मैं हूँ एक नदी

मैं हूँ एक नदी 
मैं हूँ एक नदी 
इठलाती, बल खाती 
अपनी मौज में 
इतराती, बहती जाती.

चुनती हूँ मैं 
अपना रास्ता स्वयं 
करते हुए ध्वस्त
कितने पर्वतों और
कंदराओं का अहम. 

चाहा जिन्होंने मुझे रोकना 
अथवा मेरा पथ तय करना 
काट दिया मैंने शीष उनका
काट दी उनकी भुजाएँ 
कर लिया मार्ग प्रशस्त 
अथवा बदल ली 
अपनी राहें.

कर दिया कितने पाषाणों को 
मैंने संवार कर देवता तुल्य 
किन्तु जग नें कहाँ अब तक 
समझा है मेरा समग्र मूल्य 

मैं हूँ प्रवाह में निरन्तर 
ठहरना नहीं है नियति मेरी 
बहती जा रही हूँ कल कल 
सहती जा रही हूँ पल पल 
जारी है संघर्ष हर पल 
है कहाँ ठहराव मेरा 
सोच कर है मन विकल. 

नहीं है, स्वीकार्य मुझको 
महासागर में मिल जाना 
सह नहीं सकती कभी मैं 
अपने अस्तित्व को खो देना. 

चुन लूँगी मैं स्वयं 
ठहराव अपना 
जैसे तय किया है 
मैने स्वयं अब तक 
बहाव अपना .

है निश्चित ही मुझे भी 
एक संगी की चाह 
जो प्रतीक्षारत जोह 
रहा हो केवल मेरी राह.  

जो दे सके मुझे 
प्रेम और पूर्णता 
जो भर सके मेरे 
हृदय की रिक्तता 
जो कर सके सम्मान मेरा 
जो रख सके नित मान मेरा 

छोड़ आई हूँ असंख्य संकेत
और पदचिन्ह पथ पर 
आ जाएगा खोजता 
मेरा प्रियतम पीछे चलकर .

संग उसके मैं बन जाऊँगी
जलप्रपात या निकल जाऊंगी
 सींचती प्यासी धरा को 
अथवा समा जाऊँगी वसुन्धरा में 
एक खज़ाने की तरह 
और बन जाऊँगी स्रोत 
भविष्य की नदी का. 

मैं हूँ एक नदी 
इठलाती, बल खाती 
अपनी मौज में 
इतराती ,बहती जाती.

कवि सन्तोष कुमार झा
सीएमडी कोंकण रेलवे मुंबई

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