पूर्व जिलाधिकारी बहराइच डाॅ. दिनेश चन्द्र सिंह की संवेदनशीलता:संस्मरण
पूर्व जिलाधिकारी बहराइच डाॅ. दिनेश चन्द्र सिंह की संवेदनशीलता:संस्मरण
बात उन दिनों की है जब कड़ाके की #शीतलहरी ने पूरे इलाके को अपनी आगोश में ले रखा था। हाड़ कंपाने वाली ठंड और घने कोहरे के बीच जिंदगी जैसे ठहर सी गई थी। इसी दौरान किसी जीव प्रेमी ने सोशल साइट्स पर एक #वीडियोक्लिप अपलोड किया, जिसमें बहराइच के झिंगहाघाट के पास एक बड़े से पेड़ की ऊंचाई से एक #चील लटकती दिखाई दे रही थी। यह पक्षी कातिल चायनीज मंझे में फंस गया था और शायद उससे निकलने की जद्दोजहद में और भी उलझकर लाचार हो गया था। हालात यह थे कि वह पेड़ की एक ऊंची डाल से लिपटे मंझे के सहारे नीचे हवा में झूल रहा था।
वीडियो क्लिप डालने वाले ने अपने वाइस ओवर में भारी मन से बताया था कि इस भीषण शीत लहरी में यह पक्षी पिछले #तीनदिनों से इसी बेबसी में उल्टा लटक रहा है, जो किसी भी संवेदनशील इंसान को #झकझोरने के लिए काफी था। आम दिनों में आसमान की ऊंचाइयों को नापने वाले वो मजबूत पंख, #इंसानी_लापरवाही के प्रतीक बने उस चीनी मांझे की जानलेवा गिरफ्त में तड़प रहे थे। नीचे से गुजरने वाले लोग उसे देखते, अफसोस जताते और आगे बढ़ जाते। क्योंकि किसी के पास न तो इतना वक्त था और न ही उस ऊंचाई तक पहुंचकर उसकी जान बचाने का कोई साधन। तीन दिनों की उस #असहनीय पीड़ा और जमा देने वाली ठंड ने चील को पूरी तरह #अधमरा कर दिया था, उसकी सांसें बस टूटने ही वाली थीं।
जब इस दर्दनाक मंजर की बात बहराइच के तत्कालीन जिला अधिकारी #डा_दिनेशचंद्र जी के संज्ञान में लाई गयी, तो जो कुछ हुआ वह उनकी #संवेदनशीलता की एक अमिट मिसाल बन गया। एक आईएएस अधिकारी, जिसके कंधों पर पूरे जिले की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक अमले का भारी-भरकम बोझ होता है, उसने एक #बेजुबान पक्षी के दर्द को इतनी शिद्दत से महसूस किया। डा. दिनेश चंद्र जी केवल फाइलों को दौड़ाने वाले पारंपरिक हाकिम नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर एक #सहृदयसाहित्यकार और लेखक भी वास करता है, शायद इसीलिए एक बेजुबान की चीख उनके अंतर्मन तक सीधे पहुंच गई। उन्होंने न सिर्फ तत्काल स्वयं #वनविभाग को इस त्रासदी की सूचना दी, बल्कि मुसीबत में फंसे इस बेजुबान पक्षी को #अविलंब रेस्क्यू किये जाने के कड़े आदेश भी दिये। उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप और लगातार की जा रही #मॉनिटरिंग का ही नतीजा था कि रेस्क्यू टीम पूरी मुस्तैदी के साथ झिंगहाघाट मौके पर पहुंची। कड़ाके की ठंड और तमाम दिक्कतों के बावजूद मुस्तैद अमले ने उस चीनी मांझे को काटा और तीन दिनों से मौत से जंग लड़ रही उस चील को सकुशल नीचे उतारा।
उसे न सिर्फ उस #जानलेवा फंदे से मुक्ति मिली, बल्कि डा. दिनेश चंद्र जी की व्यक्तिगत देखरेख में उसका उचित #उपचार और दाना-पानी भी सुनिश्चित किया गया। जब वह चील पूरी तरह स्वस्थ होकर एक बार फिर से खुले आसमान में पंख फैलाकर उड़ गई, तो ऐसा लगा मानो वह मुक्त गगन का परिंदा जाते-जाते उस संवेदनशील और #साहित्यानुरागी अधिकारी को #दुआएं दे गया हो।
कहना बस इतना है कि पद और पावर तो बहुत से नौकरशाहों के पास होती है, लेकिन उस पावर के पीछे एक ऐसा संवेदनशील दिल होना, जो किसी बेजुबान के दर्द को भी अपनी आत्मा से #महसूस कर सके, ऐसा #विरलेव्यक्तित्वों में ही देखने को मिलता है। यह घटना सिर्फ एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं थी, बल्कि मानवता और जीव-दया का वो #व्यावहारिकपाठ थी जो समाज को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी।
हाल ही में बीती 30 जून 2026 को डाॅ. दिनेश चंद्र जी अपनी इस लंबी और शानदार प्रशासनिक सेवा से #सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अपनी इस लंबी पारी को पूरी गरिमा और संवेदनशीलता के साथ विश्राम देने के बाद, अब वे अपने जीवन की दूसरी पारी में कदम रख चुके हैं। एक कुशल प्रशासक के साथ-साथ वे एक #बेहतरीनकलमकार भी हैं, इसलिए हमारी तरफ से उनके इस नए सफर, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु जीवन की #अनंतशुभकामनाएं। उम्मीद ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास है कि प्रशासनिक दायित्वों से मुक्त होकर आपकी साहित्यिक और वैचारिक लेखनी अब समाज को और अधिक समृद्ध करेगी।
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