*संस्कारों का खोखलापन*डॉ त्रिलोकचंद फतेहपुरी*

*संस्कारों का खोखलापन*
डॉ त्रिलोकचंद फतेहपुरी*

       सनातन संस्कृति में संस्कारों को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है । संस्कार किसी भी व्यक्ति के वे  अच्छे गुण ,  विचार ,  आदतें और नैतिक मूल्य होते हैं जो उसे उसके परिवार और समाज से मिलते हैं ।  वैसे सनातन संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक के  षोडश संस्कारों की प्रायः चर्चा की जाती रही है ,  जिसमें - गर्भाधान, पुंसवन,  सीमंतोन्नयन , जातकर्म ,  नामकरण , निष्क्रमण , अन्नप्राशन , चूड़ाकर्म , कर्ण वेध,  विद्या आरंभ,  उपनयन , केशांत , समावर्तन , विवाह और अंत्येष्टि शामिल हैं । वही संस्कार व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व को सही दिशा व आकार प्रदान करते हैं । संस्कार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को बेहतर और उपयोगी बनाते हैं । सुधार ,  सजावट ,  शुद्धिकरण आदि भी संस्कार के पर्याय हो सकते हैं । सभी व्यक्ति अपनी संतान को संस्कार देकर  विनम्र , सुसभ्य , सुशिक्षित , सदाचारी , संवेदनशील बनाना चाहते हैं । संस्कारों की सार्थकता भी यही है -  बड़ों का सम्मान करना , सच बोलना ,  व्यवहार में विनम्रता व शिष्टाचार होना , जीवों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होना ,  दया  व परोपकार और सेवा भाव होना ।  कुछ विशेष शब्दों के प्रयोग  करने से भी व्यवहार में विनम्रता झलकती है । मुख्यतः "*आप*" शब्द द्वारा संबोधन करना  । धन्यवाद , शुक्रिया , आभार व्यक्त करना, जरा-सी भी भूल होने पर भूल को स्वीकारना ,  क्षमा मांग लेना ,  गलती मान लेना। बहुत से व्यक्ति अंग्रेजी में  *Thank You* और *Sorry* जैसे शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं । इन शब्दों से भी व्यक्तित्व में निखार आता है । सादा रहन-सहन ,  सादा भोजन ,  साधारण पहनावा , मानवीय व्यवहार , समाज के साथ समन्वय ये भी व्यक्ति के संस्कारों में शामिल हैं । संस्कारों से ही व्यक्ति का मन- मस्तिष्क , शरीर   पावन-पवित्र  रहता है और वह सभ्य और जिम्मेदार इंसान बनता है । संस्कारी व्यक्ति ही अपने परिवार ,  समाज  और राष्ट्र का शुभचिंतक होता है । मानवता की भावना ही मनुष्य को एक अच्छा नागरिक  बनाती है । लेकिन आजकल उपर्युक्त संस्कारों की  मर्यादा भंग हो चुकी है  ।
             सभी माता-पिता , गुरुजन ,  समाज और राष्ट्रभक्ति वर्तमान पीढ़ी से संस्कार अपनाने की अपेक्षा रखता है ।लेकिन वर्तमान पीढ़ी में संस्कारों का खोखलापन नजर आता है । अधिकतर लोग शिक्षित होकर  सुसंस्कृत होने का दिखावा करते हैं । वे ऊपर से तो सही और सभ्य नजर आते हैं लेकिन अंदर से खाली हैं । अंदर से उनकी सोच सदा ही नकारात्मक  बनी रहती है । उनमें कुसंस्कार , बुरी आदतें , क्रूरता , संवेदनहीनता ,  अनुशासनहीनता ,   झूठ बोलना , अपने से बड़ों का अपमान करना ,  माता-पिता की अवज्ञा करना ,  गुरुजनों को ऑंखें दिखाना , नशे में संलिप्त  होना और पाश्विक प्रवृत्ति का घिनौना रूप आदि नजर आते हैं । जबकि सभी माता-पिता अपनी संतान में मानवता के गुण भरते हैं , गुरुजन उन्हें अनुशासन सिखाते हैं ,  बड़ों का आदर करना सिखाते हैं  । लेकिन फिर भी उनमें सहनशीलता , धैर्य की कमी , जरा-जरा सी बात पर मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं । राह चलते झगड़ा मोल ले लेते हैं और कुछ तो हत्या तक कर देते हैं । कई चोरी करते हैं और सीनाजोरी भी करते हैं । कई भ्रष्टाचारी तो इतना दंभी होते हैं कि किसी में भी हिम्मत नहीं जो उनके बारे में मुंह खोल सके ।वे भी संस्कारी कहलाते हैं । उनके ऐसे कुकृत्य देखकर या सुनकर माता-पिता व समाज को बहुत ग्लानि होती है , उन्हें शर्मिंदा होना पड़ता है । ऐसे युवाओं में मानवीय मूल्यों का अभाव होता है और उनकी सोच सकारात्मक की बजाय नकारात्मक और संकीर्ण होती है । उनमें स्वार्थ , ईर्ष्या , द्वेष , लालच , अहंकार ,  तनुक मिजाजी स्वभाव की भावना विशेष तौर से पाई जाती है । वे संस्कारी गुणों की वास्तविकता से दूर नजर आते हैं  । कुछ लोग पूजा-पाठ भी करते हैं ,  बड़ों का सम्मान भी करते हैं लेकिन फिर भी वे सच नहीं बोलते , कई तो पराई स्त्रियों पर  अत्याचार , अनाचार करते हैं ।  कमजोर , लाचार , अनजान व्यक्तियों के साथ दुर्व्यवहार और  शोषण करते हैं  । उनको दान-दक्षिणा देकर  बड़ा दानी और समाज सेवी होने का ढोंग करते हैं  लेकिन फिर उनके  धन व इज्जत को ही छल-कपट से लूटते भी हैं । महिलाओं का भी सम्मान करना तो बहुत दूर की बात है । कुछ जाति- धर्म के आधार पर भी भेदभाव करते हैं  । कई सहिष्णु  और उदार होने का दिखावा करते हैं , संस्कारी और सदाचारी होने का भी ढोंग करते हैं जबकि वे भ्रष्टाचार और अनैतिक कार्यों में संलिप्त पाए जाते हैं । ऐसे व्यक्ति माता-पिता की नजरों में सभ्य , सुशील , सदाचारी , अनुशासन प्रिय बने रहते हैं । जबकि कई स्त्रियों और छोटी बच्चियों के साथ गैंगरेप  , यौन शोषण , हत्या और  अश्लील घटनाओं में शामिल पाए जाते हैं  । कई लड़कियों की खरीद फरोख्त  में भी शामिल पाए जाते हैं । ऐसी  शर्मनाक घटनाएंँ या खौफनाक वारदातें इंसानियत को शर्मसार करती हैं  । ऐसे लोगों के कुकृत्य , घिनौनी वारदातें हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देती हैं  ।फिर ऐसे दुष्टों के प्रति समाज के लोगों का गुस्सा फूट पड़ना ,  सड़क जाम करना , धरना देना , आक्रोश रैली निकालना आदि प्रतिशोध की भावना का प्रदर्शन किया जाना आवश्यक हो जाता है । इस डिजिटल मोबाइल  मीडिया , तकनीकी वैज्ञानिक युग में लोगों को अपने मन की भ्रांतियां दूर कर सोचने विचारने की शक्ति को मजबूत एवं विकसित करना चाहिए ताकि युवाओं में संस्कारों के खोखलेपन को भरा जा सके । कुछ में तो संस्कारों की मर्यादा कायम रहे। लेकिन वर्तमान माहौल और हालात को देखते हुए ऐसा होना असंभव  नहीं तो दुष्कर अवश्य लगता है ।
           - डॉ० त्रिलोक चंद फतेहपुरी 
               महेंद्रगढ़  हरियाणा ।
        संपर्क सूत्र - 9992381001

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