पिता का प्रेम ,अनमोल खजाना – डॉ मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार
पिता का प्रेम ,अनमोल खजाना
– डॉ मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार
पिता का साया जीवन में बहुत ज़रूरी होता है,
पिता होते हैं तो लगता है, हर सपना पूरा होता है।
वो धूप में चलते रहते हैं, हम पर छाया कर देते हैं,
अपने सारे सुख त्यागकर, जीवन हमारा भर देते हैं।
कॉपी-किताबों पर नाम लिख, सपनों को आकार देते हैं,
हर मुश्किल को आसान कर, जीने का आधार देते हैं।
बचपन में घोड़ा बन जाते, कंधों पर हमें घुमाते थे,
उंगली पकड़कर चलना क्या, गिरकर संभलना सिखाते थे।
हर भीड़ से बचाकर हमको, दुनिया का मेला दिखलाया,
खुद चाहे कितने थके हों, चेहरे पर स्नेह सजाया।
जेब में कितना धन था, इसका अहसास न होने दिया,
अपनी जरूरतें टाल-टाल कर, हर अरमान हमारा जिया।
कभी खिलौने, कभी किताबें, कभी खुशियों का उपहार दिया,
अपने हिस्से का सुख भी जैसे, बच्चों के नाम लिख दिया।
त्याग की गाथा उनकी, शब्दों में कहाँ समाती है,
माँ की ममता दिख जाती है, पिता की तपस्या छिप जाती है।
चार कपड़ों में खुद रह लेते, पर हमें सर्वस्व दिलाते हैं,
अपनी हर इच्छा को खोकर, बच्चों के सपने सजाते हैं।
जब तक सिर पर हाथ पिता का, मन में कोई भय नहीं होता,
उनके विश्वास के आगे, मुश्किल का पर्वत भी बड़ा नहीं होता।
बिन कहे ही समझ जाते हैं, मन की हर पीड़ा, हर दर्द,
उनके बिना अधूरा लगता है, जीवन का हर भाव, हर अर्थ।
आज अगर मैं कुछ भी हूँ, उसमें उनका योगदान है,
मेरी हर उपलब्धि में बस, उनके संघर्ष का सम्मान है।
ईश्वर का आशीष हैं पिता, जीवन का सबसे सुंदर साया,
जिसने पिता का प्रेम पाया, उसने अनमोल खज़ाना पाया।
पिता केवल एक रिश्ता नहीं,
जीवन की सबसे मजबूत छत होते हैं।
और जब वह सिर से उठ जाए,
तब समझ आता है कि पिता क्या होते हैं।
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