*साहित्य का मूल उद्देश्य समाज की संवेदना को ज्ञानात्मक संवेदना के माध्यम से साहित्य में स्थापित करना है।*


*साहित्य का मूल उद्देश्य समाज की संवेदना को ज्ञानात्मक संवेदना के माध्यम से साहित्य में स्थापित करना है।*
नान्दी सेवा न्यास द्वारा आयोजित 25 जून को "डॉ राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय स्मृति समारोह सह द्विदिवसीय पांचवीं राष्ट्रीय संगोष्ठी" का  आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ डॉ राजेन्द्र प्रसाद पांडेय की प्रतिमा पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन हुआ। वैदिक एवं पौराणिक मंगलाचरण एवं स्वस्तिवाचन के साथ कार्यक्रम की विधिवत् शुरुआत हुई। शांभव एवं वैष्णव रत्न ने अपने दादा द्वारा विरचित 'कर्मविमर्श:' का सस्वर पाठ किया। सत्र की रूपरेखा बताते हुए श्री शशिकला पांडेय जी ने सभी विद्वज्जन का स्वागताभिनंदन किया । उन्होंने कहा कि इस द्विदिवसीय संगोष्ठी में 'डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय:चिंतन एवं संवेदना'  विषय पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इसी सत्र में  डॉ.  राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय कृत 'जीवनचिन्तनम्', प्रो. शशिकला पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'होना विद्यानिवास मिश्र', 'मेरे साक्षात्कार', बलराम जी की 'संपूर्ण कहानियां' शीर्षक से पुस्तक एवं 'नान्दी' पत्रिका का लोकार्पण मंचस्थ अतिथियों पण्डित दयानिधि मिश्र (अध्यक्ष), माधव कौशिक (विशिष्ट अतिथि, साहित्य अकादमी अध्यक्ष) , प्रो. बिहारी लाल शर्मा(मुख्य अतिथि, कुलपति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय), श्री बलराम (सारस्वत अतिथि, समकालीन भारतीय साहित्य पत्रिका के संपादक), डॉ अत्रि भारद्वाज (पूर्व अध्यक्ष, काशी पत्रकार संघ), प्रो. चितरंजन मिश्र  द्वारा सम्पन्न हुआ। सभी लोकार्पित पुस्तकों और पत्रिकाओं का सविस्तार परिचय श्री बलराम जी ने प्रस्तुत किया। बीज वक्तव्य में प्रो. चितरंजन जी ने कहा पाण्डेय जी अपनी प्रशासनिक व्यस्तताओं के होते हुए भी अपने मित्रों के लिए समय निकाल ही लेते थे; क्योंकि उनके भीतर एक संवेदनशील सर्जक हमेशा जीवित रहता था। वे हमेशा दूसरों के सुख दुःख में शामिल होते और लोगों को भी अपने में शामिल करते थे। पाण्डेय जी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञानबोध के पक्षधर थे। साथ ही कुंठित आधुनिकता और कुंठित परंपरावादिता दोनों से रहित थे। पाण्डेय जी के साथ अपनी स्मृतियां साझा करते हुए डॉ अत्रि भारद्वाज जी ने कहा कि पाण्डेय जी लोक और शास्त्र की सम्यक् व्याख्या करने में समर्थ थे। परदुखकातरता उनके साहित्य का मूलाधार है। वे सही मायने में संस्कृति संवर्धक पुरुष के रूप में हमारे बीच हमेशा उपस्थित रहेंगे। टूटते बिखरते परिवारों की चिंता उनको लगातार पीड़ित करती थी। अगले वक्ता के रूप में माधव कौशिक जी ने कहा कि पाण्डेय जी किसी भी विचारधारा से आक्रांत नहीं हुए। इसलिए उनमें मौलिकता बनी रहे। सही मायनों में वे परंपरा की नई से नई व्याख्या लगातार करते रहे हैं। उनके साहित्य में भारतीयता की असली आत्मा बसती है। मुख्य अतिथि प्रो. बिहारी लाल शर्मा जी ने कहा कि पाण्डेय जी एक व्यक्ति नहीं, विचार हैं। उनकी लेखनी में भारतीय परंपरा के मजबूत आधार मौजूद हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री दयानिधि मिश्र ने सभी वक्ताओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम पातिव्रत धर्म का अनुपम उदाहरण है। कार्यक्रम की सर्जनात्मक समृद्धि ने इसे ऐतिहासिक महत्व का कार्यक्रम बना दिया है। सत्र का संचालन प्रो. रामसुधार सिंह जी ने और धन्यवाद ज्ञापन कीर्तिरत्न जी के किया।
प्रथम वैचारिक सत्र में ‘डाॅ राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय का काव्य संसार’ विषय पर चर्चा हुई। प्रथम वक्ता के रूप में डॉ. प्रभात मिश्र ने बताया कि निजी से निजी और अपरिचित से अपरिचित विषय पर कविता लिखी जा सकती है। इन्होंने 'लिखनियादरी' और 'पाण्डुलिपि' कविता पर विस्तार से बातचीत उपस्थापित किया।  अगले वक्ता के रूप में श्री दिलीप कुमार शर्मा जी ने 'लड़कियां हैं तो' नामक कविता संग्रह पर अपनी बातचीत केंद्रित की । यह बताया कि इस संग्रह में समय की धड़कन दर्ज है। इसमें स्त्री जीवन के बहुस्तरीय यथार्थ का चित्रण है। श्री फारुक अफरीदी ने भी अपने वक्तव्य में 'लड़कियां हैं तो' संग्रह को बहुत व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया। उन्होंने बताया कि इस संग्रह में स्त्रियों के बहाने जीवन की विविध छवियां उभरकर हमारे सामने आई हैं। विशेष रूप से 'विदा होती गौरैया' नामक कविता के बहाने पूरी पर्यावरण चिंता को भी अपने वक्तव्य में शामिल कर लिया। डॉ. मुक्ता  ने अपने वक्तव्य की शुरुआत में कहा कि शशिकला जी की वजह से ही  डॉ राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय का यश: काय हमारे बीच मौजूद है। डॉ. पाण्डेय जी के साथ अन्य अनेक समकालीन कवियों ने कविताओं में रागात्मक संबंधों और दुर्दम जिजीविषा को रेखांकित किया है। साथ ही यह बताया कि जब तक 'लड़कियां हैं तो' जैसे कविता संग्रह लिखे जाते रहेंगे तब तक दुनिया में संवेदनशीलता बनी रहेगी। इन्होंने उत्तराधुनिकता के आलोक में स्त्री विमर्श की प्रासंगिकता पर चर्चा की। प्रो. प्रभाकर सिंह ने 'लड़ियां हैं तो' कविता संग्रह के माध्यम पाण्डेय जी और प्रगतिशील कवियों की पारिवारिक कविताओं में अभिव्यक्त संबंधों पर बखूबी चर्चा की है। साथ ही प्रेम के शाश्वत मूल्यों पर आसन्न संकटों की ओर इशारा किया।  कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. वशिष्ठ अनूप जी ने सभी वक्ताओं पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियां करते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डाला।  उन्होंने बहुत ओजस्वी वाणी से लोकगीतों और संस्कृत साहित्य में अभिव्यक्त मानवीय रागात्मक संबंधों की चर्चा की और इन्हें अद्वितीय बताया। उन्होंने बताया कि भारतीय समाज पारिवारिक संबंधों के निचले से निचले स्तर तक निर्वाह करता है। हर छूटती चीज को बचा लेने का उद्यम पाण्डेय जी अपनी कविताओं में करते हैं। संबंध जीवन का अनुबंध नहीं है, अपितु ऊर्जा है। साथ ही कालिदास और भवभूति की कविताओं के संदर्भों से विषय को विस्तार दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन अखिल मिश्र जी ने किया।
द्वितीय अकादमिक सत्र का विषय 'राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय का कथा संसार' रखा गया। इस सत्र के प्रथम वक्ता के रूप में 
श्री विनय दास जी ने पाण्डेय जी के 'गाँव बेगाँव' उपन्यास तथा फरिश्ते' कहानी संग्रह के माध्यम से ग्रामीण संवेदना एवं संस्कृति की चर्चा की। वे ग्रामीण यथार्थ के सजग चितेरे थे। उनका संघर्षपूर्ण जीवन और प्रशासनिक अनुभव ही उनके लिए उपजीव्य की तरह है। अगले वक्ता के क्रम में सुश्री विजय शर्मा ने  पाण्डेय जी के कथा साहित्य को हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। अध्यक्षता कर रहे प्रो बलिराज पाण्डेय ने डा पाण्डेय जी के संस्मरणों को उद्धृत करते हुए उन्हें समाज के संवेदनशीलत संस्कृति पुरुष के रूप में रेखांकित किया। इस सत्र का संचालन प्रीति जायसवाल ने तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो वंदना मिश्र ने किया।
तृतीय अकादमिक सत्र का शीर्षक 'हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष: काशी और नान्दी' रखा गया। दिल्ली विश्वविद्यालय से पधारे सत्र के मुख्य वक्ता डॉ राजकुमार उपाध्याय 'मणि' ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों को काशी से जोड़ते हुए 'नान्दी' पत्रिका के योगदान की चर्चा की। उन्होंने बताया कि पत्रकारिता और साहित्य दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिनसे समाज और राजनीति दोनों प्रभावित होते हैं। सत्र की अध्यक्षता करते हुए व्योमेश शुक्ल जी ने कहा कि मुख्य धारा की पत्रकारिता को साहित्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता। साहित्य ने पिछली दो सदियों से निरंतर हिंदी की पत्रकारिता को दिशा दी है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचंद्र शुक्ल प्रथमत: संपादक ही थे। उनकी संपादन वृत्ति ने उनका और उनके साथी लेखकों का संस्कार और परिष्कार किया। डॉ मुकेश जी ने संचालन किया और धन्यवाद सर्वेश मिश्र ने की। इस अवसर पर देश विदेश के अनेक विद्वान सहित काशी के विद्वान भी उपस्थित रहे। इन अभ्यागत अतिथियों का स्वागत नांदी सेवा न्यास के सचिव यशोरत्न पाण्डेय ने किया। इसकी जानकारी संगोष्ठी के संयोजक डॉ राजकुमार उपाध्याय मणि ने दी ।
सचलभाष 9479372732

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