फिर से..(कविता)- कवयित्री कंचन मिश्रा 'सुरवन्दिता', प्रयागराज

फिर से..(कविता)-  
कवयित्री कंचन मिश्रा 'सुरवन्दिता', प्रयागराज 
फ़िर से वही सुस्ताने के दिन आने वाले हैं,
धीरे धीरे गांवों में सब जाने वाले हैं।
अंधी दौड़ का धुआं,अब थम जाने वाला है,
अंतर्दृष्टि का दीप ,हृदय में जल जाने वाला है।

बैल गाड़ियों के दिन फ़िर से जग जाने वाले हैं,
पगडंडियों पर फ़िर से घुंघरू बज जाने वाले हैं।
वो हरियाली, वो ताल तलैया 
फ़िर से भर आने वाले हैं।
मंद मधुर फूलों की सुगंध फ़िर से बह जाने वाली है।

पश्चिम का वो अंधियारा जल कर राख क्या हुआ ।
पूरब में किरणों ने सतरंगी जाल स बुना।

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