*नहीं समझा कभी तुमनें हमारी भावना क्या है**-------कवि मुक्तक कार एडवोकेट गिरीश श्रीवास्तव*
*नहीं समझा कभी तुमनें हमारी भावना क्या है*
*-------कवि मुक्तक कार एडवोकेट गिरीश श्रीवास्तव*
लरज़ कर कच्चे धागे नेह के सब टूट जायेंगे।।
जिन्हें अपना समझते हो वही दिल लूट जायेंगे।।
धरा का आधुनिक हूँ नीलकंठी कहती है दुनिया-
मुझे हंस कर के विष दो प्रेम से हम घूट जायेंगे।।
पढ़ो तो पहले फिर कहना लिखा प्रस्तावना क्या है।।
मेरा अनुभव मेरी अनुभूति मेरी कल्पना क्या है।।
बहुत तकलीफ होती है स्वयं से रूठ जाता हूँ-
नहीं समझा कभी तुमनें हमारी भावना क्या है।।
कभी प्रतिकूल जाते हैं कभी अनुकूल जाते हैं।।
समय की मेहरबानी गर्व से हम फूल जाते हैं।।
ये दुनियाँ खूब सूरत लगने लगती है मेरे हमदम-
तुम्हें हम देख करके दर्द ग़म सब भूल जाते हैं
बदलते वक्त को पल पल निरखने की जरूरत है।।
स्वयं के आचरण को भी परखने की जरूरत है।।
नयन में नीर उर में नेह हो मुस्कान अधरों पर-
हमेशा शील संयम धैर्य रखने की जरूरत है।।
टूटने से दर्द होगा दिल से दिल को जोड़ दो।।
बोझ बन जाये अगर सम्बन्ध तो फिर तोड़ दो।।
बस में अपने कुछ नहीं है समय का सब खेल है-
ज़िन्दगी को खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ दो।।
भावना कलुषित नहीं सुपवित्र होना चाहिए।।
पारदर्शी आचरण सचरित्र होना चाहिए।।
व्यर्थ है जीवन सुखद अनुभूति हो सकती नहीं-
ज़िन्दगी में हर किसी के मित्र होना चाहिए।।
ग़ज़ल होनी चाहिए और गीत होना चाहिए।।
छू ले जो दिल को मधुर संगीत होना चाहिए।।
गर नहीं सुग्रीव मिलता राम भी रहते अधूरे-
हर किसी की ज़िन्दगी में मीत होना चाहिए।।
-----------9919667469
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