*आदमी के विष से.....!**------ जितेन्द्र कुमार दुबे*
*आदमी के विष से.....!*
*------ जितेन्द्र कुमार दुबे*
समुद्र मंथन से निकला....
कालकूट भी....एक रतन था...
पर...कोई नहीं करना चाहता...
इसका जतन था.....
देव-दानव दोनों को ही....!
दूर से दे रहा यह जलन था....
जीव-जन्तु सोचने पर विवश थे..
समुद्र मंथन में सबसे पहले....!
विष ही आया क्यों बाहर....?
प्रश्न यह सबके समक्ष था....
सृष्टि के विनाश का ही....!
विचार कहीं उपजा तो नही था....
समंदर के मन के अन्दर...
विस्तार अपना ही धरती पर बढ़े...
चाहता रहा हो वह अन्दर ही अन्दर
संशय जग वालों का यह....!
था जायज़...और था प्यारा-प्यारा...
क्योंकि....जानता रहा है जग सारा..
समंदर हमेशा...रहा बुद्धि का मारा..
पर...सच यह भी रहा....
कि जब भी कोई...
चाल कुटिल चली उसने....
दिखा वह बना हुआ बेचारा....
कभी अकारण ही पंगा लिया था
उसने प्रभु राम से....फिर....
हाथ जोड़ माफ़ी माँगी थी राम से...
विश्वास कैसे कर लेता.....!
वह समंदर घमण्डी....आराम से....
कि धरा पर मिलेंगे.....!
भगवन कोई....बिना ताम-झाम से
जो पी लेंगें सारा हलाहल यहाँ....
जिसे लोग भूत-भावन शंकर कहेंगे
हारा था इस बार भी समंदर....
घमण्ड उसका हुआ था फिर छूमंतर
पीकर विष कालकूट सारा....!
नीलकंठ हो गए थे भोले शंकर.....
पर अचरज़ तो देखो प्यारे....!
मतलबी दुनिया वालों ने....
समझा नहीं कुछ खास इसको....
विषय हास का भी बनाया इसको
मित्रों...वह एक अलग दौर था....
पुण्य प्रताप था भोले शंकर का
विष कंठ के नीचे गया नहीं...और..
बुरा शंकर का कुछ हुआ भी नहीं....
पर...आज के दौर मे देखो तो प्यारे..
असर विष का नहीं हो रहा है....
जबकि आसानी से अब तो....!
यह गले से उतर भी रहा है
कालकूट बे-असर हो गया है
आदमी ही विषैला हो गया है
इलाज मिल जा रहा है....!
अस्पतालों में बिष का...मगर...
आदमी के विष से.....!
अब आदमी मर रहा है....
आदमी के विष से.....!
अब आदमी मर रहा है....
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ
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