उर्दू आख़िर किसकी है?
उर्दू आख़िर किसकी है?
“उर्दू हम पर मुसल्लत की गई है, ये मुसलमानों की भाषा नहीं है”—मुशायरों की महफ़िलों में यह जुमला अक्सर सुनाई देता है। दूसरी तरफ़ हम ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ का फ़ख्र से ज़िक्र करते नहीं थकते। सवाल यह है कि क्या हमारी अदबी महफ़िलें भी उसी तहज़ीब की सही तर्जुमानी कर रही हैं?
हक़ीक़त यह है कि जब मुशायरों और अदबी मंचों की नुमाइंदगी पर नज़र डाली जाए, तो ग़ैर-मुस्लिम उर्दू शायरों की मौजूदगी बेहद कम दिखाई देती है—ख़ास तौर पर वे शायर, जो उर्दू के फ़रोग़ के लिए खामोशी से लगातार काम कर रहे हैं और फ़न के एतिबार से किसी भी तरह कमतर नहीं हैं।
दिलचस्प यह है कि जिन महफ़िलों में “बड़े नाम” और भारी-भरकम मेहनताना होता है, वहाँ इन शायरों की शिरकत लगभग नदारद रहती है। जबकि कुछ चुनिंदा, सीमित दायरों में आयोजित महफ़िलों में यही शायर पूरी तादाद में नज़र आते हैं। यह तज़ाद (विरोधाभास) कई सवाल खड़े करता है।
सबसे अहम सवाल—आख़िर उर्दू है किसकी?
अगर उर्दू वाक़ई सबकी ज़बान है, तो फिर अदबी मंचों पर यह बराबरी क्यों नहीं दिखाई देती?
क्या यह माना जाए कि ग़ैर-मुस्लिम शायरों को शायरी का सलीक़ा नहीं? या उन्हें इल्म-ए-अरूज़, फ़न-ए-सुख़न और उर्दू रस्म-उल-ख़त का ज्ञान नहीं?
अगर ऐसा है, तो फिर वही शायर अचानक कैसे “क़ाबिल” हो जाते हैं, जब उन्हें ख़ास मौक़ों—जैसे ईद या मिलाद की महफ़िलों—में बाक़ायदा दावत दी जाती है?
दरअसल, यह मसला क़ाबिलियत का कम और चयन की पारदर्शिता का ज़्यादा मालूम होता है। कहीं न कहीं यह एहसास मज़बूत होता है कि उर्दू के नाम पर अदब से ज़्यादा रिश्ते, हलक़े और कभी-कभी सियासी मफ़ाद हावी हैं।
इस सिलसिले में महाराष्ट्र स्टेट उर्दू साहित्य अकादमी का रवैया भी सवालों के घेरे में आता है। जिन शायरों को अकादमी अवॉर्ड देकर सम्मानित करती है, उन्हें ही उसके मुशायरों में जगह नहीं मिलती, जबकि कुछ चुनिंदा चेहरों को बार-बार मंच दिया जाता है। इससे यह तास्सुर पैदा होता है कि मौक़े सीमित दायरों में बँटकर रह गए हैं।
अगर उर्दू सचमुच सबकी है, तो उसके मंच भी सबके लिए खुलने चाहिए। महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में मौजूद क़ाबिल शायरों को बराबर मौक़ा मिलना चाहिए—ताकि अदब की असल रूह ज़िंदा रह सके।
हाल ही में आयोजित उर्दू के पचास साला जश्न का उदाहरण सामने है, जहाँ विविध कार्यक्रमों को जगह मिली, मगर नए और उभरते हुए शायरों को अपेक्षित मंच नहीं मिल सका। अगर ऐसे आयोजनों में उभरती आवाज़ों को शामिल किया जाए, तो न सिर्फ़ नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि उर्दू का दायरा भी वसीअ होगा।
आज ज़रूरत इस बात की है कि उर्दू को महज़ एक तबक़े की ज़बान समझने के बजाय, उसे उसकी असल पहचान—एक साझा सांस्कृतिक विरासत—के रूप में देखा जाए।
जो लोग बे-लौस मुहब्बत से उर्दू की ख़िदमत कर रहे हैं, उन्हें पहचान और हौसला-अफ़ज़ाई मिलनी ही चाहिए—यही इंसाफ़ भी है और अदब की तक़ाज़ा भी।
आख़िर में, अगर सरकारी सरपरस्ती वाले ऐसे जश्न अलग-अलग शहरों में आयोजित किए जाएँ, तो न सिर्फ़ संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा, बल्कि उर्दू को जमीनी स्तर पर वास्तविक फ़रोग़ भी मिलेगा।
डॉ. लक्ष्मण शर्मा “वाहिद”
सानपाड़ा,
नवी मुम्बई ।
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