सास और बहू’ पेंटिंग में सेवा,संस्कार और स्नेह का संदेश, अशोक सरोज को मिला सम्मान

सास और बहू’ पेंटिंग में सेवा,संस्कार और स्नेह का संदेश, अशोक सरोज को मिला सम्मान
जौनपुर। परिवार केवल रक्त-संबंधों से नहीं, बल्कि सेवा, स्नेह, संस्कार और पारस्परिक उत्तरदायित्व से मजबूत होता है। इसी सकारात्मक सोच को कैनवास पर जीवंत रूप देने वाले चित्रकार अशोक सरोज की पेंटिंग “सास और बहू (पॉजिटिव थिंक)” इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। इस भावपूर्ण कृति को तैयार करने में अशोक सरोज ने काफी मेहनत और लगन दिखाई, जिसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया।2×2.5 फीट के कैनवास पर एक्रिलिक रंगों से तैयार इस चित्र में भारतीय पारिवारिक जीवन के बदलते स्वरूप और पीढ़ियों के बीच स्नेह की परंपरा को बेहद सहज ढंग से प्रस्तुत किया गया है। चित्र के एक हिस्से में सास आसन पर बैठी हैं और बहू उन्हें चाय अर्पित कर रही है, जबकि दूसरी ओर सास अपनी बहू को चाय पिलाती हुई नजर आती हैं। दोनों दृश्य मिलकर सेवा, सम्मान और आपसी अपनत्व का संदेश देते हैं।
चित्र का भाव यह है कि आज जो महिला सास की भूमिका में है, वह कभी स्वयं बहू बनकर इस परिवार में आई थी। उसने अपनी सास की सेवा की और उनसे स्नेह पाया। समय के साथ जब वही बहू सास बनी तो उसने भी अपनी बहू के प्रति प्रेम और सेवा का वही भाव अपनाया। इस प्रकार संस्कार और सकारात्मक सोच एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ती है।
अशोक सरोज ने इस पेंटिंग को तैयार करने में केवल रंगों और ब्रश का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि पारिवारिक जीवन की गहरी भावनाओं को समझकर उन्हें चित्रात्मक रूप देने का प्रयास किया। उनकी मेहनत, कल्पनाशीलता और संदेशपरक कला को लोगों ने सराहा और उन्हें सम्मान प्रदान किया। कैमरे से कैनवास तक का सफर
जौनपुर जनपद के ग्राम चारो के किसान परिवार में जन्मे अशोक सरोज बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। वे बॉलीवुड में वरिष्ठ कैमरा मैन के रूप में कार्य करने के साथ ही गोल्ड मेडलिस्ट चित्रकार और लेखक भी हैं। चलचित्रों की दृश्य भाषा को करीब से समझने का अनुभव उनके चित्रों में भी दिखाई देता है।‘सास और बहू’ पेंटिंग के माध्यम से अशोक सरोज ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि परिवार में हम जैसा व्यवहार करते हैं, वही आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कार बनता है। अधिकार और शिकायत की जगह यदि कर्तव्य, सहानुभूति और प्रेम को प्राथमिकता दी जाए तो सास-बहू का रिश्ता विवाद का नहीं, बल्कि आत्मीयता और सहयोग का सेतु बन सकता है।यह कृति वास्तव में ‘जैसा बोओगे, वैसा ही संस्कार काटोगे’ की सकारात्मक जीवन-दृष्टि को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। सेवा और सम्मान का संस्कार आज दिया जाएगा तो आने वाले समय में वही भाव प्रेम और आत्मीयता के रूप में परिवार को मजबूत करेगा।

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