*श्रृंगार सावन में**------ मुक्तककार गिरीश श्रीवास्तव गिरीश*
*श्रृंगार सावन में*
*------ मुक्तककार गिरीश श्रीवास्तव गिरीश*
मुदित हो कर किया मेंघों ने है उपकार सावन में।।
बुझा दी प्यास धरती की दिया उपहार सावन में।।
मिली तृप्ति तपिश तन की मिटी मन मुदित आनंदित-
प्रकृति ने पहन कर चूनर किया श्रृंगार सावन में।।
धरा आकाश आपस में करें मनुहार सावन में।।
सघन वन में मयूरी मगन करती प्यार सावन में।।
पपीहा मोर करते शोर दादुर गीत गाते हैं-
खुशी चारों तरफ छाई मुदित संसार सावन में।।
नदी नाले तलैया ताल एकाकार सावन में।।
बने हैं एक दूजे के गले के हार सावन में।।
पड़े झूले लचकती डाल कजली गा रही सखियाँ-
उमड़ता है घुमड़ता है हृदय में प्यार सावन में।।
जुड़े दिल से हैं दिलवर के सुकोमल तार सावन में।।
कोई इस पार सावन में कोई उस पार सावन में।
विरहणी व्यथित उर सावन में भी आये नहीं प्रियतम-
बसे परदेश में दिल आज कल बेजार सावन में।।
प्रकृति करने चली है अब मधुर अभिसार सावन में।।
रची मेंहदी गदोरी में किया श्रृंगार सावन।।
निहारे नैन कजरारे नहीं आये अभी साजन-
दरक कर टूट न जाये कहीं एतबार सावन में।।
----------------02-8-2026
----------------9919667469
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