*भूखे पेट के कारण.....!*
*भूखे पेट के कारण.....!*
उतरन वाली कमीज में.....!
उधार की नील-टीनोपाल डालकर..
छोटुआ दो रोटी की तलाश में....
लम्बरदार के दरवाजे पर....
गीत मस्ती में गाता गया....
इधर हुक्का-चिलम का धुआँ....!
आसमान में छा गया....
छोटुआ मन ही मन सोच रहा...
गाना गाना तो उसकी मजबूरी है...
पर यह हुक्का-चिलम पीना...!
क्या लम्बरदार के लिए जरूरी है...
और तो और....लम्बरदार कौन....!
जो अखबार से भी बेखबर है....
जो अब तो बस मूँछों से ही जबर है,
ऐब अब भी पुराने पाल रखा है,
धीरे-धीरे....खुद ही....
खोद रहा अपनी कबर है....
गाली-गुप्ता का ही रहन-सहन
हम जैसे गरीबों की वह....!
अक्सर करता है माँ-बहन...
हम जैसों पर ही करता रौब-दाब,
हमसे ही रोज-रोज किस्से गढ़ता...
नए-नए और अजब-गजब....
बस अनायास की यह सनक लिए
कि....गाँव-देश-समाज में...
बनी रहे उसकी बड़ी धमक....
फिर सोचता है छोटुआ कि...!
कुएं की जगत के किनारे बने हुए
सिल-बट्टे पर....उसके पुरखों ने...
कभी भांग रगड़ी थी....पिसी थी...
शायद उन दिनों....मति में उनके....
भांग ही भरी पड़ी थी...और...
असर उसका आज भी....!
हमारे मन-मस्तिष्क पर.....
गहरे से भरी और गड़ी पड़ी है...
हर लिया गया था शायद....!
उन दिनों आत्म बल उनका....
गला आत्मविश्वास का भी....!
खूब दाब-दाब के गया घोंटा....
तब से ही हम सबको....
आभास होता है ऐसा कि....!
जैसे हरदम पीछे सटा है सोंटा....
इतना ही नहीं....छोटुआ....!
बयाँ करता है एक सच्चाई.....
कि घर में इन लम्बरदारन के....!
सरकारी कोटे की चीनी आती है...
रोज सवेरे अँगीठी पर...
इसी सरकारी चीनी की....!
चाय भी चढ़ जाती है.....
फिर कप-प्लेट में रखकर,
हम जैसों को चाय परस दी जाती है
इसको ही....बड़प्पन की निशानी...
लम्बरदार की फैमिली मानती...
और....इस पर ही.....
उसकी बहू भी इतराती है....
और....हाय रे किस्मत हमारी...!
यहाँ सारी कुछ मेहनत के बाद
भूखे पेट के कारण....!
हमारी छाती धधकती जाती है...
भूखे पेट के कारण....!
हमारी छाती धधकती जाती है...
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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