साहित्य वाचस्पति उपाधि से विभूषित हुए : प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय
साहित्य वाचस्पति उपाधि से विभूषित हुए : प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय
मुंबई । हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने प्रख्यात आलोचक व मुंबई विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय को अपनी सर्वोच्च उपाधि साहित्य वाचस्पति (डी. लिट. ) से 22 मार्च 2026 को श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात में सम्मानित किया। ध्यातव्य है कि इस उपाधि से सम्मानित प्रमुख साहित्यकारों में पं.मदन मोहन मालवीय, महात्मा गाँधी, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, ग्रियर्सन, श्यामसुन्दर दास, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, डॉ. सम्पूर्णानन्द, हजारी प्रसाद द्विवेदी, विजय दत्त श्रीधर जैसी विभूतियों का समावेश है।प्रोफेसर उपाध्याय को यह उपाधि हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति और प्रख्यात विद्वान् डाॅ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के कर-कमलों से प्राप्त हुआ। ज्ञात हो कि मुंबई विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं आलोचक डाॅ.करुणाशंकर उपाध्याय इस समय हिन्दी साहित्य के सबसे चर्चित आलोचक हैं।आप भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अधिकारी विद्वान् हैं। आप आलोचना की अद्यतन पद्धतियों से भी पूर्णत: विज्ञ हैं।आप भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में नूतन प्रतिमानों का निर्माण करते हैं।आपकी पुस्तक 'मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ' पर आयोजित परिचर्चा के अवसर पर साहित्यकार चित्रामुद्गल ने डाॅ. उपाध्याय को आज का सबसे बड़ा आलोचक कहा था। तदुपरांत हिंदी साहित्य भारती द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने इन्हें वर्तमान शती का आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डाॅ.अरविंद द्विवेदी ने अज्ञेय के बाद हिंदी का सबसे बड़ा अंत: अनुशासनिक आलोचक कहा।प्रोफेसर उपाध्याय के आलोचनात्मक लेखन पर ममता यादव ने जे.जे.टी. विश्वविद्यालय, झुंझनू, राजस्थान से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है।
शोध छात्र अश्वनी तिवारी ने मीडिया को बताया कि राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दो दर्जन से अधिक सम्मान से पुरस्कृत डाॅ.करुणाशंकर उपाध्याय का जन्म 15 अप्रैल 1968 को उ.प्र. के प्रतापगढ़ जिले के घोरका तालुकदारी नामक गाँव में हुआ। आपके पिता राममनोरथ उपाध्याय विख्यात रामायणी थें और पितामह रामकिशुन उपाध्याय सुविख्यात वैद्य थें। डाॅ.उपाध्याय की अभी तक कुल 20 मौलिक आलोचनात्मक पुस्तकें और 15 संपादित पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। गत वर्ष इनका आलोचना ग्रंथ ' जयशंकर प्रसाद महानता के आयाम ' प्रकाशित हुआ है जो इस समय विद्वानों के मध्य मीमांसा का विषय बना हुआ है। महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री डाॅ.कविता प्रसाद पुस्तक की प्रशंसा करती है। इस पर अब तक 25 संगोष्ठियां आयोजित हो चुकी हैं। ऐसा बहुत कम होता है जब कोई आलोचना ग्रंथ हिन्दी जगत् का इस प्रकार स्नेहभाजन बनता है। इसे हिंदी आलोचना में नए युग का सूत्रपात करने वाला ग्रंथ कहा जा रहा है। यह आलोचना ग्रंथ आलोचना विधा के खोए हुए गौरव को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है। आपके राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग 400 आलेख - शोध पत्र प्रकाशित हैं । वही प्रोफेसर उपाध्याय के कुशल निर्देशन में अब तक 37 शोधार्थी पी-एच.डी. की उपाधि एवं 55 छात्र एम.फिल. कर चुके हैं।
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