अंतिम बिस्तर...–डॉ रमाकांत क्षितिज, वरिष्ठ साहित्यकार

अंतिम बिस्तर...
–डॉ रमाकांत क्षितिज, वरिष्ठ साहित्यकार

जीवन भर अच्छे अच्छे फर्नीचर बनाते बनवाते रहे
जैसे जैसे जीवन में धन आया
वैसे वैसे फर्नीचर अपडेट कराते रहे
ब्रांडेड पर ब्रांडेड चढ़ते गए
शरीर इस बीच बुढ़ा होता गया
ईश्वर की बनाई ब्रांड को बिगाड़ते गए
वैसे संभाल भी लेते
तो क्या कर लेते
एक दिन तो ब्रांड बिगड़ना ही है
ब्रांड कोई भी हो
घर वापसी से बच नहीं सकते
जीवन भर रहा तामझाम
तामझाम के लिए संघर्ष करते रहे
अंत में सादगी ही साथ गई
दो बांस से अर्थी बन गई
बांस का बिस्तर साथ निभा पाया
बाकी घर के भीतर तक़ ही साथ निभाया
कुछ बांस के हिस्से
कुछ फूल अगरबत्ती
थोड़ी सी अबीर हल्दी 
कुछ मीटर कपड़ा
वह भी रंग हीन सफ़ेद
जीवन भर तरह तरह के रंग से रंगते रहे
जाति धर्म वेश भाषा  पर लड़ते रहे
अंत में न भाषा न जाति न धर्म
सिर्फ मुरदा कहलाये
एक छोटी हंडी एक बड़ी हंडी
कुछ रस्सी थोड़ी सी आग
थोड़ी सी उपली
ही काम आई
वाह रे इंसान तेरी कमाई
कुछ लोग साथ
अब कह रहे हैं
राम नाम सत्य है
कह तो रहे हैं मुरदे के लिए
पर सच उनके लिए जो साथ जा रहे हैं
जीवित लोग मुरदे को बता रहे हैं
राम नाम सत्य है
कहीं मुरदा तो नही ज़िंदो
को बता रहा की
राम नाम ही सत्य हैं
अब क्या एक मिट्टी अथवा
पीतल ताँबे के एक लोटे
में भरे जाओगे
तुम्हारा पूरा भौतिक जीवन
एक लोटे में समा जायेगा
एक लोटे में भरे जाने के लिए
इतना संघर्ष...

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