*------पपूआ बा छैइलान-----**--------वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश कुमार गिरीश*
*------पपूआ बा छैइलान-----* *--------वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश कुमार गिरीश* देखा तनी लड़िकई भइया, पपूआ बा छैइलान।। पंचइती में सरपंचैइ क, करैइ लाग अपमान।। छांही मारेबा बुद्धि के मानत नाहीं बात।। रत्ती भर पउरुख नाहीं बा, पटकत बाटैइ लात।। नशा चढ़ीबा पागल होइगा,फाने बाटैइ ड्रामा।। आखिर कब ले चले लड़िकई, चले न ई हंगामा।। केतनउ पटका गोड़ न पउबा बच्चू अब परधानी।। देश जागिगा कैइन पउबा पगलू अब मनमानी।। आंखी से गिरि गया देश के पउबा न सम्मान।। देखा तनी लड़कपन भैइया पपूआ बा छैइलान।। दीपक सूरज कबउ न हो ये खूब बजावा गाल।। गंगा के गड़ही कहना तू झिंगवा के घड़ियाल।। होश में आवा नाकी के उप्पर अब होत बा पानी।। देश सहेन छोड़िदा आपन अब बच्चू नादानी।। सपना देखब छोड़िदा मंशा कबउं न होये पूर।। जनता के आंखी में आखिर कबले झोकबा धूर।। मर्यादा के लांघत बाया हाथे कुछ न आये।। ओछी हरकत सहे न जनता अब गच्चा न खाये।। हमैंइ नाइं लागत बा अब तू बनि पउबा परधान।। देखा...