खत्म होती सहनशीलता, संवाद पर भारी पड़ता अपराध–डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार

खत्म होती सहनशीलता, संवाद पर भारी पड़ता अपराध
–डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार

आज समाज जिस दौर से गुजर रहा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। हाल के दिनों में सामने आई अनेक घटनाएँ मन को झकझोर कर रख देती हैं। कहीं प्रेम संबंधों के नाम पर हत्या हो रही है, कहीं विवाह से असहमति के कारण किसी की जान ले ली जाती है, तो कहीं छोटी-सी बात पर हिंसा का विस्फोट हो जाता है। अभी हाल ही में लोकल ट्रेन में हुई एक घटना ने भी सोचने पर मजबूर कर दिया। बारिश के कारण खिड़की खुली थी। एक यात्री ने दूसरे से केवल इतना कहा कि, "कृपया खिड़की बंद कर दीजिए।" मामूली-सी बात पर विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट तक की नौबत आ गई और एक व्यक्ति की जान चली गई। प्रश्न यह है कि आखिर हम इतने असहिष्णु कैसे हो गए कि एक साधारण अनुरोध भी हमें क्रोधित कर देता है? लोनावला की दुखद घटना हो या मसूरी का हत्याकांड—ये केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि समाज के सामने खड़े गंभीर प्रश्न हैं। आखिर हमारी युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है? क्या कारण है कि असहमति, असफलता, अस्वीकृति या मतभेद को स्वीकार करने की क्षमता लगातार कम होती जा रही है?
कहीं न कहीं आधुनिक जीवन की भागदौड़, सोशल मीडिया का प्रभाव, त्वरित सफलता की चाह और भावनात्मक असंतुलन भी इसके कारण हैं। लेकिन केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। परिवार बच्चे की पहली पाठशाला है। यदि घर में संवाद, प्रेम, धैर्य और संस्कार होंगे, तो वही गुण बच्चों के व्यक्तित्व में भी उतरेंगे। युवाओं को समझना होगा कि यदि किसी रिश्ते को स्वीकार नहीं करना है, तो साहस के साथ "ना" कहना सीखें। माता-पिता से बात करें, परिवार से चर्चा करें और संवाद का मार्ग अपनाएँ। किसी भी परिस्थिति में हिंसा समाधान नहीं हो सकती। एक निर्दोष व्यक्ति की जान लेकर कोई भी समस्या हल नहीं होती, बल्कि अनेक परिवारों का जीवन उजड़ जाता है। साथ ही माता-पिता को भी अपने बच्चों की भावनाओं और इच्छाओं को समझना होगा। केवल समाज, प्रतिष्ठा या परंपरा के दबाव में कोई निर्णय थोपना उचित नहीं है। जब संवाद समाप्त हो जाता है, तब त्रासदियाँ जन्म लेती हैं। आज आवश्यकता है – सहनशीलता, संवेदना, धैर्य और आत्मसंयम की। हमें आने वाली पीढ़ी को केवल डिग्रियाँ और धन नहीं देना है, बल्कि ऐसे संस्कार देने हैं जो उन्हें एक अच्छा इंसान बना सकें। क्योंकि वास्तविक शक्ति किसी को हराने में नहीं, बल्कि स्वयं के क्रोध और अहंकार पर विजय पाने में है। याद रखिए – एक क्षण का क्रोध, जीवन भर का पश्चाताप बन सकता है और एक क्षण का संवाद, कई जीवन बचा सकता है। सहनशीलता जब खो जाती है, रिश्ते टूटने लगते हैं, क्रोध की छोटी चिंगारी से घर भी छूटने लगते हैं। खिड़की बंद करने भर से जब झगड़े बढ़ने लगते हैं,तब समझो मानव मन के दीपक बुझने लगते हैं।

संवादों की डोर थाम लो, मत नफरत को बढ़ने दो,
मानव हो तो मानवता को अपने भीतर रहने दो।

हर जिद पूरी हो जाए, यह जीवन का नियम नहीं,"ना" सुनकर भी मुस्काना सीखो, यही सबसे बड़ी जीत सही। आने वाली पीढ़ी को बस इतना उपहार दे जाएँ, प्रेम, संस्कार और धैर्य देकर बेहतर संसार दे जाएँ। अंत में बस इतना कहना चाहूँगी कि 
किसी की जान लेना किसी भी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि यह एक आपराधिक मनोवृत्ति का परिचायक है। यदि साहस दिखाना ही है, तो किसी की हत्या करने का नहीं, बल्कि समय रहते स्पष्ट शब्दों में "ना" कहने का साहस दिखाइए। यदि शक्ति दिखानी है, तो हिंसा की नहीं, संवाद की शक्ति दिखाइए। जब परिवारों में संवाद होगा, रिश्तों में सम्मान होगा और मन में सहनशीलता होगी, तभी अपराधों की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकेगा,  क्योंकि जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहाँ संबंध जीवित रहते हैं; और जहाँ संबंध जीवित रहते हैं, वहाँ समाज सुरक्षित रहता है। क्रोध में जो निर्णय लेते, वे जीवन भर रोते हैं,संवादों के दीप जलाकर ही रिश्ते आगे होते हैं। हिंसा से इतिहास नहीं, केवल आँसू लिखे जाते हैं,प्रेम, धैर्य और सहनशीलता से ही समाज सुरक्षित बनते हैं।

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