163 सृजन संवाद में ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट पर विमर्श
163 सृजन संवाद में ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट पर विमर्श
जमशेदपुर, झारखण्ड। सृजन संवाद की 163वीं गोष्ठी का आयोजन ऑनलाइन माध्यम से किया गया। कार्यक्रम स्ट्रीमयार्ड पर हुआ और फेसबुक लाइव के जरिए प्रसारण किया गया। स्ट्रीमयार्ड संचालन अनुराग रंजन ने किया। साहित्य और सिनेमा जगत से जुड़े कई साथियों ने इसमें भाग लिया। इस बार से सृजन संवाद ‘समय और सिनेमा’ नाम से एक नई शृंखला प्रारंभ कर रहा है। पैनल का संचालन डॉ. नेहा तिवारी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. विजय शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और सत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की। बताया, यह नाजी कालीन फ़िल्मों की शृंखला में होने के बावजूद बिल्कुल भिन्न मिजाज की फ़िल्म है। इंग्लिश सबटाइटल्स के साथ जर्मन भाषा की इस फ़िल्म में नाजी अत्याचार सीधे-सीधे कहीं नहीं दिखाया गया है, मगर यह सारे समय उपस्थित है। उन्होंने संक्षेप में संवादियों का परिचय दिया।
संचालक डॉ. नेहा तिवारी ने विषय प्रवेश करते हुए हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए, मगर यह किसी-न-किसी रूप में हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। ‘ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ के निर्देशक जोनाथन ग्लेज़र ने मात्र चार फ़िल्में बनाई, मगर वे ऐतिहासिक फ़िल्मकारों में गिने जाते हैं। चूँकि यह फ़िल्म बहुत कम लोगों ने देखी है, अत: उन्होंने पहले संवादी ओमा शर्मा से आग्रह किया, वे फ़िल्म की विशिष्टता बताए। जाने-माने कहानीकार, अनुवादक ओमा शर्मा ने बताया, चालीस यातना शिविरों में से सबसे बड़े यातना शिविर ऑश्वित्ज का कमांडर रुडोल्फ़ होस ठीक यातना शिविर के बगल में एक दुमंजिले घर में अपने परिवार के साथ रह रहा है। एक ओर वह यातनाओं की योजना बनाता है, तो दूसरी ओर अपने परिवार के साथ मौज मस्ती करता है। उसकी पत्नी वहाँ अपने बागीचे को लेकर मगन है। उनकी जिंदगी कैदियों की यातना से निर्लिप्त चल रही है। फ़िल्म कहीं भी यातना शिविर के भीतर नहीं जाती है, हाँ, वहाँ से आती आवाजे दर्शकों को बेचैन करती हैं। कुछ समय बाद जब होस का तबादला होना है, तो उसकी पत्नी जाना नहीं चाहती है, क्योंकि उसे लगता है, यहाँ सब कुछ आसानी से मिल रहा है। यहीं एक स्त्री कैदियों केलिए छिपा कर खाना लाती है। अमानुषता के बीच मनुष्यता बची है, यह बड़ी बात है।
दूसरे संवादी सिनेमा, संगीत विशेषज्ञ योगेंद्र आहूजा ने संचालक के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, इस फ़िल्म का निर्देशक दर्शक को सच्चाई के रू-ब-रू खड़ा कर देता है। यह किसी काल्पनिक खलनायक की कहानी न हो कर ऐसे सामान्य लोगों को दिखाती है, जो बिना किसी नैतिक द्विविधा के बस आज्ञा पालन करते जाते हैं। ये भयंकर चेहरे वाले राक्षस नहीं, बल्कि सामान्य जीवन जीने वाले आपके-हमारे जैसे लोग हैं। यह दर्शक को अपने भीतर झांकने, आत्म-चिंतन केलिए प्रेरित करती है। खूब तैयारी के साथ आए आहूजा ने फ़िल्म की कई खूबियों को बताया। दर्शक में शामिल रक्षा गीता ने लिखा, निर्देशक ने अपना पुरस्कार एलैक्जेंड्रिया की स्मृति को समर्पित किया था। अमरेंद्र कुमार शर्मा को अन्ना हारेन्ट का उल्लेख अच्छा लगा।
दो ऑस्कर प्राप्त फ़िल्म मार्टिन अमीस के ‘ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ बेस्ट सेलर उपन्यास पर आधारित है। पेशे से डॉक्टर, साहित्य-सिनेमा में रूचि रखने वाली डॉ. मंजुला मुरारी ने किताब एवं फ़िल्म के अंतर को बताया। किताब छ: अध्याय एवं प्रत्येक अध्याय तीन भाग में विभाजित है, साथ में एक परिशिष्ट है। किताब में रुडोल्फ़ होस के अलावा दो अन्य प्रमुख किरदार हैं। किताब सौंडर्स कमांडो की बात भी करती है, शिविर की भयावह सच्चाई दिखाती है। किताब में होस की पत्नी के एक प्रेम प्रसंग को उजागर होने पर होस द्वारा उसे प्रताड़ित करने की बात आती है। फ़िल्म एवं उपन्यास दो भिन्न कलाएँ हैं, दोनों में अंतर होना स्वाभाविक है।
राँची से वैभव मणि त्रिपाठी की अर्थपूर्ण टिप्पणी आई: ‘ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ एक अलग दुनिया सृजित करती है। फ़िल्म में हँसते-खेलते लोग कभी ज़ॉम्बी सरीखे लगते हैं, कभी शुतुरमुर्ग सरीखे। जब अंत में आप जानते हैं, फ़िल्म सत्य घटनाओं पर आधारित है तो आपको अपने मनुष्य कहलाने पर शर्मसार होने जैसा महसूस होने लगता है।’ ओमा शर्मा ने ‘ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ जैसी ही ऑस्कर प्राप्त 2006 की फ़िल्म ‘द लाइव्स ऑफ़ अदर्स’ की चर्चा की।
करीम सिटी कॉलेज की मास कॉम की विभागाध्यक्ष, कुशल संचालक डॉ. तिवारी ने चर्चा को समेटते हुए फ़िल्म में ध्वनि के विशिष्ट प्रयोग की चर्चा की। उन्होंने संवादियों, दर्शक/श्रोताओं का धन्यवाद किया।
संगोष्ठी में देश-विदेश से दर्शक/श्रोता जुड़े जिनमें जमशेदपुर से साहित्य कला फाउंडेशन की डॉ. क्षमा त्रिपाठी, डॉ मीनू रावत, गीता दूबे, आभा विश्वकर्मा, राँची से यायावरी वाया भोजपुरी के वैभव मणि त्रिपाठी, कोलकता से मधु कांकरिया, लखनऊ मध्य जोन के एडीसीपी एवं कवि जितेन्द्र कुमार दुबे, गोरखपुर से उमा उपाध्याय, अनुराग रंजन, बैंग्लोर से पत्रकार अनघा मारीषा, कवि परमानंद रमण, पुणे से सिने-विश्लेषक एवं इतिहासकार मनमोहन चड्ढ़ा, जौनपुर से अश्वनी तिवारी, दिल्ली से रक्षा गीता, रश्मि रावत, नवीन कुमार नैथानी, वाराणसी से विमलचंद्र पाण्डेय, वर्धा से समालोचक अमरेंद्र कुमार शर्मा आदि सम्मिलित हुए।
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