तने नहीं, ये समय के स्तंभ हैं,बीच में जो रिक्त है, वही तो जीवन है।

तने नहीं, ये समय के स्तंभ हैं,
बीच में जो रिक्त है, वही तो जीवन है।
हरा भरा जो दिख रहा आगे,
वो वर्तमान है, जो ठहरा-ठहरा है,
और जो नीला है, गहरा, अथाह,
वो भीतर का मन है, जो बहता है।

जड़ें उलझी हैं, जैसे स्मृतियाँ,
शाखें फैलीं, जैसे आकांक्षाएँ,
और इन सबके बीच जो खाली जगह बची,
वही तो है जहाँ हम जीते हैं।

नीला न तो जल है, न आकाश,
वो तो वह शून्य है,
जिसे भरने को हम
हरा-भरा अर्थ देते हैं।

आनंद पाण्डेय "केवल"

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