ख़िज़ाँ को क्यों बहारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
ख़िज़ाँ को क्यों बहारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
गुलों को चुभते खारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
दिलों में फूट डाले जो कभी अपना नहीं होता-
फ़ितरती हर विचारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
दिलासा दे के अक्सर तोड़ देते हैं जो दिल यारों-
मुझे झूठे सहारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
है ख़तरे में भरोसा लुट लेगें मिल के ये डोली-
मुझे अपने कहारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
बहुत खाये हैं धोखा धोखेबाज़ों से ज़रा बचना-
मतलबी दोस्त यारों से बड़ी तकलीफ़ होती है।।
----गिरीश कुमार श्रीवास्तव "गिरीश"
जौनपुर 9919667469
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