*मध्यम वर्ग के दुख को कब समझेगी सरकार*,*------- जमदग्निपुरी*
*मध्यम वर्ग के दुख को कब समझेगी सरकार*
,*------- जमदग्निपुरी*
भारत वर्ष में यदि कोई सबसे अधिक दुखी हैं तो वो है मध्यम वर्ग।उसके ऊपर पूरे भारत का बोझ डाल दिया गया है।मान सम्मान का बोझ तो लेकर वह शिद्दत से ढो ही रहा है।उसे बचाने के लिए कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।देश को गति प्रदान करने के लिए उसे ही सब कुछ करना पड़ रहा है।दिन रात मेहनत करता है।खून पसीना एक करता है।उसकी कमाई से टैक्स सरकार बिना कहे ही काट लेती है। भिखारियों का भी भरण पोषण करने का भी बोझ मध्यम वर्ग के ऊपर ही है। पुजारियों को भी मध्यम वर्ग ही सम्हालता है।इसके बावजूद मध्यम वर्ग दुखी है।उसकी परेशानी से किसी को कुछ लेना देना नहीं है।उसे किसी भी प्रकार की सुविधा इस देश में उपलब्ध नहीं है। सरकारें सुविधा देने का ढिंढोरा तो खूब पीटती हैं।मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही है।वह अपने ही देश में परदेशी कहा जाता है।जलालत झेलता है। परेशानी में पैदा होता है और उसी में मर जाता है। मगर उसकी परेशानी को कोई न देखता है न सुनता है न समझता है।दूर करने की तो बात ही छोड़ दीजिए।वह पैसा देकर भी किसी सुविधा का भोग भोगने का अधिकारी नहीं है।न भरोसा हो तो भारतीय रेल की आरक्षित बोगी में यात्रा करके देख लीजिए।
मध्यम वर्ग बेचारा अपने प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाकर नौकरी करता है। तमाम तरह के टैक्स देता है।जैसे इनकमटैक्स, रोड टैक्स,सेल टैक्स,सेस टैक्स आदि।इसके बाद भी जीएसटी भी भरता है।उसे जब अपने गांव जाना होता है तो।दो महीने पहले ही टिकट आरक्षित करवाता है।सुखी पूर्वक व सुरक्षित यात्रा करने के लिए।मगर होता ये है कि उसकी यात्रा बहुत ही कष्टकर होती है।उसकी अगल बगल की खाली जगहों पर अन्य बगैर आरक्षित या बेटिकट यात्री कब्जा कर लेते हैं।सुलभ शौचालय तक सुलभता से जा नहीं सकता।यदि महिला है उसके लिए तो और भी कष्टकर है।उसी पर यदि कोई बीमार है तो और समस्या हो जा रही है। क्या मध्यम वर्ग दो महीने पहले से सीट आरक्षित कर गलती करता है।जनरल टिकट के दोगुना कीमत देकर सीट आरक्षित करवाता है सुगम व सुरक्षित यात्रा करने के लिए।मगर ट्रेन में हालत ये है कि वह असुविधाजनक और असुरक्षित यात्रा करने के लिए विवश है। सरकारी कर्मचारी केवल पैसा वसूली करने में मशगूल हैं।किसी भी समय जाओ यात्रा करने के लिए आरक्षित टिकट खिड़की पर टिकट ही नहीं मिलता। वहीं दलाल के पास जाओ ६ सौ का टिकट २६ सौ में मनमुताबिक टिकट मिल जाता है।टिकट मिलने पर असीम खुशी की अनुभूति होती है।जब ट्रेन में आता है तो उसकी सारी खुशी काफुर हो जाती है।पूरी रात न सो सके न संडास पेशाब ही सुगमता से कर सके।सामान को लेकर चिंतित अलग से रहता है कि पता नहीं कब क्या चोरी हो जाए। अवैध यात्री टोंकने पर मारा मारी भी करते हैं। मध्यम वर्ग भारत देश में लुटा पिटा सा है।रेलवे पुलिस बल पगार तो लेता है।मगर अवैध यात्रियों को रिजर्वेशन से निकालने की बजाय उनसे पैसे लेकर वहीं छोड़कर कहीं एक बोगी में उचित और व्यवस्थित जगह देखकर सुख पूर्वक सोता है। मध्यम वर्ग पैसा खर्च करके रोता है।उसकी पीड़ा उसके दुख को आज ८० साल लगभग आजादी मिले हो गई है।मगर दूर करने की अब तक सभी सरकारों ने ईमानदार कोशिश नहीं की।ऐसा लगता है कि मध्यम वर्ग दुख झेलने के लिए ही भारत में पैदा होता है।
ऐसी दुर्गम यात्रा से मध्यम वर्ग को कब निजात मिलेगी।कब उसके दुख को सरकारें समझेंगी।कब उसे उसके पैसे का सुख सरकारें देगी। आखिर आरक्षित का पैसा दोगुना से भी अधिक इसीलिए लेती हैं न की यात्रा सुगम और सुरक्षित सम्पन्न कराई जायेगी। फिर सुगम और सुरक्षित की जगह मध्यम वर्ग को दुर्गम व असुरक्षित यात्रा करने के लिए सरकारें क्यों मजबूर कर रही हैं।क्या मध्यम वर्ग किसी भी सुविधा का शुल्क देकर भी उसका लाभ लेने का अधिकारी नहीं है।उसे उसकी मेहनत का फल आखिर कब मिलेगा।
ए चित्र लोकमान्य तिलक टर्मिनस से गोड्डा की तरफ चलने वाली ट्रेन का है। जिसमें मैं भी यात्रा कर रहा हूॅं।जिस बोगी में मैं हूॅं उसी का यह दृश्य है।ए तब का है जब भीड़ कम थी।रात नौ बजे के बाद की हालत एकदम खराब है।सीट के नीचे पैर रखने की जगह नहीं है।जो अवैध यात्री हैं वे मजे से चद्दर बिछा कर सो रहे हैं।जो वैध हैं वो सामान न चोरी हो वे जागकर रखवाली कर रहे हैं।एक भी न टीसी दिख रहा है न सिपाही।यदि कोई घटना हो जाय तो उसकी जवाबदारी किसकी।किसी की नहीं।जिसका चोरी हुआ है।वही जवाबदार है। क्यों आरक्षित करवाये। क्यों कमाने के लिए बाहर जाते हैं। क्यों देश को गतिशील बनाए हुए हो।अब बनाये हुए हो तो भुगतो। सरकार केवल वसूली करने के लिए है। टैक्स लेती है तो अपनी सुविधा के लिए लेती है।मध्यम वर्ग केवल दे। इनकमटैक्स दे, रोड टैक्स दे,सेल टैक्स दे,जीएसटी भरे।मगर सुविधा हम सरकारी लोग भोगेंगे। मध्यम वर्ग को सुख सुविधा पैसा देकर भी लेने का अधिकार नहीं है। उपरोक्त चित्र किसी कबाड़ घर का दिख रहा है।मगर हकीकत यही है कि यह चित्र आरक्षित बोगी का ही है।और आज का ही है।
पं.जमदग्निपुरी
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