*सांसद विधायक और मंत्रियों की पगार से जब भविष्य निधि नहीं कटती तो इन्हें पेंशन क्यों?*
*सांसद विधायक और मंत्रियों की पगार से जब भविष्य निधि नहीं कटती तो इन्हें पेंशन क्यों?*
हमारे यहाॅं आजादी के बाद जनतंत्र स्थापित किया गया।बताया ये गया कि अब जनता राजा रहेगी।और शासन चलाने वाले सेवक होंगे।बड़े बड़े लालीपाप जनता को थम्हाए गये।अच्छे अच्छे सब्जबाग दिखाए गए।भारत देश का अपना संविधान बना।जनता बड़ी खुश हुई।कि अब हम सभी राजा हैं।मगर ए खुशी जनता की अधिक दिन टिक नहीं पाई।पता चला जनता तो अब भी गुलाम ही है।बस कुछ सहूलियत मिली है।जैसे सरकार को और सवर्ण समाज को,उसमें भी ब्राह्मण को मन माफिक जब चाहे गाली दे सकते हो।वो भी ए छूट कुछ खास वर्गों को ही है,सभी को नहीं है।इसके अलावा नौकरीपेशा लोगों को पेंशन की व्यवस्था दी गई। जिसमें सांसद विधायक आदि नहीं थे।पेंशन भी इसलिए दी जा रही थी कि सरकार या लिमिटेड कम्पनियां हर महीने आपकी पगार से पीएफ के रूप में कुछ रकम काट लेती थी।वहीं रिटायरमेंट के बाद या तो पूरा एक साथ या पेंशन के रूप में वापस करती थीं।एक पेंशन और चलती थी।जो स्वतंत्रता आंदोलन में बचे हुए क्रांतिकारी थे।उनको पेंशन देने का प्रावधान संविधान में किया गया। बहुत सारी बातें संविधान में लिखी गई। बहुत माथा पच्ची के बाद संविधान लागू हुआ।देश गतिमान हुआ।
कुछ अर्से बाद देश आपतकाल के दंश को भी झेला।उस दौरान जो जेल गये थे,उनको भी कुछ राज्य सरकारें पेंशन आदि की सुविधा उपलब्ध कराई हैं। आपातकाल हटा फिर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई जनता पार्टी की सरकार आई।जनता ने फिर सोंचा कि अब हमारे दिन बहुरेंगे।मगर कई किल्लतों से जूझते हुए आगे किसी तरह बढ़ ही रहे थे कि जनता पार्टी की सरकार गिर गई।और कुछ अर्से बाद कांग्रेस के राजकुमार अपनी माता के निधन के चलते सत्तासीन हुए।और सांसद विधायक और मंत्रियों की पेंशन लागू कर दिए।अब यहाॅं सोचने वाली बात यह है कि सांसद विधायक हर सुख भोगते हुए,पगार से एक रूपये भी पीएफ न देते हुए पेंशन के हकदार क्यों हुए।जबकी एक बार सांसद विधायक मंत्री बन जाते हैं तो ताउम्र सरकार की कई सुविधाओं का वो फ्री में लाभ लेते ही रहते हैं। उन्हें पेंशन की क्या जरूरत। लेकिन नहीं अपने लिए था तो सब एक मत होकर सहमत भी हो लिए।मजे की बात ए है कि ए पेंशन इनको एक स्लैब या एक कार्यकाल की नहीं हर बार अलग अलग कार्यकाल की भी मिलती है।जैसे ए दो या तीन बार सांसद विधायक या मंत्री बन गये तो तीनों बार की अलग अलग पेंशन बनती है। वहीं अटल बिहारी की सरकार बनी तो कर्मचारियों सैनिकों की पेंशन बंद कर दी।जो देश की प्रगति में अपना ३० से ३५ वर्ष दिये। सैनिकों की बंद कर दी जो देश सेवा के लिए अपनी अनमोल जवानी दे दिए।इसके लिए कोई विरोध ढंग से नहीं हुआ। क्योंकि यह जनता से सम्बंधित था। इसलिए किसी भी पार्टी ने चूं तक नहीं किया।
इससे ये लगता है कि आजादी केवल राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं को ही मिली। संविधान में जितने नियम बने सब नेताओं मंत्रियों को सुख भोगने के लिए बने।जनता तो केवल नारे लगाने के लिए,वोट डालने के लिए ही आजाद है।जनता को अगर कुछ मिल रहा है तो वह लालीपाप है।सी लाली पाप को चूसते हुए और अपना खून चुसाते हुए जनती हंसी खुशी रोती बिलखती चली आ रही है।
पेंशन कर्मचारी को और सैनिक को मिलनी चाहिए।यदि इन दोनों को नहीं मिल रही है तो सबकी पेंशन बंद होनी चाहिए।केवल बुजुर्गों को मिलनी चाहिए।वो भी उसे जो किसी भी तरह की नौकरी पेशा में न रहा हो।और असहाय हो।जो भूमिहीन हो। निराश्रित विधवा हो।तब सही मायने में आजादी का मतलब होगा।बाकी बेमानी है।जनता से हर वस्तु पर टैक्स और नेता हर जगह टैक्स फ्री।यात्रा फ्री,दवाई फ्री,होटल फ्री,जनता सांस लेने के टैक्स दे रही है।मतलब कोई ऐसी तरल ठोस वस्तु नहीं है जिस पर सरकार जनता से टैक्स न ले रही हो।और वहीं सांसद विधायक एक रूपये भी टैक्स न देकर सभी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं।ऊपर से पेंशन भी ले रहे हैं क्यों।और कर्मचारियों की पेंशन क्यों बंद किए।क्या यही आजादी है।क्या हमारा संविधान ऐसा ही बना है।कि नेतागण जब चाहें अपने हिसाब से इसे तोड़ मरोड़ सकते हैं।जो संविधान ने जनता को दिया था,उसे नेताओं ने बंद कर दिया।जो संविधान ने नहीं दिया था उसे नेताओं ने अपने लिए चालू कर लिया।यह संविधान की खूबसूरती है या बदसूरती समझ में आज तक नहीं आया।
पं.जमदग्निपुरी
धन्यवाद भाई
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