युवा २०२६ के अवसर पर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का ‘शांति निकेतन’ पर गौरव पाण्डेय का संबोधन

युवा २०२६ के अवसर पर 
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का ‘शांति निकेतन’ पर गौरव पाण्डेय का संबोधन 
आज हमारे समय में जब सारी समस्याओं के समाधान शहरों के नाम बदलकर खोजे जा रहे हैं और चारों ओर युद्ध-युद्ध का शोर है ऐसी स्थिति में ‘शांति निकेतन’ शब्द सुनना और इस पर बात करना भी सुकून देने वाला है।

‘शांति निकेतन’ यह शब्द सुनने में ही कितना सुकून भरा है जैसे कोई सपनों की जगह । रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सपनों का-विश्वनीड़- शांति निकेतन । जहाँ शिक्षा प्रकृति, कला, लोक और विश्व-संवाद के साथ जुड़ी थी । जिसका आदर्श था—“यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्” अर्थात् जहाँ सारा संसार एक घोंसले के समान हो जाता है। मूल शांतिनिकेतन वृक्षों की छाया में ही रचा बसा था । यह केवल एक परिसर नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रयोग-भूमि था। आगे चलकर यही परिसर विश्व-भारती विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ,

जब 1930 में द्विवेदी जी शांति निकेतन पहुँचे, तब वे अपने साथ शास्त्रीय अनुशासन लेकर आए । लेकिन यहाँ उन्हें एक ऐसा वातावरण मिला, जहाँ— शिक्षा प्रकृति के बीच होती थी। जहाँ भारतीय परंपरा का सम्मान था, लेकिन संकीर्णता नहीं थी । विश्व-संस्कृतियों का संवाद था पर आत्महीनता नहीं थी ।

द्विवेदी जी को यह नौकरी अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, पंडित मदन मोहन मालवीय और आचार्य केशव प्रसाद मिश्र की सिफारिश पर मिली थी । जब वह शांतिनिकेतन पहुंचे थे तो उनके पास रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम पत्र थे जिन्हें मदन मोहन मालवीय और आचार्य केशव प्रसाद मिश्र ने द्विवेदी जी की प्रशंसा में लिखे थे और काम देने की सिफारिश थी ।

23 अक्तूबर, 1973 को शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के नाम लिखे पत्र में द्विवेदी जी कहते हैं “आप जानते ही हैं 6, 7, और 8 नवंबर मेरे ‘द्विजत्व प्राप्ति’ की तिथि है । मैं शांतिनिकेतन 6 को चला था, 7 को पहुँचा और 8 को काम शुरू किया था । इन तिथियों को मैं बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ”

द्विवेदी जी रवीन्द्रनाथ ठाकुर से बहुत प्रभावित थे । 19 सितंबर -45 को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के नाम लिखे पत्र में वे लिखते हैं : “जीवन में ‘टर्निंग प्वाइंट’ की बात आपने पूछी है । मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना शांतिनिकेतन में गुरुदेव के दर्शन पाना है” इसी पत्र में आगे लिखते हैं “रवींद्रनाथ को देखने का जिस दिन मुझे अवसर मिला वह दिन मेरे अनेक जन्म के पुण्यों का फल था । मैंने बिल्कुल नई दृष्टि और नया विश्वास पाया” 

वे रवींद्रनाथ ठाकुर से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने दाढ़ी बढ़ा ली थी । एक दिन गुरुदेव ने मज़ाक़ में कहा “तुम मेरे प्रतिद्वंद्वी बनना चाहते हो- यह नहीं होगा।” उसके बाद द्विवेदी जी ने दाढ़ी कटवा ली थी ।

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शांतिनिकेतन ने द्विवेदी जी को परंपरा की दूसरी धारा से परिचित कराया—एक ऐसी धारा जो केवल ब्राह्मणवादी शास्त्र-परंपरा तक सीमित नहीं थी बल्कि लोक, संत और मानवतावादी चेतना से जुड़ी थी । इस बात का अंदाज़ा इस उदाहरण से लगाया जा सकता है:

“शान्तिनिकेतन में एक विधवा अपनी कन्या का विवाह हिन्दू विधि से करना चाहती थी। किसी ने कह दिया कि नान्दी-श्राद्ध विधवा नहीं कर सकती। गुरुदेव ने द्विवेदी जी को बुलाया । पूछा, ‘हिन्दुओं का हजारों वर्ष का इतिहास है, क्या उसमें पहली बार यह घटना हो रही है? पहले भी तो कभी ऐसी स्थिति आई होगी?’ पंडितजी घर आए। स्मृति-ग्रंथों की छानबीन की। देखा कि पूर्वपक्ष में ऐसे बहुत से वचन हैं। जो विधवा के इस अधिकार को स्वीकार करते हैं। लेकिन वचनों की संगति लगाते समय निष्कर्ष रूप में यही कहा गया है कि विधवा को ऐसा अधिकार नहीं है। जाकर गुरुदेव को बताया तो हँसकर बोले, ‘क्या पूर्वपक्ष के वे ऋषि कुछ कम पूज्य हैं, जिनका खंडन उत्तरपक्ष में किया गया है?’ इस प्रश्न ने पंडितजी को झकझोर दिया। परम्परा क्या उत्तरपक्ष ही है? पूर्वपक्ष नहीं? एक तरह से यह इतिहास-बोध का उदय था।” 

यहाँ से उनके भीतर एक परिवर्तन शुरू होता है— शास्त्र से जीवन की ओर। ग्रंथ से मनुष्य की ओर। द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य में जिस “दूसरी परंपरा” की पहचान की, उसका बौद्धिक बीजारोपण शांतिनिकेतन के वृक्षों की छाया तले ही हुआ था ।

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यह दूसरी परंपरा क्या है? यह संत साहित्य की परंपरा है—कबीर, नानक, दादू की धारा। यह लोक-संस्कृति और जन-चेतना की परंपरा है। यह मानव-केन्द्रित आध्यात्मिकता की परंपरा है।

शास्त्र की पहली परंपरा जहाँ विधि, कर्मकांड और संरचना पर बल देती है, वहीं दूसरी परंपरा अनुभव, संवेदना और समता पर आधारित है।  शांतिनिकेतन में रहते हुए द्विवेदी जी ने मध्यकालीन भक्ति साहित्य का गंभीर अध्ययन किया। उन्होंने कबीर, सूर, नाथपंथ और संत परंपरा को नए परिप्रेक्ष्य में देखा। द्विवेदी जी ने कबीर पर जो महत्त्वपूर्ण कार्य किया, उसमें कबीर को केवल धार्मिक संत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत किया जो भारतीय समाज की जड़ताओं को तोड़ते हैं । द्विवेदी जी के इस महत्व को स्वीकार करते हुए अशोक बाजपेयी जी (1979 में) “प्राचीनों से गप लगाता आधुनिक” नामक आलेख में लिखते है कि “पिछले तीस वर्षों में कबीर और अन्य संत कवियों के संघर्ष, सामाजिक चेतना, बिद्रोह शीलता, मानवतावाद आदि की जो पहचान बनी है उसका बहुत बड़ा श्रेय द्विवेदी जी को है!” इसी आलेख में द्विवेदी जी को “सच्चा आधुनिक” कहा गया है क्योंकि आधुनिक मनुष्य का संशय, उसकी जिजीविषा, उसकी अस्मिता और संघर्ष, उसके दुःस्वप्न और आदर्श उनके निबंधों और उपन्यासों की विशेषता और विषयवस्तु रही है । अशोक जी की इस बात से हम आज भी सहमत हैं । निश्चित ही यह आधुनिक दृष्टि द्विवेदी जी को शांति निकेतन के मुक्त वातावरण में मिली जहाँ प्रश्न पूछने और परम्परा को नए सिरे से समझने की स्वतंत्रता थी ।

शांति निकेतन ने द्विवेदी जी को केवल सांस्कृतिक विस्तार नहीं दिया, बल्कि एक मानवीय दृष्टि भी दी। ‘मनुष्य की जय यात्रा’ तो द्विवेदी का तकियाकलाम ही है जो उन्हें रवींद्रनाथ से मिला था । 
द्विवेदी जी मानते थे कि, "देवता न बड़ा होता है, न छोटा, न शक्तिशाली होता है, न अशक्त; वह उतना ही बड़ा होता है जितना बड़ा उसे उपासक बनाना चाहता है" यह कथन मनुष्य की आस्था की सृजनात्मक शक्ति को महत्व देता है । हम सब कहते सुनते और पढ़ते आ रहे हैं कि द्विवेदी जी की रचनाओं में मनुष्य ही केंद्र में है । ‘मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है’ यह निबंध तो हमने एम.ए के पाठ्यक्रम में पढ़ा था । द्विवेदी जी पर बात करते हुए मेरे गुरु प्रो. चित्तरंजन मिश्र जी ने बातचीत में कहा था कि “द्विवेदी जी मनुष्य की अपराजेय जिजीविषा में विश्वास और आत्मतत्व को बहुत महत्त्व देने वाले रचनाकार हैं। और सच्चे अर्थों में भारतीय साहित्य के गंभीर अध्येता हैं जिनकी जड़ें भारतीय लोक से जीवन रस और कल्पना ग्रहण करती हैं“ इस बात को हम द्विवेदी जी के निबंधों और उपन्यासों को पढ़ते हुए महसूस करते हैं ।

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द्विवेदी जी ने अपने लेखन में मुख्यधारा से अलग पड़े विषयों पर विशेष ध्यान दिया है। जिनको वो सम्मान नहीं मिला जिनके हकदार वे हैं उन पर अपनी बात कही है । ‘अशोक का फूल’ उपेक्षित है, ‘कुटज’ उपेक्षित है;  कबीर उनके पूर्व हिन्दी में उपेक्षित थे।  नाथ-सिद्धों की रचनाओं को गैर साहित्यिक मानकर उन्हें अन्तःसाधनात्मक माना जाता था।

द्विवेदी जी के उपन्यासों में प्रमुख नारी-पात्रों यानी नायिकाओं से अधिक प्रभाव सहचरियों का पड़ता है। भट्टिनी से अधिक निउनिया का और मृणाल से अधिक चन्द्रा का। भट्टिनी और मृणाल तो ठेठ शान्तिनिकेतनी पात्र हैं। तो निउनिया और चन्द्रा ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश की दलित पात्र है ।

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द्विवेदी जी ने शांतिनिकेतन में ‘हिंदी भवन’ की संकल्पना को साकार किया । वह वहाँ हिंदी के प्रवक्ता की तरह नहीं हिंदी लेखक और कार्यकर्ता की तरह रहे । उन्होंने 1938 में बनारसीदास चौतुर्वेदी को लिखे पत्र में अपना मंतव्य प्रकट किया है “इस समय शांतिनिकेतन में 77 विद्यार्थी हिंदी शिक्षण पर हैं । 30 सदस्य हिंदी समाज में हैं । 6 बंगाली अध्यापक हिंदी में विचार प्रकट करने की चेष्टा करते हैं । यह सब कुछ करते समय मैंने सदा अपनी नीति चुप रहने की रखी है । प्रचार प्रसार कहते रहने से काम ख़राब होता है” निश्चित ही यह द्विवेदी जी ने चुपचाप ही किया । हिंदी का पहला समाचार पत्र “उदंत मार्तण्ड” यहीं से निकला था। 

द्विवेदी जी सरलता और आमफ़हम के नाम पर बाजारू भाषा को राजभाषा बनाये जाने का विरोध भी करते हैं । उनका कहना था “मेरे लिए हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य कोई देव प्रतिमा नहीं है जिसका नाम जपकर और आरती उतारकर हम संतुष्ट हो जाएँ । यदि हिंदी अपना दायित्व नहीं निभाती है तो वह श्रद्धा और भक्ति का विषय नहीं बन सकती है” द्विवेदी जी हिंदी का महत्त्व इस बात में देखते हैं कि वह एक बड़ी जनसंख्या के जीवन स्तर, बौद्धिक स्तर और आध्यात्मिक स्तर को ऊपर उठाने का साधन बने ।

द्विवेदी जी के रहते ‘हिंदी भवन’ में बहुत हिंदी लेखकों का आना जाना था। बनारसीदास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन, जैनेन्द्र, यशपाल, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार आदि वहाँ ठहरते थे । अज्ञेय, बलराज साहनी ,राम सिंह तोमर , राजपूताने तिवारी, मोहनलाल बाजपेयी जैसे लोग किसी न किसी रूप में हिंदी भवन से जुड़े थे । रांगेय राघव, धर्मवीर भारती ने वहीं से शोध किया । महाश्वेता देवी अपने को द्विवेदी जी की शिष्या कहती थी और इन्दिरा गांधी भी कहती थीं.

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शांतिनिकेतन से द्विवेदी जी ने विश्वभारती पत्रिका निकाली । सम्पादकीय में रवींद्रनाथ के हवाले से कहा गया है -“आज तो हिंदू-मुसलमानों का लज्जाजनक विद्वेष देश को आत्मघात की ओर प्रवृत्त कर रहा है । उसकी जड़ में है सारे देश में फैली अबुद्धि ।” हम देख रहे हैं आज यह अबुद्धि पूरे देश में महामारी की तरह फैल चुकी है । 

जब आज मनुष्य की गरिमा और स्वतंत्रता पर सबसे अधिक हमले हो रहे हैं मुझे द्विवेदी जी का यह लोकप्रिय कथन याद आता है “सत्य के लिए किसी से भी नहीं डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं!” और आप देख सकते हैं आज यही चीजे सबसे अधिक डराने वाली हैं । सबसे अधिक भय इन्हीं का है । इन्हीं को आधार बनाकर नए-नए भय के तरीके ईजाद किए जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में द्विवेदी जी का यह कथन निश्चित ही हमें शक्ति देने वाला है ।

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द्विवेदी जी का निर्माण शांतिनिकेतन में हुआ । वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर, दीनबंधु एंड्रयूज़, क्षितिमोहन सेन, नंदलाल बोस, उपेन दा और रामकिंकर जैसे लोगों से प्रभावित थे और उनके आत्मीय भी थे। यहाँ रहते हुए इनका संबंध क्रांतिकारियों से भी था । भूमिगत आंदोलनकारियों की कई तरह से मदद भी किया करते थे । बाद में  इन्दिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के समय भी उनके पास फ़रार और सरकार विरोधी लोगों के बहुत पत्र आते थे ।

 1950 की जुलाई के पास वे शांतिनिकेतन से काशी प्रायः आर्थिक एवं पारिवारिक कारणों से लौटे थे । इसके पहले भी उन्हें काशी आने का आमंत्रण मिला था लेकिन वह शांतिनिकेतन और गुरुदेव के मोह तथा काशी में अपने विरोध को देखते नहीं आए थे जबकि उन्हें उन्हें मातृसंस्था में आने का बड़ा मोह था । यद्यपि इस मोह के चक्कर में उन्हें काशी से बहुत पीड़ा मिली ।

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यदि हम समग्र रूप से देखें तो शांतिनिकेतन ने द्विवेदी जी के व्यक्तित्व को तीन स्तरों पर प्रभावित किया है :
(क) बौद्धिक स्तर पर उन्होंने शास्त्र को जीवन से जोड़ना सीखा।
(ख) सांस्कृतिक स्तर पर उन्होंने भारतीयता को बहुलता के रूप में समझा।
(ग) नैतिक स्तर पर उन्होंने संवाद, सहिष्णुता और उदारता को जीवन-मूल्य के रूप में स्वीकार किया।

निष्कर्ष यह कि शांतिनिकेतन उनके लिए केवल कार्यस्थल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जन्म का स्थल है । हम कह सकते हैं कि यदि काशी ने उन्हें आधार दिया, तो शांतिनिकेतन ने उन्हें क्षितिज दिया। यदि काशी ने उन्हें परंपरा सिखाई, तो शांतिनिकेतन ने उन्हें परंपरा की पुनर्व्याख्या सिखाई। द्विवेदी जी का रचनात्मक व्यक्तित्व शांतिनिकेतन में परिपक्व हुआ ।शांतिनिकेतन की भूमिका के बिना द्विवेदी जी को समझना अधूरा है।
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The Raza Foundation शुक्रिया ।

-गौरव पाण्डेय
स्थान: चित्रकूट

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