"एक घर, एक झील, और पूरा जीवन"
"एक घर, एक झील, और पूरा जीवन"
पहाड़ खड़े हैं, जैसे मौन प्रश्न,
झील पड़ी है, जैसे गहरा उत्तर,
और किनारे पर एक छोटा सा घर,
जैसे मन का एक छोटा सा घर।
हम भी तो ऐसे ही जीते हैं,
चारों ओर अचल पहाड़-से अहंकार,
बीच में एक मन की झील,
जो सब कुछ प्रतिबिंबित करती है,
पर खुद स्थिर रहती है।
वो घर छोटा है, पर पूरा है,
क्योंकि उसे पहाड़ों की विशालता चाहिए नहीं,
उसे बस झील का साथ चाहिए,
और थोड़ी सी धूप।
जीवन का सत्य भी यही है
बड़ा बनने में नहीं,
किनारे पर टिके रहने में है,
शांत जल के साथ।
आनंद पाण्डेय "केवल"
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