भगवान श्रीराम का चरित्र हमे सिखाता है कि महानता किसी पद या शक्ति से नहीं बल्कि चरित्र की पवित्रता और कर्मों की श्रेष्ठता से प्राप्त होती है -डॉ रंजय कुमार सिंह
भगवान श्रीराम का चरित्र हमे सिखाता है कि महानता किसी पद या शक्ति से नहीं बल्कि चरित्र की पवित्रता और कर्मों की श्रेष्ठता से प्राप्त होती है -डॉ रंजय कुमार सिंह
मुंबई। भांडुप स्थित सरस्वती हाई स्कूल तुलशेटपाड़ा में रामनवमी पर्व के उपलक्ष्य में भगवान श्रीराम के आदर्श स्वरूप पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में संयुक्त शिक्षक संघ, अखिल भारतीय नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नासिक परिसर, राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक डॉ रंजय कुमार सिंह ने कहा कि सृष्टि की संरचना को आत्मसात करने वाला सत्य सनातन हिन्दू एक जीवनोपयोगी धर्म है। इस धर्म की अनादि परम्परा में भगवान श्रीराम का चरित्र केवल एक कथा या धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के सर्वोच्च आदर्श का जीवंत उदाहरण है। श्रीराम को "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहा गया है, जिसका अर्थ है वह पुरुष जिसने जीवन की प्रत्येक मर्यादा का पूर्ण और सर्वोत्तम पालन किया। उनका जीवन इस सत्य स्वरूप को स्थापित करता है कि मनुष्य यदि धर्म, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहे, तो वह स्वयं को उच्चतर स्तर प्राप्त कर सकता है। शास्त्र की दृष्टि से वाल्मिकी रामायण, रामचरित मानस और पुराणों में वर्णित है कि जब त्रेता युग में अधर्म अपनी चरम सीमा पार कर चुका था, रावण के अत्याचारों से देवता, ऋषि और मानव सभी पीड़ित थे, तब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया। यह अवतार केवल देवी हस्तक्षेप नहीं था, बल्कि एक मानवसमाज के लिए एक विशेष संदेश था कि धर्म की रक्षा केवल शक्ति से नहीं बल्कि मर्यादा, संयम सत्य के पालन द्वारा किया जा सकता है । श्रीराम ने अपने जीवन में कही भी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग समस्याओं के समाधान के लिए नहीं किया बल्कि हर परस्थितियों का सामना एक साधारण मनुष्य की तरह किया। यही कारण है उनका जीवन हर युग में प्रेरणास्रोत के रूप में प्रासंगिक है। भगवान श्रीराम ने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हुए व्यक्तिगत सुख और अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण धर्म एवं कर्तव्य को समझते हुए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया । श्रीराम ने आदर्श स्वरूप का परिचय देते हुए कठिन परिस्थितिया, जंगल का जीवन सीमित संसाधन और निरंतर संकट इन सबके बीच में भी उन्होंने ने धैर्य, संतुलन और संयम नहीं छोड़ा। श्रीराम का चरित्र केवल व्यक्तिगत गुणों तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके संबंधों में भी उनकी महानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एक पुत्र के रूप में उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया, एक भाई के रूप में उन्होंने ने प्रेम और त्याग का आदर्श प्रस्तुत किया, और एक पति के रूप में उन्होंने सम्मान और निष्ठा का परिचय दिया। उनके और उनके भाईयों के बीच का संबंध भारतीय संस्कृति में भाईचारे का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। भरत का त्याग, जिन्होंने स्वयं राजा बनने के बजाय श्रीराम की खड़ाऊ को सिंहासन पर स्थापित कर राज्य धर्म का निर्वहन किया। मित्रता के क्षेत्र में भी श्रीराम का चरित्र का एक अलग मिशाल है, उन्होंने निषाद को गले लगाया माता शबरी का जूठा बेर खाया, सुग्रीव की सहायता कर उसे उसका अधिकार दिलाया, श्रीहनुमान जी पर अटूट विश्वास रखा और विभीषण को शरण दी भले ही वह शत्रु पक्ष से थे । उनसे यह संदेश मिलता है कि उनके लिए संबंधों का आधार केवल स्वार्थ नहीं, बल्कि धर्म और सत्य था।वह हर एक व्यक्ति के साथ खड़े रहे जो धर्म के मार्ग पर था, चाहे वह किसी भी परस्थिति में क्यों ना हो। श्रीराम ने राज्याभिषेक के बाद जिस प्रकार का शासन स्थापित किया, वह "रामराज्य" के रूप में जाना गया। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि एक आदर्श मानवसमाज की परिकल्पना है। जिनके राज्य में न्याय, समानता, समृद्धि और शान्ति का संतुलन था। जो उस काल में एवं वर्तमान में भी भारतीय संविधान के मूल दर्शन के रूप में समरसता सिद्धांत को स्थापित करता है।कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं था, बल्कि हर निर्णय धर्म के आधार पर लिया जाता था। रामायण से यह सीख मिलता है कि हमारे भीतर भी अहंकार, क्रोध और लोभ के रूप में एक" रावण" व्याप्त है। जब हम एक भीतर के" राम" जो सत्य, धर्म और विवेक को जागृत करते हैं, तब हम उस रावण पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। श्रीराम का चरित्र हमे सिखाता है कि महानता किसी पद या शक्ति से नहीं बल्कि चरित्र की पवित्रता और कर्मों की श्रेष्ठता से प्राप्त होती है। श्रीराम केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक आदर्श मार्ग है, एक ऐसा मार्ग जो मनुष्य को उसके सर्वोच्च स्वरूप तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। यही उनके चरित्र की महानता और यही सनातन धर्म का शाश्वत संदेश है। डॉ सिंह ने छात्रों से अनुरोध करते हुए यह भी कहा कि कि शिक्षा का उद्वेश्य श्रीराम जैसे चरित्र का निर्माण करना है जैसे श्रीराम ने हर परस्थिति में माता पिता की आज्ञा का पालन किया वैसे ही हर संकट में भी हम सभी को पालन करना चाहिए।इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पर हिन्दी हाई स्कूल के प्रबंधक सूरज हरिश्चंद्र त्रिपाठी ने रामनवमी पर्व पर शुभकामना व्यक्त करते हुए कहा कि हम सभी को श्रीराम के जीवन से एक भी गुण अपने जीवन में उतार लें, चाहे वह सत्यनिष्ठा हो, कर्त्तव्यपरायता हो या विनम्रता हमारा जीवन स्वयं ही एक नई दिशा प्राप्त कर सकता है। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रधानाचार्य संध्या सूरज त्रिपाठी, शिक्षक के रूप में अखिलेश सिंह, अनिल दुबे, रमाकांत पटेल, कविता नाईक,पूनम राय, शिवानी चौधरी, भरत गात, शिवाली राय और विजेन्द्र सरोज का विशेष सहयोग रहा।
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