*रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है,और कब से मनाया जाता है*

*रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है,और कब से मनाया जाता है*
        हम हर वर्ष रक्षाबंधन का त्योहार मनाते हैं।बहनें भाइयों की कलाई में तरह तरह की राखियां बाॅंधती हैं।कोई सोने की तो, कोई चाॅंदी की तो,कोई सूत की।राखी बाॅंधकर भाइयों से उपहार पाती हैं।भाई लोग भी यथा शक्ति बहनों को उपहार देकर खुश होते भी हैं और बहन को भी खुश करते हैं।मगर बहुत कम लोगों को पता है कि यह रक्षाबंधन का त्योहार क्यों मनाया जाता है और कब से।
         एक भ्रान्ति हम भारतियों में छद्म इतिहासकारों ने फैला दी कि रक्षाबंधन का त्योहार क्षत्राणी रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को सबसे पहले राखी भेजकर भाई बनाया था।अपनी व अपने राज्य की सुरक्षा के लिए मदद मांगी थी।तभी से यह पर्व मनाया जाने लगा।जबकी हुमायूं ने उस राखी की कोई न तो कीमत की और न ही मेवाड़ की रक्षा की।और हमें खूब बढ़ चढ़ के यही किस्सा बचपन से पढ़ाया गया।जो कि सरासर गलत है।
       कोई कहता है द्रोपदी ने कृष्ण को चीर बाॅंधकर भाई माना था इसलिए यह पर्व मनाया जाता है। कुछ हद तक सही भी है।मगर द्रोपदी तो पहले से ही कृष्ण को भाई मानती थी।इसीलिए तो द्रौपदी का एक नाम कृष्णा है।और द्रोपदी ने अंगुली में चीर बाॅंधी थी।जबकी राखी कलाई में बाॅंधी जाती है।द्रोपदी ने जब बाॅंधा तो कोई ऐसा उसके ऊपर संकट नहीं था।न ही वहाॅं कोई रक्षार्थ बात थी।वहाॅं तो एक बहन अपने भाई के हाॅंथ से बहते हुए खून को रोकने के लिए उस समय तत्काल जो बन पड़ा सो किया।इसलिए यह सटीक नहीं है। हालांकि जिस दिन द्रौपदी ने श्रीकृष्ण जी की अंगुली में चीर बाॅंधा था वह दिन श्रावण मास की शुक्ल पक्ष का पूनम ही था।
      सबसे सटीक प्रमाण मिलता है लक्ष्मी जी और दानवराज बलि का।जब भगवान श्रीहरि विष्णु जी वामन अवतार लेकर बलि से सबकुछ मांग लिए।तब भगवान श्रीहरि विष्णु जी ने बलि से वरदान मांगने के लिए कहा।बलि ने कहा कि हम देते हैं मांगते नहीं। भगवान श्रीहरि विष्णु जी ने कहा,जब हम किसी के समक्ष प्रस्तुत होते हैं तो बिना दिए जाते नहीं। इसलिए मांगों।बलि ने कहा जिसके समक्ष त्रिलोकीनाथ हों उसे और क्या चाहिए। भगवान ने कहा फिर भी मांगों।बलि ने कहा ठीक है,यदि आप देना ही चाहते हैं तो,जब मैं अपने महल से बाहर निकलूं तो आपके चतुर्भुज रूप का दर्शन हो। भगवान को बलि ने बाॅंध लिया अपनी भक्ति से।और भगवान बंध गये बलि के दरबान बनकर। तीनों लोकों में हड़कम्प मच गया।सब ढूंढ़ रहे हैं।माता लक्ष्मी परेशान।नारद का ध्यान की,नारद जी उपस्थित होकर सारी वस्तु स्थिति माता लक्ष्मी जी को बताये।माता लक्ष्मी श्रीहरि जी को बैकुंठ वापस लाने के लिए विवश महिला का वेश धारण कर दानवराज बलि के दरवाजे पर पहुंच मेरी रक्षा करो मेरी रक्षा करो त्राहिमाम त्राहिमाम कहकर रोने चिल्लाने लगीं।दानवराज जब सुने, तत्काल उनके पास आये।सारा वृतांत सुनने के बाद उनकी हर इच्छा पूरी करने की व रक्षा करने की प्रतिज्ञा ले लिए।लक्ष्मी जी ने कहा ऐसे नहीं,पहले यह रक्षासूत्र अपनी कलाई में बंधवावो इसके बाद वचन दो।तब मैं मानूंगी की आप मेरी हर इच्छा पूरी करोगे व मेरी रक्षा करोगे।दानव राज बलि ने वह रक्षासूत्र बंधवा कर माता लक्ष्मी जी से कहा अब बता बहन क्या उपहार दूॅं।लक्ष्मी जी ने कहा अपना चौकादार मुझे दे दो।इस तरह भगवान श्रीहरि बलि से मुक्त हुए।मगर बलि माता लक्ष्मी से बंध गये।
 इसीलिए रक्षासूत्र बांधते समय यह मंत्र बोला जाता है।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
येन त्वाम अभिबध्नानि रक्षे मा चल मा चल।।
जिससे यह सिद्ध होता है कि रक्षाबंधन का पर्व सतयुग से ही मनाया जा रहा है।
     यहाॅं ध्यान देने वाली बात यह है कि पर्व का नाम रक्षाबंधन है।और रक्षासूत्र का उपयोग किसके लिए किसने किया तो पता चलता है कि माता लक्ष्मी जी ने बलि के लिए किया और बलि को अपना भाई बनाया।दानव राज बलि भी अपना वचन निभाया।वह दिन भी यही श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा थी।तभी से यह पर्व मनाया जा रहा है।
     मतलब ये कि यह पर्व सादगी और वचन वद्धता का पर्व है। इसमें भाई बहन की रक्षा का प्रण लेता है।और उसकी खुशी का ख्याल रखता है।यह पर्व भाई बहन के निर्मल प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन की सभी भारतवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामना 
पं.जमदग्निपुरी

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