*सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफ़ेसर डॉ अनन्त मिश्र जी की कलम से....*पूर्व विभागाध्यक्ष *दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय*

*सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफ़ेसर डॉ अनन्त मिश्र जी की कलम से....*
पूर्व विभागाध्यक्ष 
*दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय*


पता नहीं भारतीय संस्कृति भारत और विदेश में फैलेगी कि नहीं, पर भारत में प्रकृति तो नष्ट हो जाएगी, ऐसा लगता है। हम लोग पूर्वांचल के निवासी जो आज़ादी के पहले जन्मे थे, और अब भी जीवित हैं, वे देख रहे हैं कि हमारे गाँवों के बाग-बगीचे, उपवन और नदियों तथा टूटी-फूटी कंकड़ की सड़कों के किनारे लगे विशाल वृक्ष सब के सब काट दिए गए। जो पेड़ लग भी रहे हैं, वे अभी या तो बड़े नहीं हुए हैं, या उनकी प्रजाति बौनी है। भोग-विलास और तेज़ रफ़्तार में चलने वाली गाड़ियों के लिए अत्यंत चौड़ी, लगभग हवाई अड्डे की पट्टी की तरह सड़कें और पुल बनाने के फेर में वृक्षों की इतनी कटान हो रही है कि मनुष्यों के लिए छाया और पक्षियों के बसेरों के लिए कोई स्थान नहीं रह गया है।
इस पूर्वांचल में ज़रा सी गर्मी बढ़ती नहीं थी कि थोड़ी-बहुत बारिश हो जाती थी। लोगों का पंखों से काम चल जाता था। गाँव में बच्चे, बूढ़े दोपहरी में बड़े-बड़े बागों में बैठे-लेटे रहते थे। लोगों के पास वैभव कम था पर सुकून ज़्यादा था। अब वैभव और चमक-दमक तो बढ़ी है, पर शांति और नमी का अभाव हो गया है। आदमी के भीतर भी आर्द्रता खत्म हो गई है, बाहर तो वह बची ही नहीं।
लोग अपने रिश्तेदारों के यहाँ भी एक रात नहीं टिकते। शहरों से रात-बिरात, तेज़ रफ़्तार वाली गाड़ियों से लौट आते हैं। निदियाए ड्राइवर, जल्दी पहुँचाने के अनुरोध के कारण एक्सीडेंट कर बैठते हैं। परिवार के परिवार मर जाते हैं। कुत्ते तो लगता है कि अपनी स्वाभाविक मौत से कम, सड़क पर कुचल कर ज़्यादा मर रहे हैं। कस्बे नष्ट हो रहे हैं। तमाम थोड़ी पूँजी के व्यापारियों के घर-दरवाज़े और उनकी दुकानें तोड़ दी जा रही हैं।
विकास, विनियम और विरोधाभास की विडंबना में दिखाई पड़ रहा है। पहले हर गाँव, कस्बे का एक मिजाज़ था, शहरों का भी अपना स्वरूप था, तीर्थों और पवित्र स्थानों के अपने अलग-अलग रूप थे। हर जगह की अपनी पहचान थी; अब सब कुछ एक जैसा हो गया है। प्रकृति के रंगों को भी एक करने की पुरज़ोर चेष्टा चल रही है। पता नहीं आने वाली पीढ़ी हमारे ऊपर गर्व करेगी या इस तरह के मॉडल के आगामी प्रभाव पर रोएगी।
साफ़ पानी केवल नारियल में ही बचा है; आर.ओ. ने तो जल में मौजूद लाभकारी तत्वों को नष्ट कर दिया है। पैदल चलना तो लगभग समाप्त है। अपने ही घर और परिवेश की पहचान गायब है। फलों-फूलों से उनकी सुगंध गायब है। तमाम पक्षी खत्म हो गए हैं। अन्नों की अनेक किस्में खत्म हो गईं। वृन्दावन, मथुरा, बनारस, गोरखपुर, अयोध्या और जाने कितने मेरी जानकारी के तीर्थों में, लोग उनकी पूर्ववर्ती आध्यात्मिक शोभा और उनके पवित्र स्वाद को चखने से वंचित होते जा रहे हैं।
भगवान जाने आगे क्या-क्या होगा। हम जिस संस्कृति को ज़िंदा देखना चाहते हैं, लोग भूल रहे हैं कि प्रकृति को नष्ट कर संस्कृति को नहीं बचाया जा सकता। कुछ लोगों को क्या, ज़्यादा लोगों को ये बातें अच्छी नहीं लगेंगी। गाँव में कहावत है—'आँवले की खटाई और बूढ़ों की बातें किसी को अच्छी नहीं लगतीं।'
बहरहाल, नए भारत के लिए मेरी शुभकामनाएँ।

Comments

Popular posts from this blog

*एन के ई एस स्कूल के विद्यार्थियों ने जीता कबड्डी प्रतियोगिता*

बृहन्मुंबई महानगर पालिका जुनी पेन्शन योजना कृती समिती द्वारे महिला दिन साजरा करण्यात आल संनि.अन्वेषक रोहिणी झगडे सम्मानित*

शिक्षा द्वारा हजारों बच्चों की जिंदगी बनाने वाली राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त प्रधानाध्यापिका सुश्री ललीता गुलाटी का दु:खद निधन