एक जीवित विश्वविद्यालय का स्वरूप है स्त्री — डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार

एक जीवित विश्वविद्यालय का स्वरूप है स्त्री 
—  डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार


माना कि महिलाएँ आज भी
रसायन विज्ञान, भौतिक शास्त्र, अर्थशास्त्र,
प्रबंधन, बैंकिंग और अनेक क्षेत्रों में
संख्या के आधार पर पुरुषों से कम दिखाई देती हैं…

लेकिन फिर भी
इन सभी क्षेत्रों के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों,
अर्थशास्त्रियों, प्रबंधकों और विद्वानों की
पहली गुरु, पहली पाठशाला
और पहली प्रयोगशाला
एक स्त्री ही होती है —
माँ।

वह प्रयोगशाला
जहाँ इंसान गढ़े जाते हैं…
जहाँ संस्कारों की नींव रखी जाती है,
जहाँ प्रेम, त्याग, अनुशासन
और मानवता का निर्माण होता है।

स्त्रियाँ जन्मजात विदुषी होती हैं।
वह लक्ष्मी भी हैं,
अन्नपूर्णा भी हैं,
सरस्वती भी हैं…
और समय आने पर
दुर्गा भी बन जाती हैं।

जिसे दुनिया अक्सर
केवल “घर संभालना” कहकर
छोटा समझ लेती है,
असल में वही
सबसे बड़ा प्रबंधन है।

एक पुरुष शायद घर चला सकता है,
पर एक स्त्री
पूरे घर में जीवन भर देती है।
वह दीवारों को घर
और घर को परिवार बनाती है।

इतिहास गवाह है
कि संसार के बड़े-बड़े वीर,
महापुरुष और युग निर्माता भी
किसी स्त्री की गोद में ही
संस्कार पाकर महान बने।

वह माँ राजमाता जिजाबाई ही थीं
जिन्होंने बालक शिवा को
केवल पुत्र नहीं,
एक वीर, धर्मरक्षक और राष्ट्रनायक
छत्रपति शिवाजी महाराज बनाया।

वह माँ जयवंता बाई ही थीं
जिन्होंने अपने पुत्र में
स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रप्रेम के
ऐसे संस्कार डाले
कि वही बालक आगे चलकर
महाराणा प्रताप बना।

क्योंकि संसार की हर महान प्रतिभा की
पहली पाठशाला
एक माँ होती है।

एक स्त्री कितनी विदुषी होती है,
आइए उसके जीवन को ही
एक जीवित विश्वविद्यालय मानकर
उसकी अद्भुत विद्वता को समझने का प्रयास करें।

क्या कभी किसी ने
सच में समझा है
उस स्त्री की बुद्धिमत्ता को
जो दिन-रात
सिर्फ घर नहीं संभालती,
बल्कि जीवन सँवारती है?

हम डिग्रियों में ज्ञान ढूँढते हैं,
पद और पहचान में सम्मान ढूँढते हैं…
पर हर घर में
एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय बसता है।

जहाँ बिना किसी किताब के
हर दिन जीवन का विज्ञान जन्म लेता है…
जहाँ अनुभव ही शिक्षा है,
और प्रेम ही सबसे बड़ी डिग्री।

जिसे दुनिया केवल घर समझती है,
वहीं से पीढ़ियाँ संस्कार सीखती हैं।
वहाँ केवल दिनचर्या नहीं चलती,
वहाँ रिश्ते, संवेदनाएँ
और सभ्यताएँ जन्म लेती हैं।

गणित वहाँ हर रोज़ मुस्कुराता है—

कितने लोगों की कितनी ज़रूरतें,
कहाँ कितना समय देना है,
कैसे सीमित साधनों में
सबकी इच्छाओं को संतुलित करना है।

बिना कॉपी-कलम के
हर हिसाब सही हो जाता है,
क्योंकि माँ के अनुभव में
ईश्वर का ज्ञान समा जाता है।

भौतिक विज्ञान भी वहीं बसता है—

कब धैर्य रखना है,
कब दृढ़ होना है,
कब मौन रहकर समझाना है,
और कब आवाज़ उठानी है।

जीवन की परिस्थितियों का
इतना सटीक संतुलन,
शायद किताबें भी
इतने प्रेम से न सिखा पाएँ।

रसायन विज्ञान का अद्भुत संसार—

वह टूटे मनों को जोड़ देती है,
क्रोध को प्रेम में बदल देती है,
उदासी में आशा घोल देती है,
और संघर्षों में साहस मिला देती है।

उसके स्पर्श में ऐसा जादू होता है
कि बिखरे हुए रिश्ते भी
फिर मुस्कुराने लगते हैं।

प्रबंधन कला की वह जीवित मिसाल है—

एक साथ चार काम करना,
सबको समय पर संभालना,
कम समय में सब व्यवस्थित करना।

यह किसी बड़ी कंपनी का
मैनेजमेंट नहीं तो और क्या है?

कॉरपोरेट की बड़ी-बड़ी बैठकों में
जिस “मैनेजमेंट स्किल” की बातें होती हैं,
उसका सबसे जीवंत रूप तो
सदियों से एक स्त्री के जीवन में दिखाई देता है।

मल्टीटास्किंग उसकी पहचान है—

एक तरफ चाय उबल रही है,
पूजा की थाली भी सज रही है,
पति और बच्चों का टिफिन भी भर रहा है,
बच्चों को उठाकर तैयार भी किया जा रहा है।

फोन भी उठा रही है,
दरवाज़ा भी खोल रही है,
और बारिश आ जाए तो
छत से कपड़े भी दौड़कर ला रही है।

खुद भी ऑफिस के लिए
तैयार हो रही है,
फिर भी चेहरे पर मुस्कान रहती है,
और घर व्यवस्थित चलता रहता है।

उसकी निरीक्षण शक्ति अद्भुत होती है—

दाल पकी या नहीं,
बच्चे का मन उदास है या नहीं,
पति की थकान चेहरे पर दिख रही है या नहीं,
घर में कौन चुपचाप किसी चिंता में है—

उसकी नज़र सब समझ जाती है।
वह शब्दों से पहले
चेहरों की भाषा पढ़ लेती है।

अर्थशास्त्र भी वही संभालती है—

सीमित बजट में घर चलाना,
भोजन तैयार करना,
बचे हुए संसाधनों का सदुपयोग करना,
मौसम के अनुसार आवश्यकताओं को चुनना।

तीज-त्योहार की तैयारी,
अतिथियों की आवभगत,
नेग और रिश्तों का निर्वाह—
घर की आर्थिक नीति
अक्सर उसी की समझ से चलती है।

मनोविज्ञान भी उसे भलीभाँति आता है—

किसका मन उदास है,
किसे प्रोत्साहन चाहिए,
कौन बिना कहे दर्द छिपा रहा है—

वह सब जानती है।

कभी वह
मदर टेरेसा सी ममता बन जाती है,
तो कभी अपने दुःख छिपाकर
सबके जीवन में उजाला भर देती है।

वह केवल परिवार नहीं संभालती,
पूरा संसार सँभालने की क्षमता रखती है।

वह स्त्री चाहे पढ़ी-लिखी हो या नहीं,
अंग्रेज़ी जानती हो या नहीं,
पर उसके अनुभव, धैर्य और प्रेम के आगे
बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ भी छोटी लगती हैं।

वह केवल अन्नपूर्णा नहीं,
समय आने पर दुर्गा भी बन जाती है।
प्रेम दे तो गंगा सी निर्मल,
और अन्याय हो तो
चंडी सी प्रखर हो जाती है।

स्त्री को कम मत आँकिए,
क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक,
डॉक्टर, लेखक, सैनिक और उद्योगपति भी
सबसे पहले
एक माँ की गोद में ही गढ़े जाते हैं।

दुनिया की हर महान प्रतिभा की
पहली प्रयोगशाला,
एक स्त्री की ममता ही होती है।

क्योंकि
स्त्री केवल घर नहीं संभालती,
वह पीढ़ियाँ गढ़ती है,
संस्कार बोती है,
और प्रेम से संसार रचती है।

इसलिए अगली बार
जब वह चुपचाप
सबकी चिंता करती दिखाई दे,
तो उसे सामान्य मत समझिए…

एक पल रुककर
उस माँ, पत्नी, बहन या बेटी को
दिल से धन्यवाद ज़रूर कहिए,
जो अपने हिस्से की थकान छिपाकर भी
आपके जीवन को सहज बनाती है।

और केवल धन्यवाद ही नहीं…
कभी उसके लिए भी
थोड़ा समय निकालिए,
उसकी मुस्कान का कारण बनिए।

आइए नमन करें
उस महामानवी को,
जो अपने हाथों से
केवल कार्य नहीं करती,
बल्कि पूरे घर में
प्रेम, अपनापन और जीवन भर देती है।

जो हर परेशानी को
मुस्कान से हल्का कर देती है,
और अपने त्याग से
घर को सचमुच स्वर्ग बना देती है।

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