*काक्रोच से हार गये नाहर*

*काक्रोच से हार गये नाहर*
        सन दो हजार चौदह में भारत एक ऐसे शासक के हाॅंथ में गया जो दृढ़ निश्चयी, कठोर निर्णय लेने वाला,५६ इंची सीना ठोककर कहता था कि मैं सियार नहीं शेर हूॅं।मेरी डिक्शनरी में पीछे हटना नहीं लिखा है।और कहा ही नहीं विगत दस वर्ष तक करके भी दिखाया।कई ऐसे मौके आये जहाॅं इस सरकार ने वही किया जो देश हित में जरूरी था।विपक्ष बहुत दबाव बनाया,मगर परिणाम वही आया जो सरकार ने चाहा।मगर इस बार हार गई,एक कल के छोकरे के आगे घुटने टेक दी।
        सन दो हजार चौदह के बाद कई आंदोलन हुए।छ: छ: महीने चले।मगर सरकार कभी पीछे नहीं हटी।छात्र आंदोलन भी हुए,तब भी सरकार पीछे नहीं हटी।मजबूती के साथ सभी आंदोलनों की हवा निकाल दी। चाहे शाहीन बाग में चला सीएए हो,चाहे किसान आंदोलन हो। किसान आंदोलन तो वर्षों चला। जेएनयू में छात्र आंदोलन हुआ।मगर सरकार सबकी हवा निकाल कर घर जाने को मजबूर कर दिया। लेकिन इस बार आखिर ऐसा क्या हुआ।कि वही मजबूत सरकार आज हताश है।यही सोनम बांगचुंग पिछले अर्से लद्दाख में आंदोलन किया था तो यही सरकार देशद्रोही बताकर गिरफ्तार करके जेल में बंद करवा दिया था।आज यही सरकार उसी बांगचुंग के आगे घुटने पर बैठ गई,क्यों? जिस आंदोलन में देश विरोधी सनातन विरोधी जाति विरोधी नारे लग रहे थे।उसके उत्पातियों की रिहाई,उन उत्पातियों की पिटाई के बदले उनसे बात। आखिर क्यों।सरकार की ऐसी क्या मजबूरी थी जो काक्रोच के आगे ढेर हो गई।कहीं यह आंदोलन सरकार द्वारा ही तो नहीं प्रायोजित था।ऐसा मुझे इसलिए कहना पड़ रहा है कि एक बंदा अमेरिका से आता है।वह भारत पहुॅंचता नहीं है।उसको दिल्ली के जंतर मंतर पर उस विषय के लिए धरना करने की अनुमति मिल गई जो विषय ही समाप्त हो गया था।वहीं सवर्ण समाज आज महीनों से अनुरोध कर रहा है कि मुझे भी युजीसी के विरोध में धरना करने के लिए जंतर-मंतर प्रदान किया जाय।मगर यह सरकार नहीं दे रही है।इसलिए मुझे कहना पड़ रहा है कि कहीं यह आंदोलन सरकार द्वारा ही तो नहीं प्रायोजित है।
       सवाल तो बनता है।जहाॅं इतने बड़े बड़े आंदोलनों को सरकार ने बड़ी सफाई से कुचल दिया।तो यहाॅं क्यों झुक गई।यही बात सरकार की मंशा पर संदेह पैदा करती है और सवाल भी। क्योंकि इस बार का आंदोलन बिल्कुल बेपटरी था। क्योंकि जिस नीट परीक्षा को लेकर ए आंदोलन था।वो तो कब का बीत चुका था।तो उस विषय पर सरकार ने धरना प्रदर्शन करने की अनुमति कैसे दी और क्यों दी।यही क्यों हर सच्चे हिंदुस्थानी को परेशान कर रहा है।जब इसी सरकार ने वर्षों चले किसान आंदोलन के सामने घुटने नहीं टेकी।तो ऐसी क्या मजबूरी थी जो चंद दिनों में ही उन्हीं आंदोलन जीवियों के आगे घुटने कैसे टेक दी। कहीं सरकार को अपना बेस खिसकने का भय तो नहीं।क्योंकि जिसके लिए ए सब कुछ कर रहे हैं।वही इनका विरोध भी जमके कर रहा है। कहीं सवर्ण समाज के आंदोलन से सरकार डर तो नहीं गई।जो काक्रोच के आगे नतमस्तक हो गई।जिस तरह से सरकार इन काक्रोचों के आगे झुकी है,वो पुरानी याद ताजा कर दी है।
         बात तब की है जब कथित महात्मा गांधी १९१५ में भारत आये थे।तब न संचार की इतनी मजबूत व्यवस्था थी न सोशल मीडिया भी था।न लोग इतना अखबार ही पढ़ते थे।ट्रांजिस्टर तो दो चार कोस में एकाध होता था।फिर भी उनके स्वागत के लिए मुम्बई के बंदरगाह पर देश के तमाम लोग उपस्थित हो गये थे।जबकी गांधी जी तब तक भारत के लिए कुछ विशेष नहीं किए थे।अचानक वो भारत में आये और सबके नेता बन गये।लोग उनके पीछे हो लिए।जानते हैं क्यों। क्योंकि वो सरकार की रहमो-करम पर आये थे।तब भी सरकार का बेस खिसक रहा था।सरकार गांधी जी को उग्र होते आंदोलन को शांत कराने के लिए अहिंसा का पुजारी बनाकर भारत वालों के गले बाॅंध दिया। भारतवासी भी इन्हें अपना हीरो मान लिए।वैसे ही ए दिपके अमेरिका से चला। एयरपोर्ट पर उतरा नहीं कि इस सरकार ने उसे आंदोलन की परमीशन दे दी।मिडिया वाले प्रचारित कर दिए।और सरकार वैसे ही इसकी बात मान ली जैसे अंग्रेजी सरकार गांधी की बात मान लेती थी।इसीलिए कहना पड़ रहा है कि कहीं यह आंदोलन सरकार द्वारा रचित कुकर्म तो नहीं।
        इस आंदोलन में भी मुझे वही बू आ रही है।कहीं इतिहास की पुनरावृत्ति तो नहीं हुई है।जिस तरह से ये सरकार देशविरोधी नारा लगाने वालों के सामने झुकी है।वो उसी तरफ इशारा कर रही है।एक तरफ गजवा ए हिन्द का नारा लग रहा है।मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी इंशा अल्ला इंशा अल्ला का नारा लग रहा है, भारत की आत्मा भगवान श्रीराम और सीता माता को गाली दी जा रही है।उन्हीं गाली देने वालों से सरकार बात कर रही है।उन्हीं की बात मान रही है।दूसरी तरफ भारत माता की जय,जय श्रीराम,सनातन की जय के साथ देश की उन्नति के लिए बात हो रही है।उनसे न सरकार बात कर रही है न धरना देने के लिए अनुमति दे रही है।ए सब बातें उसी तरफ इशारा कर रही हैं।जिस तरह से ए सरकार काक्रोच से हारी है।उस पर मेरा बस इतना ही कहना कि जीवन में पहली बार देखा काक्रोच से नाहर को हारते हुए।
पं.जमदग्निपुरी

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