*पूछता मन (कविता)**--------मुरलीधर मिश्र*

*पूछता मन (कविता)*
*--------मुरलीधर मिश्र*
कौन है जो मौन होकर  दृष्टि रखता 
प्रलय की इस वेदना सम भाव रहता 
नीमिलित  परमाणु में नित प्राण भरता 
उन्मिलित में लय दिखा नित प्राण हरता 
चक्र चलता  बदलता क्षण 
 टूटना सातत्य कण-कण
विकल चिंतित है पड़ा रण 
नहीं होता मन समर्पण 
 कांपती दोनों भुजा  में चाहकर  नहिं चांप चढ़ता 
द्रुपद  सिर कन्या पड़ी है नहीं कोई बांह गहता 
आवाप  उद्वाप  नित जीवन बिखरता 
इस अरण में सारथी बिन रथ भटकता
 अहर्निशि  मम नीर नीरद में छुपा है 
अर्क के परिताप में जीवन पका है 
सोम व्याकुल है  ग्रहों तारे खफा हैं 
रात की  नीहारिका में  गुफ्तगू  से 
विकल मन में नींद भी हमसे दफा है 
दूर बैठे अम्भ जल  से प्राण भरता 
कौन है जो मौन होकर दृष्टि रखता
 
          मुरलीधर मिश्र 
        वाराणसी/ देवरिया

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