*प्रेम को प्रेम ही रहने दें* –डॉ मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार
*प्रेम को प्रेम ही रहने दें*
–डॉ मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार
जहाँ एक मंगेतर अपने होने वाले पति को रास्ते से हटाने के लिए अपने प्रेमी के साथ मिलकर उसकी हत्या कर देती है। कहीं एक पत्नी अपने पति को प्रेमी के साथ मिलकर मौत के घाट उतार देती है और कहीं एक पति अपनी प्रेमिका को पाने के लिए अपनी ही पत्नी की हत्या कर देता है। कोई प्रेम का प्रस्ताव ठुकरा दे तो उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया जाता है।
क्या इसे प्रेम कहें?
नहीं… यह प्रेम नहीं है।
यहाँ प्रेम नहीं, सिर्फ़ पाना है।
यहाँ त्याग नहीं, सिर्फ़ अधिकार है।
यहाँ समर्पण नहीं, सिर्फ़ ज़िद है।
यहाँ स्वीकार नहीं, जबरदस्ती है।
आज जब प्रेम की ये भयावह तस्वीरें सामने आती हैं, तो मन अनायास उस दौर को याद करता है जब प्रेम शायद इतना आसान नहीं था, लेकिन उसमें एक अलग ही मिठास थी।
एक समय था जब Mills & Boon के उपन्यास प्रेम की दुनिया की खिड़की हुआ करते थे। लोग उनकी प्रेम कहानियाँ पढ़ते थे, पात्रों के साथ हँसते थे, उनके बिछोह में उदास होते थे और उनके मिलन की प्रतीक्षा करते थे। वह भले ही कल्पना की दुनिया थी, लेकिन उस कल्पना में प्रेम के साथ इंतज़ार, भावनाएँ और संवेदनाएँ भी थीं।
गुलेरी जी की उसने कहा था कहानी पड़ी है और प्रेम की परिभाषा को समझिए। राधाजी श्रीकृष्णजी, सीता मैया श्री राम जी, पार्वती जी श्री भोले भंडारी जी का प्रेम अलौकिक हैं, अद्भुत है। अपना बक्सा चित्रा भारद्वाज की कहानी पढ़िए और देखिए एक महिला जब अपना सब कुछ छोड़कर पिया के घर आती है तो किस तरह से वह अपने प्रेम से अचंभित करती है।
फिर प्रेम-पत्रों का दौर आया। एक चिट्ठी लिखी जाती थी और उसके उत्तर की प्रतीक्षा कई दिनों तक रहती थी। डाकिए की आहट भी कभी-कभी धड़कन बढ़ा देती थी। पत्र हाथ में आता तो उसे बार-बार पढ़ा जाता, संभालकर रखा जाता।
आज एक संदेश पल भर में पहुँच जाता है। एक Hi, एक Good Morning, एक Good Night और दो नीली टिकों के बीच जैसे प्रेम की पूरी दुनिया सिमट गई है।
सुविधाएँ बढ़ीं, दूरियाँ कम हुईं, लेकिन क्या प्रेम भी गहरा हुआ?
कहीं न कहीं हमें ठहरकर यह प्रश्न पूछना होगा।
प्रेम आखिर है क्या?
प्रेम किसी को पाने की सनक नहीं है।
प्रेम किसी पर अधिकार जमाने का नाम नहीं है।
प्रेम सामने वाले की इच्छा के विरुद्ध उसे अपना बनाने का नाम नहीं है।
प्रेम तो वह है जहाँ किसी की खुशी अपनी खुशी से बड़ी हो जाए।
प्रेम वह है जहाँ मन किसी के लिए मर मिटने को तैयार हो, लेकिन उस व्यक्ति को चोट पहुँचाने का विचार भी मन में न आए।
प्रेम में त्याग है।
प्रेम में धैर्य है।
प्रेम में सहनशीलता है।
प्रेम में विश्वास है।
और सबसे बढ़कर—प्रेम में स्वीकार है।
अमृता प्रीतम और इमरोज़ को याद कीजिए। उनके रिश्ते की खूबसूरती केवल साथ रहने में नहीं थी, बल्कि उस गहरे सम्मान और स्वीकार में थी जिसमें प्रेम को किसी सामाजिक परिभाषा में बाँधने की कोशिश नहीं की गई।
हीर-रांझा और लैला-मजनू की प्रेमकथाएँ सदियों बाद भी इसलिए याद हैं कि प्रेम वहाँ केवल पाने की इच्छा नहीं था; उसमें इंतज़ार था, विरह था, संघर्ष था और समर्पण था।
सच्चा प्रेम सामने वाले को बाँधता नहीं, उसे समझता है।
उसकी स्वतंत्रता छीनता नहीं, उसका सम्मान करता है।
उसकी खुशी को अपनी जीत से बड़ा मानता है।
प्रेम हमें बदलता है—लेकिन सामने वाले को अपने अनुसार बदलने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर का अहंकार कम करने के लिए।
और जब प्रेम में स्वार्थ कम होता जाता है, अहंकार पिघलता है, त्याग बढ़ता है और करुणा जन्म लेती है, तब प्रेम केवल दो मनुष्यों के बीच का संबंध नहीं रह जाता।
वह धीरे-धीरे प्रार्थना बन जाता है।
शायद इसीलिए प्रेम हमें परमेश्वर के करीब ले जाता है।
तो आइए—
प्रेम को प्रेम ही रहने दें।
उसे अधिकार न बनाएं।
उसे सौदा न बनाएं।
उसे ज़िद न बनाएं।
किसी को पाना प्रेम नहीं है,
किसी की खुशी में अपनी खुशी खोज लेना प्रेम है।
क्योंकि सच्चा प्रेम वह नहीं जो हमें किसी का बना दे,
सच्चा प्रेम वह है जो हमें एक बेहतर इंसान बना दे।
ख़ुसरो की इन पंक्तियों का भाव कितना गहरा है—प्रेम ऐसी धारा है जिसमें उतरने वाला अपने पुराने अहं और “मैं” को पीछे छोड़ देता है; जो सचमुच डूबता है, वही उस प्रेम का पार पाता है।
“प्रेम में इंसान बदल जाता है, यह प्रेम की ताकत है जहां इंसान अच्छा बन जाता है।”
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