विगत 25वर्षों से कार्य कर रहे सैकड़ों संविदा प्राध्यापकों को अतिथि शिक्षक बनने पर किया गया मजबूर

विगत 25वर्षों से कार्य कर रहे सैकड़ों संविदा प्राध्यापकों को अतिथि शिक्षक बनने पर किया गया मजबूर 
मुंबई। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के देश भर में स्थित 13 परिसरों में कार्यरत संविदा प्राध्यापकों की सेवा-स्थिति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा वर्षों से संविदा पद पर कार्यरत बड़ी संख्या में प्राध्यापकों को अतिथि प्राध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य किए जाने के बाद शिक्षकों में असंतोष एवं भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना बढ़ने की बात सामने आ रही है। शिक्षकों के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस निर्णय के लिए उड़ीसा उच्च न्यायालय में चल रहे प्रकरण तथा केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के कथित मौखिक निर्देशों का हवाला दिया है, जबकि शिक्षकों का दावा है कि उन्हें शिक्षा मंत्रालय की ओर से इस संबंध में कोई लिखित आदेश उपलब्ध नहीं कराया गया है। शिक्षकों का कहना है कि जिन प्राध्यापकों ने विश्वविद्यालय में 10, 15, 20 तथा 25 वर्षों से अधिक समय तक सेवाएं दी हैं, उनकी सेवा-स्थिति को अचानक निम्न स्तर पर ले जाना उनके दीर्घकालीन अनुभव एवं योगदान के साथ न्यायसंगत नहीं है। अतिथि एवं संविदा शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के अथक परिश्रम कर विश्वविद्यालय को बेहतर ग्रेड प्राप्त कराने में महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं अकादमिक योगदान दिया था। अतिथि शिक्षकों के लिए लगभग ₹50,000 तथा संविदा शिक्षकों के लिए ₹57,700 मूल वेतन के साथ HRA आदि की व्यवस्था की गई और कुछ परिसरों को ‘हार्ड स्टेशन’ घोषित कर अतिरिक्त सुविधाएं भी प्रदान की गईं। शिक्षकों का कहना है कि इन निर्णयों से यह उम्मीद बनी थी कि विश्वविद्यालय प्रशासन संविदा एवं अतिथि शिक्षकों की दीर्घकालीन समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा। शिक्षक सूत्रों के अनुसार, लंबे समय से कार्यरत कुछ अतिथि शिक्षकों को उनके अनुभव के आधार पर सामान्य साक्षात्कार के माध्यम से संविदा शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। वर्ष 2023 में विश्वविद्यालय तथा आदर्श महाविद्यालयों में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर भी कुछ शिक्षकों ने गंभीर प्रश्न उठाए हैं। उनका आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में आंतरिक रूप से वर्षों से कार्यरत योग्य अभ्यर्थियों को अपेक्षित अवसर नहीं मिला और बड़ी संख्या में बाहरी अभ्यर्थियों का चयन किया गया। शिक्षकों के अनुसार, उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से बार-बार आग्रह किया कि वर्षों से कार्यरत योग्य संविदा एवं अतिथि शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति की प्रक्रिया में उचित अवसर प्रदान किया जाए, लेकिन इस संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरती गई। शिक्षकों के अनुसार, जून 2024 में डेक्कन कॉलेज, पुणे में स्थायी शिक्षकों की भर्ती के लिए जारी विज्ञापन में लिखित परीक्षा को साक्षात्कार के लिए आवश्यक चरण बनाया गया था। शिक्षकों का दावा है कि कई आंतरिक अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में सफल नहीं हो सके तथा परीक्षा के प्रश्नपत्र एवं उत्तर-कुंजी सार्वजनिक नहीं किए जाने को लेकर भी प्रश्न उठे, जिसके कारण चयन प्रक्रिया एवं आंतरिक अभ्यर्थियों को मिले अवसर को लेकर असंतोष बढ़ा। नवंबर 2025 में आदर्श महाविद्यालयों में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए बहु-चरणीय लिखित परीक्षा का विज्ञापन जारी किए जाने के बाद संविदा एवं अतिथि शिक्षकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। शिक्षकों के अनुसार, उन्होंने सेवा-सुरक्षा, स्थायीकरण, समान कार्य के लिए समान वेतन तथा भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सहित विभिन्न माँगें प्रशासन के समक्ष रखीं, लेकिन संवाद के प्रयासों के बावजूद उनकी समस्याओं का अपेक्षित समाधान नहीं हुआ, जिसके बाद कुछ संविदा शिक्षकों ने न्यायिक एवं अन्य संवैधानिक संस्थाओं का रुख किया। शिक्षकों के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन से संवाद स्थापित नहीं होने के बाद कुछ संविदा एवं अतिथि शिक्षकों ने अपनी समस्याओं से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्रालय, सांसदों, मंत्रियों एवं अन्य जनप्रतिनिधियों को पत्र के माध्यम से अवगत कराया तथा कुछ मामलों में न्यायालय की शरण भी ली।  शिक्षकों का दावा है कि लगातार किए गए पत्राचार, संवैधानिक संस्थाओं से संपर्क तथा न्यायालयीन प्रक्रियाओं के बीच आंतरिक अभ्यर्थियों को अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिला। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता एवं चयन के मानदंडों को लेकर अभी भी शिक्षकों की ओर से प्रश्न उठाए जा रहे हैं। शिक्षकों ने चयन समितियों में विषय विशेषज्ञों की नियुक्ति को लेकर भी प्रश्न उठाए हैं और कुछ नामों के संबंध में पूर्व में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जाँच की आवश्यकता जताई है; इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस स्तर पर नहीं हुई है तथा संबंधित व्यक्तियों अथवा विश्वविद्यालय प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी सार्वजनिक किया जाना आवश्यक होगा। वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष विश्वविद्यालय के 13 परिसरों में वर्षों से कार्यरत संविदा प्राध्यापकों को अतिथि प्राध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य किए जाने से जुड़ा है। शिक्षकों का कहना है कि जिन प्राध्यापकों की नियुक्ति विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संविदा शिक्षक के रूप में हुई थी तथा जिन्होंने वर्षों तक विश्वविद्यालय में निरंतर अध्यापन किया, उन्हें अचानक अतिथि शिक्षक की श्रेणी में लाना सेवा में अवनति के समान है। शिक्षकों के अनुसार, इनमें ऐसे प्राध्यापक भी शामिल हैं जिन्होंने पहले अतिथि शिक्षक के रूप में कार्य किया और बाद में अपने अनुभव एवं निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर संविदा शिक्षक का पद प्राप्त किया था, लेकिन अब उन्हें पुनः अतिथि शिक्षक बनाए जाने से उनके पद, पारिश्रमिक, सेवा-सुरक्षा एवं भविष्य को लेकर गंभीर प्रश्न उत्पन्न हो गए हैं। शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया है कि जुलाई 2026 में अतिथि शिक्षक के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के लिए ₹100 के शपथ-पत्र की शर्त रखी गई तथा शपथ-पत्र की भाषा एवं उसके संभावित प्रभाव को लेकर भी उनके बीच चिंता है। शिक्षकों का कहना है कि वर्षों से संविदा पद पर कार्यरत शिक्षक को अतिथि शिक्षक के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन को संबंधित शिक्षकों के साथ व्यापक संवाद करना चाहिए था। इसी बीच कुछ शिक्षकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन में कथित क्षेत्रीय असंतुलन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि पिछले कई वर्षों से विश्वविद्यालय के शीर्ष प्रशासनिक पदों पर एक विशेष क्षेत्र के अधिकारियों की निरंतरता दिखाई देती है और नियुक्तियों, कार्यक्रमों तथा प्रशासनिक निर्णयों में भी क्षेत्रीय प्रभाव की आशंका व्यक्त की जा रही है। इन आरोपों की भी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तथ्यात्मक जांच की मांग की गई है। शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के वर्तमान शीर्ष प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर भी प्रश्न उठाए हैं और कुलपति एवं कुलसचिव की नियुक्ति के लिए निर्धारित पात्रता, चयन समिति की कार्यवाही, अनुभव संबंधी मानदंड तथा चयन प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने की माँग की है, ताकि विश्वविद्यालय प्रशासन में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। पूरे प्रकरण को लेकर संविदा शिक्षकों के एक वर्ग ने विश्वविद्यालय में कथित प्रशासनिक अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रियाओं, स्थानांतरण, सेवा-शर्तों तथा अन्य निर्णयों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। शिक्षकों का कहना है कि यदि सभी संबंधित अभिलेखों, चयन समितियों की कार्यवाही, भर्ती के मानदंड, विषय विशेषज्ञों की नियुक्ति, सेवा-परिवर्तन तथा प्रशासनिक निर्णयों की स्वतंत्र जाँच कराई जाती है, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। संविदा शिक्षकों की प्रमुख माँगों में उनकी पूर्व सेवा-स्थिति बहाल करना, वर्षों से कार्यरत शिक्षकों के अनुभव एवं सेवाकाल को ध्यान में रखते हुए स्थायी समाधान की नीति बनाना, समान कार्य के लिए समान वेतन, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था, सेवा-सुरक्षा तथा सभी परिसरों में एक समान नियम लागू करना शामिल है। संविदा शिक्षकों का कहना है कि वर्तमान विवाद को केवल किसी एक आर्थिक राशि अथवा भत्ते के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि वास्तविक प्रश्न उन शिक्षकों के भविष्य का है जिन्होंने विश्वविद्यालय में वर्षों तक अध्यापन एवं अकादमिक सेवाएं प्रदान की हैं। शिक्षकों ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था, प्रशासनिक पारदर्शिता, शिक्षकों की सेवा-सुरक्षा और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना है। शिक्षकों ने मांग की है कि विश्वविद्यालय में उठ रहे सभी गंभीर प्रश्नों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के विरुद्ध आरोप प्रमाणित होते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए तथा यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो संबंधित पक्ष को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया जाए। संविदा शिक्षकों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाना नहीं, बल्कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा, प्रशासनिक पारदर्शिता, शिक्षकों की सेवा-सुरक्षा तथा विद्यार्थियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय प्रशासन इन गंभीर सवालों पर क्या रुख अपनाता है और वर्षों से विश्वविद्यालय की सेवा कर रहे संविदा प्राध्यापकों की सेवा-संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।

Comments

Popular posts from this blog

*एन के ई एस स्कूल के विद्यार्थियों ने जीता कबड्डी प्रतियोगिता*

*शिक्षिकेला त्रास देऊन आत्महत्येस प्रवृत्त करणाऱ्या अधिकाऱ्यांवर कारवाई करा अन्यथा कामावर बहिष्कार टाकणार- सुभाष मोरे*

सीए परीक्षा में अनुष्का उमेश शुक्ला की शानदार सफलता