*जिह्वा है जिद्दी सास.....!*
*जिह्वा है जिद्दी सास.....!*
तुम्हारी....!
ऐच्छिक या अनैच्छिक
छुअन के आगे....या फिर...
तुम्हारी....!
बहकती या महकती
सुगंध के सामने...या फिर...
तुम्हारी शरम -भरम वाली
दृष्टि के सामने....या फिर...
प्रिय-अप्रिय सुनने-सुनाने की
तुम्हारी शक्ति के सामने..या फिर..
तुम्हारी.....!
मीठे या कसैली बोल के
प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य के सामने.....
बौना ही दिखता है
दुनिया का सारा सुख सौंदर्य....
फीका सा ही दिखता है....
सभी रूप-रंग और राग-विराग
सचमुच....यही "पाँच" ही तो...
जीवन में होते हैं खास....पर...
मित्रों...मैंने यही देखा है...कि...
बत्तीस पहरेदारों से घिरी जिह्वा..!
जब तलक रहती है पहरे में उदास
जीवन में बनी रहती है मिठास....
एक इसके ही टपकाने से लार,
या ले लेने से सिसकी उधार....
(चाहे सुख की हो या दुख की....)
उसके मुखारबिन्द से....!
अवमुक्त चंचल उदगार....
आसानी से कराने लगते हैं,
इस बात का अहसास....
कि अन्य चार ज्ञानेंद्रियाँ....!
बहू सरीखी हैं....और ...
जिह्वा है जिद्दी सास....
जिह्वा है जिद्दी सास....
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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