श्रद्धा-स्मरण / स्व. पूरन चंद्र जोशी जी राजनीतिक रुतबेबाजी से अलहदा एक सरल और संवेदनशील इंसान

श्रद्धा-स्मरण / स्व. पूरन चंद्र जोशी जी 
राजनीतिक रुतबेबाजी से अलहदा एक सरल और संवेदनशील इंसान 

-रतिभान त्रिपाठी 
 एक हैंडसम पर्सनालिटी, एक क्वालीफाइड इंजीनियर और फिर बिजनेसमैन, एक मुख्यमंत्री के दामाद, एक स्वतंत्रता सेनानी व सांसद सास के लाड़ले दामाद, एक मुख्यमंत्री व वरिष्ठ नेता के बहनोई और एक प्रोफेसर व मंत्री के पति, लेकिन न कोई घमंड,  न कोई हनक दिखाने की मंशा। जबरदस्त जलवे के बावजूद रुतबेबाजी से कोसों दूर थे पूरन चंद्र जोशी। घर राजनीतिक कार्यकर्ताओं से भरा रहता लेकिन जोशी जी सबसे बड़ी सरलता से मिलते। उनसे कोई राजनीतिक चर्चा कर दे तो भले ही कोई शालीन जवाब दे देते लेकिन वह कोई शेखी बघारें, यह उनके स्वभाव में नहीं था। 
   बात हो रही है प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी के पति पूरन चंद्र जोशी जी की जिन्हें पूरा प्रयागराज पीसी जोशी के नाम से जानता है। आज उनके महाप्रयाण की दुखदाई खबर आई तो मन बहुत व्यथित हो गया। चार पांच दिन पहले अस्वस्थ हुए तो उन्हें पीजीआई लखनऊ में भर्ती कराया गया लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उन्हें बचाया नहीं जा सका। सोमवार की सुबह वह इस दुनिया से विदा हो गए।
मुझे ठीक से याद है कि नब्बे के दशक में जब प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी ने राजनीति में कदम रखा तो पीसी जोशी जी राजनीतिक गतिविधियों से दूर अपने बिजनेस में ही लगे रहते थे। रीता जी को कभी कभार उनकी किसी मदद की जरूरत पड़ी तो वह चुपचाप सहयोग करते रहे लेकिन राजनीतिक रुतबे में शामिल होना उनके स्वभाव से नहीं था। रीता जी इलाहाबाद की मेयर चुनी गई थीं। उन दिनों मोतीलाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। मैंने एक पुस्तक लिखी थी। उसका आमुख वोरा जी से इसलिए लिखवाना चाहता था कि नेता  बनने से पहले वह पत्रकार हुआ करते थे।‌ वोरा जी रीता जी का बहुत सम्मान करते थे। मैं रीता जी के साथ इलाहाबाद से लखनऊ आया। पीसी जोशी जी भी साथ थे। रास्ते में जोशी जी से खूब संवाद हुआ। हम लोग रीता जी के लखनऊ स्थित आवास पर रुके और शाम को राजभवन गए। राज्यपाल वोरा जी के साथ भोजन करते समय पुस्तक को लेकर बात होने लगी तो जोशी जी ने उसका व्योरा दिया। वोरा जी ने आमुख लिखने के लिए सहर्ष हामी भरी। पाण्डुलिपि रखवा ली। दूसरे दिन सुबह सुबह देखा कि जोशी जी खुद चाय लेकर मेरे कमरे में आए। यह उनकी सरलता का उदाहरण है। मुझे संकोच भी हुआ लेकिन हम लोगों ने साथ बैठकर चाय पी और कई विषयों पर चर्चा की।
इसके बाद मैं जब कभी भी रीता जी के घर जाता और जोशी जी होते तो खूब बातें होतीं। उन्हें इस बात का कोई घमंड नहीं था कि वह देश के विख्यात नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा के दामाद हैं या इलाहाबाद की मेयर के पति हैं। 
 एक वाकया याद आता है। जब प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश सरकार में पर्यटन मंत्री थीं तो प्रयागराज में एक वैवाहिक समारोह में हम साथ साथ लखनऊ से गए। रास्ते में तय हुआ कि मेरी दोनों बेटियों स्मिता और अमृता को भी उस समारोह में जाना है। रीता जी चूंकि मेरे पूरे परिवार से बखूबी परिचित हैं। तो प्रयागराज पहुंच कर स्टैनली रोड स्थित मेरे घर से उन दोनों को साथ बैठाया गया। आगे चलकर मिंटो रोड पर रीता जी का घर है। जोशी जी को भी साथ जाना था, गाड़ी में वह भी आ गए। वैसे तो पीसी जोशी जी संकोची स्वभाव के थे लेकिन रास्ते में बेटियों से उनके खाने-पीने की आदतों, पसंद-नापसंद की बात करते रहे। यह बात उनके अपनेपन को दर्शाती है। 
जोशी जी आदर्श पति कहे जा सकते हैं कि वह अपनी नेता धर्मपत्नी के लिए हमेशा सकारात्मक अंदाज में रहे। कभी किसी बात पर अड़चन नहीं डाली। आजीवन उनके एक अच्छे दोस्त की तरह रहे। दोनों के बीच एक अद्भुत केमिस्ट्री पूरे जीवन बनी रही, जिसके गवाह वह सभी लोग हैं जो रीता जी और उनके परिवार को ठीक से जानते हैं। 
ऐसे सरलमना इंसान का जाना उन सबको दुखी कर गया जो उन्हें जीजा जी कहकर ही पुकारते थे। वह केवल विजय बहुगुणा और शेखर बहुगुणा के ही नहीं, रीता जी के समकक्षों और उनसे जुड़े लाखों लोगों के जीजा जी रहे हैं। उन्हें याद करते हुए मन भावुक हो रहा है। इन्हीं चंद शब्दों के साथ मैं पीसी जोशी जी की स्मृतियों को सादर नमन करता हूं। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह आदरणीया बहन रीता बहुगुणा जोशी जी और उनके परिवार को यह असीम दुख सहने की शक्ति प्रदान करे।

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