनीति और निर्णय लेने की क्षमता ने उन्हें भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट स्थान दिलाया।
स्वतंत्रता से पहले सरदार पटेल अहमदाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष थे। उस समय उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रतिमा स्थापित करने के लिए पहल की थी। ब्रिटिश शासन के दौरान इस प्रकार का निर्णय लेना साहस का कार्य था। तिलक के योगदान का सम्मान करना और भारतीय नेताओं को उचित प्रतिष्ठा दिलाना उनकी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा था। महात्मा गांधी ने भी पटेल के नेतृत्व गुणों और कार्यक्षमता की सराहना की थी।कांग्रेस में सरदार पटेल को व्यापक समर्थन प्राप्त था। वर्ष 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के समय अनेक प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने उनके नाम का समर्थन किया था। लेकिन महात्मा गांधी की इच्छा के अनुसार उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू को आगे बढ़ने का अवसर मिला। आगे चलकर नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने, जबकि सरदार पटेल ने उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। इस घटना से कांग्रेस की निर्णय प्रक्रिया, गांधीजी के प्रभाव और पटेल की संगठनात्मक भूमिका स्पष्ट होती है।कश्मीर का प्रश्न भारत के इतिहास का एक जटिल विषय रहा है। स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में विलय का प्रश्न सामने आया। महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू की। इसके बाद कश्मीर के भविष्य को लेकर विभिन्न राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम सामने आए। इस मुद्दे पर सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू के विचारों में कुछ मामलों में मतभेद थे। कुछ लोगों का मानना है कि यदि कश्मीर का प्रश्न सरदार पटेल के हाथों में होता, तो परिस्थितियां अलग होतीं। हालांकि, यह इतिहास का एक जटिल विषय है, इसलिए इस पर निष्कर्ष निकालते समय उस समय की सभी परिस्थितियों और उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों को ध्यान में रखना आवश्यक है।सरदार पटेल के कार्यों को उनके समकालीन अनेक राजनीतिक नेताओं ने स्वीकार किया और सराहा। यहां तक कि उनसे मतभेद रखने वाले कुछ नेताओं ने भी बाद में उनके योगदान के महत्व को माना। उनके नेतृत्व, निर्णय क्षमता और देश की एकता के लिए किए गए प्रयासों का भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा।सरदार पटेल केवल नारे लगाने के बजाय वास्तविक कार्यों में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि देश के विकास के लिए ठोस कदम, उचित योजना और अनुशासन आवश्यक हैं।शायद इसीलिए दिल कहता "वे हैं जबकि हमें पता है वे तो नहीं हैं " !
समाज में विभिन्न विचारधाराओं पर विचार करते समय वे व्यावहारिक अनुभव को महत्व देते थे। किसी भी विचारधारा को अपनाने से पहले उसके परिणामों का आकलन करना आवश्यक है, यही उनके दृष्टिकोण का सार था।स्वतंत्रता के बाद भारत को औद्योगिक विकास और आर्थिक प्रगति की अत्यंत आवश्यकता थी। देश में उद्योग-धंधों का विस्तार हो, उत्पादन बढ़े और संपत्ति का निर्माण हो, तभी श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार किया जा सकता है। उस समय अनेक नेताओं ने इस विचार को सामने रखा था। सरदार पटेल के आर्थिक विचारों में भी व्यावहारिक दृष्टिकोण को विशेष महत्व प्राप्त था। उनके विचारों से स्पष्ट होता है कि देश के विकास के लिए केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उत्पादन, रोजगार और आर्थिक स्थिरता भी आवश्यक हैं।
आज चीन विश्व की प्रमुख आर्थिक और औद्योगिक शक्तियों में से एक है। उसके विकास के पीछे औद्योगीकरण, बुनियादी सुविधाओं का निर्माण, उत्पादन क्षमता और दीर्घकालीन योजनाओं जैसे अनेक कारक हैं। भारत को भी आर्थिक विकास के लिए नियोजन, उद्योग-धंधों, शिक्षा और तकनीक को महत्व देना आवश्यक है। देश के विकास के संबंध में सरदार पटेल के व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी प्रेरणा ली जा सकती है।सरदार पटेल का व्यक्तिगत जीवन सादगीपूर्ण था। उनका आचरण यह संदेश देता है कि सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले व्यक्ति को अपने स्वार्थ से अधिक समाज और देश के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में देशसेवा को सर्वोच्च महत्व दिया। उनका जीवन हमें ईमानदारी, जिम्मेदारी और त्याग का महत्व सिखाता है।स्वतंत्रता के बाद देश के सामने अनेक चुनौतियां थीं। विभाजन के कारण उत्पन्न परिस्थितियां, शरणार्थियों का पुनर्वास, रियासतों का विलय, प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण और देश में स्थिरता स्थापित करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य सामने थे। इन परिस्थितियों में सरदार पटेल ने अथक परिश्रम किया। सार्वजनिक जीवन की कुछ प्रवृत्तियों को लेकर उन्होंने चिंता भी व्यक्त की थी। सत्ता प्राप्त करने की होड़, राजनीतिक स्वार्थ और ईमानदारी की कमी देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न करती है, यह उनके विचारों से स्पष्ट होता है।
भारत की सुरक्षा को लेकर भी सरदार पटेल अत्यंत सतर्क थे। नवंबर 1950 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने पत्र में तिब्बत में चीन की गतिविधियों को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने भारत की सीमाओं की सुरक्षा मजबूत करने, खुफिया तंत्र को सक्षम बनाने, सेना का आधुनिकीकरण करने तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में परिवहन और संचार सुविधाओं का विस्तार करने की आवश्यकता बताई थी। विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों पर ध्यान देने की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया था।आगे चलकर भारत-चीन संबंधों और वर्ष 1962 के युद्ध की परिस्थितियों को देखते हुए सीमा सुरक्षा और रक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने का महत्व स्पष्ट होता है। सरदार पटेल द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं से उनकी दूरदृष्टि का परिचय मिलता है। देश की सुरक्षा के लिए समय रहते योजना बनाना और संभावित खतरों का अनुमान लगाना कितना आवश्यक है, यह उनके विचारों से सीखा जा सकता है ।जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के विचारों में कुछ मुद्दों पर मतभेद थे। इसके बावजूद दोनों ने स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पटेल ने सरकार में कार्य करते समय जिम्मेदारी, अनुशासन और नेतृत्व के प्रति अपनी भूमिका स्पष्ट रखी। व्यक्तिगत मतभेद होने के बावजूद देशहित और सरकार की जिम्मेदारियों को महत्व देना आवश्यक है, यही उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश था।
सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन हमें देशप्रेम, एकता, अनुशासन, साहस, ईमानदारी और दूरदृष्टि का महत्व सिखाता है। उन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भारत के एकीकरण में महान योगदान दिया।इसीलिए उन्हें ‘लौह पुरुष’ के नाम से जाना जाता है। इसीलिए हरिवंशराय बच्चन ने कहा था-"यही प्रसिद्ध लौह का पुरूष प्रबल,
यही प्रसिद्ध शक्ति की शिला अटल,
हिला इसे सका कभी न शत्रु दल,
पटेल पर स्वदेश को गुमान है।
सदा कठोर नग्न सत्य बोलता,
पटेल हिंद की निडर जबान है। "
उनके द्वारा निर्मित अखंड भारत की विरासत को सुरक्षित रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। भाषा, धर्म, प्रांत और संस्कृति की विविधताओं को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय एकता बनाए रखना ही सरदार पटेल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
चंद्रवीर बंशीधर यादव
(लेखक महाराष्ट्र के सामाजिक चिंतक एवं शिक्षाविद् हैं।)
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