*मुम्बई की लोकल में यात्रा करना,राम भरोसे*

*मुम्बई की लोकल में यात्रा करना,राम भरोसे*
          मुम्बई का नाम आते ही आम आदमी के जेहन में बड़े अच्छे अच्छे स्वप्न आते हैं।आये भी क्यों नहीं,मुम्बई स्वप्न नगरी जो है। यहाॅं बहुतायत लोगों के स्वप्न पूरा भी होते हैं।बहुतों को रंक से राजा बनता देखा गया है।सबका पेट भरती है मुम्बई।सबका सहारा भी बनती है मुम्बई।एक कहावत है कि मुम्बई में कोई भूखा नहीं सो सकता।यह कहावत ही नहीं सच भी है। मुम्बई का बखान जितना किया जाय कम है।परिवहन में मुम्बई की लोकल ट्रेन और बेस्ट की बस जान और शान दोनों है। मुम्बई की लोकल ट्रेन इतनी मशहूर है कि देश के किसी कोने में केवल लोकल कह भर दो मुम्बई की लोकल ट्रेन सामने से जैसे गुजर जाती है।
         पिछले लेख में मैंने मुफ्तखोरी पर बात लिखी थी कि कैसे एसी लोकल के पैसेंजर नार्मल से १५ गुना अधिक भाड़ा देकर सांसत सहते यात्रा कर रहे हैं।तो वहीं बिना टिकट यात्री धड़ल्ले से उसी एसी लोकल में घुसकर टिकटधारी यात्रियों को चिढ़ाते हुए यात्रा का सुख भोग रहे हैं।वही मुम्बई की शान लोकल ट्रेन में विगत कई वर्षों से यात्रा करना मतलब जान हथेली पर रखकर चलना है।लोग लटक कर कई किलोमीटर की यात्रा प्रतिदिन तय कर रहे हैं।गलती से या पीड़ा से हाॅंथ छूटा मतलब ज़िन्दगी से साथ छूटा।इसपर सरकारें बात तो हर वर्ष करती हैं।पर बात आगे बढ़ती नहीं है।न बात बनती ही है। चुनाव जैसे नजदीक आता है।हर पार्टी के नेता लोकल की भीड़ कम करके लोगों को सहज यात्रा करवाने का वादा तो करती हैं।मगर चुनाव बाद फिर वही वादा लेकर जनता के बीच जाते हैं।यह क्रिया सतत चलती आ रही है।और जनता अपनी जान जोखिम में डालकर प्रतिदिन देश की प्रगति में योगदान देने के लिए राम भरोसे लोकल से यात्रा करने को विवश है।
       वही लोकल अब धीरे धीरे अपराधियों दारुणियों गर्दुल्लों का अड्डा बनती जा रही है।विगत दिनों तीन बारदात ऐसी हुई जो जन सुरक्षा के लिए सवाल बन गई।कि क्या मुम्बई की लोकल ट्रेन यात्रा करने के लिए सुरक्षित है।इसके बावजूद भी लोग चलते जा रहे हैं।भीड़ के समय ट्रेन से गिरकर मरने का जोखिम है तो खाली समय में चाकू बाजों दारुड़ियों गर्दुल्लों से जान को खतरा बनता जा रहा है।दोपहर के समय में प्रथम श्रेणी के कोच में दो चार दारुड़िये बिना टिकट सिट पर या पैसेज में सोये बैठे मिल ही जाते हैं।वही हाल एसी लोकल में भी है।गर्दुल्ले धड़ल्ले से एसी कोच में बैठकर बढ़े ठाट से सिट पर पैर फैलाकर गर्द पीते यात्रा कर रहे हैं।सभ्य यात्री जो यह सोचकर १५ गुना अधिक शुल्क देकर यात्रा कर रहे हैं।वे भयभीत तब तक रहते हैं जबतक गर्दुल्ले उतर नहीं जाते या खुद यात्री उतर नहीं जाता।दो मर्डर होने के बाद और ट्रेन बम विस्फोट के बावजूद भी लोकल ट्रेन के यात्री आज भी असुरक्षित यात्रा कर रहे हैं।इनके जीवन की सुरक्षा के लिए आजतक किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।घटना जब होती है तो दो चार दिन हाय तौबा कर के उसपर मिट्टी डालकर ढक देते हैं।करते कुछ नहीं हैं।जिसकी सुरक्षा की गारंटी देकर वोट लिए,जीतकर उच्चासन पर जा बैठे।उसी को अगले चुनाव तक लिए भुला दिए।छोड़ दिए राम भरोसे।
पं.जमदग्निपुरी

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