“कामायनी प्रसाद जी की मनीषा का महानतम प्रसाद है।”“प्रसाद अपने नाटकों के माध्यम से भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन करते हैं।”प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित
“कामायनी प्रसाद जी की मनीषा का महानतम प्रसाद है।”
“प्रसाद अपने नाटकों के माध्यम से भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन करते हैं।”
प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित
“प्रसाद का साहित्य इस सांस्कृतिक गुलामी से आज़ादी के लिए प्रयत्न करता है।” – प्रो. रामेश्वर राय
“प्रसाद राष्ट्र को प्रबुद्ध शुद्ध भारती के रूप में प्रस्तुत करते हैं।” – प्रो. कैलाश देवी सिंह
“प्रसाद आस्था के कवि हैं।” – प्रो. विद्योत्तमा मिश्र
“प्रसाद युग की नब्ज़ पकड़ने में सिद्धहस्त थे।” –प्रो. पवन अग्रवाल
“आनन्द का संधान ही प्रसाद के साहित्य का लक्ष्य है।” – प्रो. हेमांशु सेन
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लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित ‘महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव २०२६’ के तृतीय दिवस पर आज मालवीय सभागार में “स्रष्टा-द्रष्टा जयशंकर प्रसाद का साहित्य : राष्ट्र-समाज-संस्कृति” विषयक द्विदिवसीय संगोष्ठी आज आरम्भ हुई।
उद्घाटन सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित जी ने कहा कि प्रसाद प्रायः अनेक विचारधाराओं और विधाओं का अवगाहन करते हैं। प्रसाद के साहित्य में इतिहास भी बोल रहा है, पुराख्यान भी और दर्शन का दिग्दर्शन भी होता है। वे अभिव्यंजना की नई पद्धति खोजते हैं। अपनी रचना प्रेमपथिक में वे एक यूटोपिया रचते हैं आनंदनगर जो कि कामायनी में आनंदलोक हो जाता है। प्रो. दीक्षित ने कहा कि अतीत का इतिहास पढ़कर, वर्तमान को आँखों से देखकर और भविष्य को विजनरी दृष्टि से देखा जा सकता है। प्रसाद को वैसी दृष्टि मिली थी। उन्होंने कहा कि हिन्दी की डेढ़ हज़ार वर्षों की परंपरा में कवि बहुत हुए; कविर्मनीषी दो ही हुए गोस्वामी तुलसीदास और जयशंकर प्रसाद जी। प्रसाद जितने अच्छे कवि हैं उतने ही अच्छे नाटककार। उन्होंने बताया कि प्रसाद अपने नाटकों के माध्यम से भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन करते हैं। इसकी शुरुआत जन्मेजय के नागयज्ञ से होती है। उन्होंने एक राष्ट्रीय इतिहास की रचना की। प्रो. दीक्षित ने कहा कि कामायनी प्रसाद जी की मनीषा का महानतम प्रसाद है। प्रसाद जी आर्यावर्त के समर्थक रहे। वे आर्यावर्त के रूप में क्षेत्रीयता, विचारधारा, जातीयता से परे राष्ट्रीयता की परिकल्पना करते हैं– “निछावर कर दें हम सर्वस्व हमारा प्यारा भारतवर्ष।” साथ ही उनकी कहानियों में संपूर्ण भारत का भूगोल उपस्थित है। उन्होंने कहा कि साहित्यकार के लिए समस्याएँ उठाने के साथ समाधान देना भी ज़रूरी है। प्रसाद ऐसा करते हैं। प्रसाद की कहानियों में कर्तव्य और भावना का द्वंद्व उपस्थित होता है। प्रसाद कई काव्य रूपों का प्रवर्तन करते हैं। उनके नाटकों पर संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी नाटकों का प्रभाव पड़ा। अंत में प्रो. दीक्षित ने गीता के स्थितप्रज्ञ का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रसाद का आनंदवादी दर्शन यही है जहाँ सुख-सुख नहीं और दु:ख-दु:ख नहीं रह जाता।
प्रो. विद्योत्तमा मिश्र ने कहा कि साहित्यकार भी स्रष्टा और द्रष्टा होता है– “अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः।” वह आत्मद्रष्टा, समाजद्रष्टा के साथ ही भोक्ता और विश्वद्रष्टा भी है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी की आचार्य प्रो. विद्योत्तमा ने कहा कि प्रीति ही शक्ति का स्रोत है। प्रेम करने वाला ही संयमी होता है। प्रेम ही चरित्र का निर्माण करता है। प्रसाद आस्था के कवि हैं– जीवन के प्रति और मूल्यों के प्रति। उन्होंने कहा कि भारत वह देश है जिसकी आस्था अमर है।
हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा कि प्रसाद युग की नब्ज़ पकड़ने में सिद्धहस्त थे। उनकी लेखनी यांत्रिक समय में मानवीय भावों को बचाने का कार्य करती है।अतीत का गौरवगान करके प्रसाद राष्ट्र की अस्मिता को सबल करते हैं और देशप्रेम का भाव जगाते हैं। उन्होंने बताया कि अपनी कहानी ‘विरामचिह्न’ में प्रसाद जी अछूतों को मन्दिर में जाने का पक्ष रखते हैं।
‘महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट’ की सचिव डॉ. कविता प्रसाद ने मंचस्थ विद्वानों का अभिनंदन करते हुए कहा कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य प्रसाद के अध्येता विद्वानों को एकत्रित कर उनके विचारों से लाभान्वित होना है। इस महोत्सव द्वारा प्रसाद के साहित्य के विविध आयामों को संगोष्ठी और चित्रकला प्रदर्शनी आदि के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।
उद्घाटन सत्र का संचालन प्रो. हेमांशु सेन और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने किया।
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प्रथम तकनीकी सत्र में ‘जयशंकर प्रसाद का काव्यः राष्ट्र-समाज-संस्कृति’ विषय पर चर्चा हुई। अध्यक्षता करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. रामेश्वर राय ने कहा कि प्रसाद औपनिवेशक काल के रचनाकार हैं। इस औपनिवेशकता से उनके काव्य का कैसा संवाद है? प्रसाद का अध्ययन वि-औपनिवेशीकरण के रूप में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रसाद को अच्छे से पता है कि राजनीतिक गुलामी से अधिक वास्तविक सांस्कृतिक गुलामी होती है। प्रसाद का साहित्य इस सांस्कृतिक गुलामी से आज़ादी के लिए प्रयत्न करता है। प्रसाद की कविता प्रस्ताव और स्वप्न के किनारों पर बहने वाली कविता है। प्रो. राय ने कहा कि प्रसाद का साहित्य हमें एक अफसोस के चौराहे पर खड़ा करता है। उनकी रचनाएँ ऐतिहासिक रिक्तता को छूती हैं इसलिए हम उदास होते हैं। उन्होंने कहा कि जो सभ्यताएँ दुःख को सहेजना भूल जाती हैं, वे बर्बर हो जाती हैं। प्रसाद का राष्ट्र स्पर्श में है, कथन में नहीं। उन्होंने बताया कि प्रसाद परंपरावादी नहीं हैं, वे परम्परा से जिरह करते हैं। जो निवृति है उसे प्रसाद ने अस्वीकार किया। क्योंकि जीवन उत्सव है। क्योंकि जीवन में इच्छाएं हैं, काम है। कामायनी संदेश देती है कि सुख ज़रूरी है, सुख का संग्रह नहीं। प्रो. राय ने कहा कि प्रकृति और मनुष्य के संबंध की रक्षा यदि हमारी इच्छाएं नहीं कर पा रही हैं तो वे भविष्य में विनाश का कारण हैं।
उन्होंने कहा कि हम पिंजराबद्धता से बाहर निकलकर ही सभ्यता को बचा सकते हैं। प्रसाद की कविता में सौन्दर्य को लक्षित करते हुए उन्होंने कहा कि सौंदर्य दरअसल अवगुंठन में होता है। सभ्यता और कविता के सम्बन्ध पर बात रखते हुए उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन किया। उन्होंने कहा कि सभ्यता दरअसल संस्कृति को बाज़ार के दैत्य से बचा लेती है। कविता सभ्यता की आवाज़ नहीं सभ्यता की मंशा है। प्रसाद भारत के कटोरे में औटे जाने वाले दूध नहीं हैं, उनके पास एक विश्वदृष्टि थी। उन्होंने कहा कि प्रसाद की कविता भी सभ्यता के इतिहास में ऐसा घोंसला है जिसे ध्यान से देखे जाने की ज़रूरत है।
प्रो. कैलाश देवी सिंह ने प्रसाद के काव्य में राष्ट्रबोध और विश्वबोध पर बात की। उन्होंने कहा कि प्रसाद राष्ट्र को प्रबुद्ध शुद्ध भारती के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाएँ स्वर्णिम अतीत से ज्ञान प्राप्त कर भविष्य की राह को सुगम बनाने का प्रयास करती हैं। उनकी कविताएँ वीरता के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनमें नारी की मर्यादा, मानवता और श्रद्धा का भाव प्रमुख है। प्रो. सिंह ने प्रसाद जी के जागरण गीतों के माध्यम से सांस्कृतिक उद्बोधन को लक्षित किया। उन्होंने कहा कि हिंसा से नहीं स्नेह और ममत्व से मानव मन पर शासन किया जा सकता है। प्रसाद भारतबोध के निगूढ़ अध्येता थे। उनकी राष्ट्रीय चेतना राष्ट्र की सीमा से निकलकर विश्व तक जाती है। उन्होंने कहा कि स्वार्थ संकुचित राष्ट्रवाद को जन्म देता है जिसका प्रसाद विरोध करते हैं। प्रसाद सार्वदेशिक और सार्वकालिक चेतना के कवि हैं।
इस अवसर पर समस्तीपुर,बिहार के डॉ. निकेश कुमार ने अपना शोधपत्र ऑनलाइन प्रस्तुत किया।
प्रो. हेमांशु सेन ने कहा कि प्रसाद की लेखनी पारस थी। उन्होंने जिस विधा को चुना उसमें अद्भुत आभा और सौन्दर्य का समावेश हो जाता है। उनकी हर रचना विशिष्ट रूप से कलात्मक है। अपने नाटकों के द्वारा वह युगबोध को अभिव्यक्त करते हैं। प्रसाद युगप्रवर्तक रचनाकार हैं। प्रसाद से टकराए बिना कविता पर बात नहीं हो सकती। मुक्तिबोध भी उनकी कामायनी का पुनर्मूल्यांकन करते हैं। प्रसाद आधुनिक युग के कवि हैं और आधुनिक हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कृति कामायनी के रचयिता हैं। वे इसके माध्यम से इच्छा, क्रिया और ज्ञान के असंतुलन को सारी समस्याओं का हेतु बताते हैं। चूंकि केवल रागात्मिका वृत्ति से जीवन संभव नहीं। इसलिए वे संतुलन और समन्वय द्वारा समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। अंत में प्रो. सेन ने कहा कि आनन्द का संधान ही प्रसाद के साहित्य का लक्ष्य है।
डॉ. निकेश कुमार ने जयशंकर प्रसाद के काव्य में मूल्य की आधुनिक विवेचना पर वक्तव्य रखा।
वाराणसी की प्रो. सुमन जैन ने कहा कि जयशंकर प्रसाद समरसता के रचनाकार हैं। छायावाद का काव्य नवजागरण का कार्य करता है और इसके पुरोधा कवि प्रसाद हैं। उनका अंतःस्थल भी बहुत मृदुल था। उनके व्यक्तिव पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि प्रसाद जी पर बनारसी रंग चढ़ा था।
इस सत्र का संचालन डॉ. ममता तिवारी एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुधा ने किया।
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द्वितीय तकनीकी सत्र में जयशंकर प्रसाद का नाट्य साहित्य राष्ट्र-समाज-संस्कृति विषय पर चर्चा हुई जिसमें गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. अनिल राय एवं अलका पाण्डेय अपने वक्तव्य दिए। साथ ही अनेक शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए।इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. विद्योत्तमा मिश्र ने किया। संचालन डॉ.ममता तिवारी तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह ने किया। सांस्कृतिक संध्या के अंतर्गत भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के कलाकारों द्वारा प्रसाद की कविताओं की गीतात्मक प्रस्तुति दी।इस अवसर पर संगोष्ठी से पूर्व 25 फरवरी से जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व कृतित्व पर आधारित चित्रकला प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षु कलाकारों एवं छात्रों द्वारा निर्मित चित्रों की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई।
इस महोत्सव का आयोजन महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश सरकार, राज्य ललित कला अकादमी, संस्कार भारती अवध प्रान्त, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग तथा ललित कला संकाय, लखनऊ विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में किया जा रहा है। संगोष्ठी के समानांतर मालवीय उद्यान में इस अवसर पर संगोष्ठी से पूर्व 25 फरवरी से जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व कृतित्व पर आधारित चित्रकला प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षु कलाकारों एवं छात्रों द्वारा निर्मित चित्रों की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। जिसमें उदीयमान चित्रकारों के साथ देश के प्रतिष्ठित चित्रकार भी उपस्थित रहे। इस आयोजन में लखनऊ विश्वविद्यालय सहित शहर के अन्यान्य संस्थाओं के आचार्यगण तथा छात्र-छात्राओं की उत्साहपूर्ण सहभागिता की।
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