नदियों ने समुद्र से पूछा *----- मुरलीधर मिश्र*
नदियों ने समुद्र से पूछा
*----- मुरलीधर मिश्र*
मृदुल मृदुल जल लेकर आती
प्रियतम खारे क्यों रहते हो ।
इतना धैर्य कहां से पाये
गम का ज्वार उछल जाते हो ।
मैं तुम से प्रियतम मिलकर के
शिवा शक्ति बन जाती हूं ।
शिव बनकर तुम युग्म बनाते
मैं तुममय हो जाती हूं ।
नित कौतूहल मन में बसता
समाधान कुछ कर देना ।
मेरे अनुनय द्रवीभूत हो
जिज्ञासा हल कर देना।
प्रिया तिया तेरी जिज्ञासा
मन विचार मैं शांत करुंगा ।
सतत सत्य हूं सत्य तत्व से
सकल शोध कर ज्ञान धरूंगा ।
अति आचरण मनुज की मारी
धरा विकल जब रोती है ।
आंसू अपने गिरे लवणमय
तुम में सब वह धोती है ।
वही लवण ले तुम प्रवाह में
मुझ में आकुल आती हो ।
अपनामय मुझको कर जाती
मुझे लवणमय करती हो।
मुझमें नीर नहीं है देवी
जो कुछ है सब तेरा है ।
शक्ति पुंज आनंद लहर हो
तुम बिन धर्म न मेरा है।
पावन जल को मान के मेरा
मनुज मान कर जाते हैं ।
ऐसे अपर गुणों से पोषित
अन्य मान पा जाते हैं ।
मुरलीधर मिश्र
देवरिया/ वाराणसी
16-4-2026
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