भगवान राम के जीवन से जुड़े आदर्शों को अपने जीवन में उतारें : शांतनु जी महाराज
भगवान राम के जीवन से जुड़े आदर्शों को अपने जीवन में उतारें : शांतनु जी महाराज
जौनपुर। धर्म और आस्था की पावन धरती जौनपुर में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान पूज्य शांतनु जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि श्रीराम कथा का श्रवण करना अपने आप में परम सौभाग्य की बात है, लेकिन इसकी वास्तविक सार्थकता तभी है, जब मनुष्य कथा में बताए गए प्रसंगों, उपदेशों और आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारे। भगवान श्रीराम के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल उनका नाम लेने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प भी होना चाहिए। शांतनु जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, सत्य, मर्यादा, करुणा और कर्तव्यनिष्ठा की अनुपम मिसाल है। उन्होंने विभीषण की शरणागति का बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रण किया। उन्होंने कहा कि जब विभीषण भगवान राम की शरण में आए तो भगवान राम ने कहा कि आप यहां क्यों आए हैं? उन्होंने कहा कि आपकी कथा सुनने के लिए। भगवान राम ने कहा कि कौन कथा सुनाया है आपको? बोले लंका में एक आपका सेवक गया था, वही सुनाया, तो मेरे मन में यह जिज्ञासा हुई कि जिसकी कथा इतनी सुंदर है तो वे कितना सुंदर होंगे। इसकी जिज्ञासा के चलते मैं आपकी शरण में आया हूं। तब भगवान राम ने कहा कि वही हनुमान ही आपको कथा सुनाए होंगे। शांतनु महाराज ने कथा के दौरान कहा कि मंदिर में और अपने बहन-बेटी के यहां भी कभी खाली नहीं जाना चाहिए। उन्होंने हनुमान जी के पराक्रम को भी बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसी दास ही शरणागति घाट को ही इसीलिए चुने क्योंकि इस कलयुग में योग, यज्ञ, व्रत, पूजा, जप, तप बड़ा ही मुश्किल है, इसमें केवल राम का ही सुमिरन सबसे आसान है। कहा कि जब मनुष्य का भगवान के प्रति समर्पित हो जाता है तो ठाकुर जी उसे गोद में बैठा लेते हैं, इसीलिए जो भी कार्य करें। मन लगाकर करें और समर्पित रहें। तभी लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। उन्होंने कहा कि नाम का भी असर होता है। ज्ञान भी है प्रकाश भी है और सिंह भी हैं। ज्ञान ही प्रकाश की ओर ले जाता है और अज्ञानता को दूर करता है। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि केवल भगवान राम की कथा सुनना ही नहीं चाहिए उसे गाना भी चाहिए। उन्होंने कहा कि मन का सभी इंद्रियों पर नियंत्रण होता है जब मन कहता है तभी आदमी आगे बढ़ता है। उदाहरण स्वरूप उन्होंने कहा कि जब मन रामकथा में आने का नहीं होगा तब आप नहीं आ सकते हैं, इसीलिए मन सर्वोपरि है। उन्होंने अपने आचरण से यह सिखाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। पारिवारिक संबंधों का सम्मान, माता-पिता के प्रति आज्ञाकारिता, समाज के प्रति जिम्मेदारी और अपने कर्तव्यों का निर्वहन भगवान श्रीराम के चरित्र के प्रमुख संदेश हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्श त्रेतायुग में जितने प्रासंगिक थे, आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान समय में जब समाज विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में श्रीराम के चरित्र से प्रेरणा लेकर नैतिक मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक सद्भाव को मजबूत किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने जीवन में सत्य, संयम और मर्यादा को स्थान दे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव की राह प्रशस्त हो सकती है।
महाराज जी ने रामकथा श्रवण की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रद्धालुओं का कथा स्थल पर एकत्रित होना अच्छी बात है, लेकिन कथा का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए एकाग्रता, श्रद्धा और भाव का होना भी आवश्यक है। जब भगवान की कथा चल रही हो, तब मन को इधर-उधर की बातों में लगाने के बजाय उनके जीवन प्रसंगों, लीलाओं और उपदेशों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि रामकथा केवल कानों से सुनने का विषय नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के विचारों को शुद्ध करने और उसके आचरण को बेहतर बनाने का माध्यम है। कथा के प्रत्येक प्रसंग में जीवन के लिए कोई न कोई सीख छिपी होती है। उन शिक्षाओं को समझकर व्यवहार में अपनाने वाला व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सार्थक बना सकता है।
शांतनु जी महाराज ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को रामकथा श्रवण का अवसर प्राप्त नहीं होता। जो श्रद्धालु अपने दैनिक कार्यों से समय निकालकर भगवान श्रीराम की कथा सुनने पहुंचते हैं, वे सौभाग्यशाली हैं। ऐसे अवसर का लाभ उठाते हुए लोगों को अपने भीतर सकारात्मक विचार, अच्छे संस्कार और धर्म के प्रति आस्था विकसित करनी चाहिए। प्रभु श्रीराम का स्मरण मन को शांति प्रदान करता है और उनके आदर्श जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे रामकथा को केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखें। कथा से मिलने वाली सीख को परिवार और समाज के जीवन में उतारें। सत्य का साथ देना, माता-पिता का सम्मान करना, अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करना और दूसरों के प्रति प्रेम एवं सद्भाव रखना प्रत्येक व्यक्ति का संकल्प होना चाहिए। श्रीराम कथा के आयोजन को लेकर शांतनु जी महाराज ने मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह के प्रति आभार व्यक्त किया और उनके प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजनों के माध्यम से समाज को अपनी संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ना सराहनीय कार्य है। ऐसे आयोजन लोगों में भक्ति की भावना जागृत करने के साथ नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और भगवान श्रीराम के आदर्शों से परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बीआरपी कॉलेज परिसर में आयोजित श्रीराम कथा श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक आनंद, भक्ति और आत्मचिंतन का अवसर बन रही है। कथा के माध्यम से लोगों को यह संदेश मिल रहा है कि भगवान श्रीराम का नाम लेने के साथ उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाना भी उतना ही आवश्यक है।
इस मौके पर नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद विद्यासागर सोनकर, रमेश जी (प्रान्त प्रचारक, काशी प्रान्त आरएसएस), करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीर प्रताप सिंह, वेद जी, रत्नाकर चौबे, अरविन्द सिंह(भाजपा नेता), रत्नसेन सिंह, माउंट लिट्रा जी स्कूल के निदेशक अरविंद सिंह, परविंदर सिंह, प्रधानाचार्य डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, डॉ. राकेश सिंह, शिक्षक नेता रमेश सिंह, डॉ. मनोज वत्स, पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. सुभाष सिंह, राजेश सिंह समेत कई लोग मौजूद रहे।
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