पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह को वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक बधाई
पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह को वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक बधाई
09 मई, वृहस्पतिवार, 1974 *** 09 मई, शनिवार, 2026
आज हमारी शादी की 52वीं सालगिरह है। सन् 1974 में आज की तारीख में बारात, मेरी होने वाली ससुराल ग्राम हिनौता थाना चंदला जिला छतरपुर, मध्य प्रदेश पहुंची थी।
शादी के समय मैंने इंटरमीडिएट की परीक्षा दी थी और मेरी उम्र 16 साल 8 महीने थी। मेरी होने वाली पत्नी की उम्र 14 साल 1 महीना थी। कानूनन यह एक बाल-विवाह था और इसलिए गैर-कानूनी था। कहते हैं कि, "मियां बीवी राजी, तो क्या करेगा काजी"। लेकिन यहां तो मियां बीवी भी राजी नहीं थे। होने वाले मियां बीवी से कोई पूछता भी नहीं था !
उस जमाने में बुंदेलखंड में सड़कों का नितांत अभाव था। हमारे गांव से नजदीकी सड़क 13 किलोमीटर दूर तिंदवारी से थी और ससुराल से नजदीकी सड़क करीब 11 किलोमीटर, करतल (जिला बांदा) तक थी। वैसे एक और सड़क चंदला तक थी जो सिर्फ 8 किलोमीटर था परंतु हमारे गांव से चंदला जाने का रास्ता बहुत लंबा घूम-फिरकर था। इसलिए आवागमन करतल होकर ही था।
हमारे गांव से ससुराल की दूरी बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन दोनों तरफ बैलगाड़ी की यात्रा और दो बार बस बदलने से समय बहुत लगता था। बारात, बैलगाड़ियों से 8 मई को सुबह चार बजे करीब निकलकर तिंदवारी लगभग 8 बजे पहुंची होगी। बसें बहुत कम थीं और शादियों के मौसम में तमाम बसें बुक हो जाती थीं सो और भी कम सवारी मिलती थी। इस प्रकार तिंदवारी से बांदा और फिर बांदा में बस बदलकर करतल पहुंचते पहुंचते करीब 7 बज गए होंगे।
करतल पहुंचकर, हमारी बारात गुप्ता जी के घर पर रात में रुकी। गुप्ता जी का मकान सड़क पर ही था। उन्हीं के यहां आने-जाने वाले रुकते थे। औरतें जब आती जाती थीं तो बक्सा गुप्ता जी के यहां रखकर पैदल गांव चली जाती थीं और बाद में कोई आकर बक्सा ले जाता था। बड़ी सहृदयता और परस्पर विश्वास था।
रात रुककर प्रातः बैलगाड़ियों से प्रस्थान हुआ और दोपहर में केन नदी पार करके मड़ैयन गांव में विश्राम हुआ। धूप ढलने पर चलकर 5-6 बजे के आस-पास हमलोग हिनौता पहुंचे। तदुपरांत सारे कार्यक्रम संपन्न हुए। दिनांक 10 मई को बारात रुकी और 11 मई, शनिवार को 3 बजे के आस-पास बैलगाड़ियों से चलकर लगभग 7 बजे गुप्ता जी के यहां करतल में विश्राम हुआ। फिर 12 मई को प्रातः बस से चलकर, बांदा में दूसरी बस पकड़कर तिंदवारी करीब 12-1 बजे पहुंचे। बस अड्डे पर ही दोपहर विश्राम करके धूप ढलने पर बैलगाड़ियों से प्रस्थान करके 7 बजे तक गांव पहुंचे।
12 मई को चूंकि रविवार था, इसलिए पत्नी का गृह-प्रवेश नहीं हुआ। घर के बाहर ही बरामदे में पर्दा करके रात में रहना पड़ा। फिर अगले दिन मुहूर्त के अनुसार निहारन करके गृह-प्रवेश हुआ!
कोई नई तस्वीर मोबाइल में नहीं मिली इसलिए यह पुरानी वर्ष 2017 एवं 1997 की तस्वीर लगा दी है। वर्ष 2017 की तस्वीर लखनऊ की और 1997 की तस्वीर, सेनानायक (Commandant) 15वीं वाहिनी पीएसी आगरा के आवास की है।
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